पोप लियोः वाटिकन द्वितीय ईश्वर से मित्रता का आहृवान देता

पोप ने वाटिकन द्वितीय महाधर्मसभा,देई भेरबुऊम पर चिंतन करते हुए ईश्वर के संग मित्रता करने पर जोर दिया जो हमारे लिए अति आवश्यक है।

पोप लियो 14वें ने अपनी बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन, पोप पौल षष्ठम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

हमने वाटिकन द्वितीय पर अपनी धर्मशिक्षा माला श्रृंखला की शुरूआत की है। आज हम धर्मसिद्धांत देई भेरबुऊम, दिव्य प्रकाशना का अवालोकन निकटता से करेंगे। यह धर्मसभा की एक अति सुन्दर और महत्वपूर्ण विषयवस्तु है, इसके परिचय की शुरूआत करते हुए हम येसु के शब्दों की याद कर सकते हैं जो हमारे लिए सहायक होंगे- “अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैंने अपने पिता से जो कुछ सुना, वह सब तुम्हें बता दिया है” (यो.15.15)। यह ख्रीस्तीय विश्वास का एक मूलभूत आधार है, जिसकी याद देई भेरबुऊम हमें दिलाती है। येसु ख्रीस्त, ईश्वर के संग मानव के संबंध को पूरी तरह बदल देते हैं जिसे अब हम मित्रता के एक संबंध स्वरुप पाते हैं। अतः नये विधान की शर्त हमारे लिए सिर्फ प्रेम हैं।

दोस्ती किनके संग
संत अगुस्टीन, चौथे सुसमाचार के उस पद पर टिप्पणी करते हुए कृपा के आयाम पर जोर देते हैं, केवल जिसके माध्यम हम ईश्वर के पुत्र के मित्र बन सकते हैं। वास्तव में, एक प्राचीन कहावत- दोस्ती बराबरी वालों के बीच उत्पन्न होती है या समानता से दोस्ती पनपती है। हम ईश्वर के बराबर नहीं हैं लेकिन ईश्वर पुत्र में अपने को हमारे समान बनाते हैं।

यही कारण है, जैसे कि हम सभी धर्मग्रंथ में देखते हैं, विधान में हम दूरी को पहले स्थान पर पाते हैं, जिसमें ईश्वर और मानवजाति के बीच संबंध हमेशा विषम पाते हैं: ईश्वर अपने में ईश्वर हैं और हम सभी प्राणी। यद्यपि मानव शरीर के रुप में पुत्र का हमारे बीच में आना, विधान के अंतिम लक्ष्य को हमारे लिए खुले रुप में प्रस्तुत करता है- येसु में, ईश्वर हमें अपने पुत्र-पुत्रियाँ बनाते हैं, और हमें उनकी तरह बनने को बुलाते हैं, हलांकि हम अपनी मानवता में कमजोर हैं। अतः ईश्वर के संग हमारी समानता गुनाह और पाप के रुप में नहीं, जैसे कि सांप ने हेवा को सुझाव के में दिया (उत्प.3.5) बल्कि पुत्र के संग हमारे संबंध में होता है जो हमारे लिए मानव बनें।

मित्रता में वार्ता
पोप लियो ने कहा कि येसु ख्रीस्त के शब्द जिन्हें हमने सुना- “मैंने तुम्हें मित्र कहा है”- धर्मसिद्धांत देई भेरबुऊम में दोहराया गया है, इस बात पर जोर देता है, “इसलिए, इस प्रकटीकरण के फलस्वरुप, अदृश्य ईश्वर, अपने असीमित प्रेम के कारण मानव के संग मित्रों स्वरुप बातें करते, और उनके बीच में निवास करते हैं, जिससे वह उन्हें निमंत्रण दे सकें और उन्हें अपने संग संयुक्त कर सकें।” उत्पत्ति ग्रंथ में ईश्वर को हम पहले से ही अपने पहले पुरखों के संग बातें करता पाते हैं, और जब यह वार्ता पाप के कारण टूट गई, सृष्टिकर्ता ने अपने जीवों से मिलने और उनके साथ एक विधान स्थापित करने की कोशिश को बंद नहीं किया। ख्रीस्तीय प्रकाशना में, अर्थात जब ईश्वर अपने पुत्र में मानव बनें जिससे वे हमें खोज सकें, वार्ता का सिलसिला जो टूट चुका था पुनः अपने में एक निश्चित रुप में स्थापित होता है- हम विधान को नया और अनंत पाते हैं, हमें ईश्वर के प्रेम से कोई अलग नहीं कर सकता है। ईश्वर का अपने को प्रकट करना, इस तरह मित्रता में वार्तापूर्ण स्वभाव को व्यक्त करता है, और जैसे कि हम इस मानवीय मित्रता के अनुभव में देखते हैं, यह शांत रहने को बर्दाश्त नहीं करती, बल्कि यह सच्ची बातों के आदान-प्रदान में पोषित होता है।

शब्दों में रहस्य प्रकट होते हैं
पोप ने कहा कि देई भेरबुऊम का धर्मसिद्धांत हमें इस बात की याद दिलाती है- कि ईश्वर हमसे बातें करते हैं। यहाँ हमारे लिए शब्दों और बकवस के बीच अंतर के महत्व को समझने की मांग करता हैः दूसरे को हम सतह पर ही रुकता पाते हैं जो लोगों के बीच मेलजोल स्थापित नहीं कर पाता है, जबकि सच्चे संबंध में शब्द न केवल जानकारी और खबरों का आदान-प्रदान करना है, बल्कि यह इस बात का भी उद्भेदन करता है कि हम कौन हैं। शब्द में हम रहस्य प्रकट होने के आयाम को पाते हैं जो दूसरों के संग हमारा संबंध स्थापित करता है। इस भांति, हमारे संग वार्ता करते हुए ईश्वर हमें, अपने को प्रकट करते हैं, एक सहयोगी के रूप में जो हमें  अपने संग मित्रता में प्रवेश करने को निमंत्रण देता है।

सुनने के मनोभाव
इस दृष्टिकोण से, प्रथम मनोभाव सुनने के भाव उत्पन्न करना है, जिससे दिव्य वचन हमारे मन और हृदयों में प्रवेश कर सके, इसके साथ ही, हममे ईश्वर के संग बातें करने की जरुरत है, उन बातों को उन्हें बतलाने की जरुरत नहीं जिन्हें वे जानते हैं, बल्कि हमें उन्हें स्वयं अपने को प्रकट करने की जरुरत है।