पोप लियो का राजनयिक दल को सम्बोधन
वाटिकन में शुक्रवार को पोप लियो 14 वें ने रोम में सेवारत विश्व के राजनयिक दल के सदस्यों का अभिवादन कर उनके प्रति नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ अर्पित की।
वाटिकन आये विभिन्न देशों के राजदूतों एवं गणमान्य प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए पोप ने कहा कि हालांकि यह परमधर्मपीठ से मान्यता प्राप्त राजनयिक दल के जीवन का एक परंपरागत अवसर है; तथापि उनके लिये यह एक नया अनुभव था, इसलिये इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी गणमान्य राजदूतों एवं राष्ट्रों के प्रतिनिधियों और विशेष रूप से इस वर्ष नियुक्त कज़ाकस्तान, बुरुण्डी एवं बेलारूस के राजदूतों से मुलाकात कर वे अत्यन्त प्रसन्न थे।
पोप ने कहा विश्व के विभिन्न राष्ट्रों की सरकारों द्वारा रोम में कूटनैतिक प्रतिनिधियों का प्रस्थापन हमारे बीच विद्यमान अच्छे और फलदायी द्विपक्षीय संबंधों का ठोस संकेत है, जिसके लिये मैं आप सबके प्रति एवं आपकी सरकारों के प्रति आभारी हूँ। इस अवसर पर उन्होंने कहा, मैं बढ़ते तनाव और झगड़ों से परेशान हमारे समय पर एक आपके साथ अपने विचारों को साझा करना चाहता हूँ।
जयन्ती वर्ष
पोप ने स्मरण दिलाया कि अभी-अभी व्यतीत वर्ष में काथलिक कलीसिया ने जयन्ती वर्ष मनाया, जो कि कलीसियाई जीवन का एक बहुत गहरा अनुभव था। इसी के दौरान हमने अपने प्रिय सन्त पापा फ्राँसिस को अपने पिता के धाम लौटते देखा जिन्होंने महान प्रेरितिक उदारता के साथ अपने मेषपाल की रखवाली की थी।
पोप ने याद किया कि कुछ दिन पहले, हमने सन्त पेत्रुस महागिरजाघर का पवित्र द्वार बन्द किया जिसे सन्त पापा फ्राँसिस ने खुद 2024 में क्रिसमस की रात को खोला था। पोप ने कहा कि पवित्र वर्ष के दौरान, लाखों तीर्थयात्री अपनी जुबली तीर्थयात्रा करने के लिए रोम आए और अपने अनुभवों, सवालों एवं खुशियों और साथ ही दर्दों एवं घावों को साथ लेकर महागिरजाघरों के पवित्रद्वारों से गुज़रे, जो स्वयं हमारे स्वर्गिक वैद्य प्रभु ख्रीस्त के प्रतीक हैं। इस धरती पर देहधारण कर प्रभु येसु ख्रीस्त ने मानव रूप और स्वभाव धारण किया ताकि हम उनके ईश्वरीय जीवन के भागी बन सकें। सन्त पापा ने कहा, मेरा विश्वास है कि इस अनुभव ने बहुत से लोगों को येसु की पुनर्खोज में मदद प्रदान की और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने की नवशक्ति प्रदान की है।
सन्त अगस्टीन के दो शहर
प्राचीन इतिहास के सन्दर्भ में पोप लियो ने सन् 410 ई. में रोम पर आक्रमण का ज़िक्र किया जिसपर सन्त अगस्टीन ने ईश्वर के शहर शीर्षक से अपनी कृति प्रस्तुत की है। उन्होंने कहा कि इसमें सन्त अगस्टीन दो प्रकार के शहरों की बात करते हैं। प्रथम है, आमोर देई अर्थात् ईश्वर का शहर जो अनन्त है तथा जिसकी विशिष्टता है ईश्वर का बिलाशर्त प्रेम और पड़ोसी के प्रति प्रेम, विशेषकर ग़रीबों एवं दीन दुखियों के प्रति प्रेम। फिर दूसरा है धरती का शहर, जो एक अस्थायी रहने की जगह है जहाँ इंसान मरने तक रहते हैं।
पोप ने कहा कि आज के समय में, धरती के शहर में परिवार से लेकर देश, राष्ट्र और अन्तरराष्ट्रीय संगठन, समस्त सामाजिक एवं राजनैतिक संस्थाएँ शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सन्त अगस्टीन के लिए, यह शहर रोमन साम्राज्य का प्रतीक था। वास्वत में, पोप ने कहा, दुनिया का शहर आमोर सुई अर्थात् घमंड और खुद से प्यार पर आधारित है, वह दुनियावी ताकत और शोहरत की प्यास पर केंद्रित है जो तबाही की ओर ले जाती है। तथापि, सन्त पापा ने कहा, यह इतिहास का ऐसा पाठ नहीं है जो अनन्त को वर्तमान से अलग करने का प्रयास करता है, यह कलीसिया की तुलना किसी राज्य से नहीं करता और न ही यह नागर समाज में धर्म की भूमिका के बारे में कोई बहस है।
उन्होंने कहा कि सन्त अगस्टीन की दृष्टि में, ये दोनों शहर हमेशा साथ-साथ रहेंगे। हर शहर का एक बाहरी और एक अंदरूनी पहलू है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ़ इतिहास में जिस तरह से बाहरी तौर पर बनाया गया है, बल्कि ज़िंदगी की सच्चाई और ऐतिहासिक घटनाओं के प्रति हर इंसान के अंदरूनी नज़रिए से भी समझना होगा। इस दृष्टि से, हममें से प्रत्येक इतिहास का एक अभिनायक और इतिहास के लिए ज़िम्मेदार है।
हमारा युग
पोप लियो ने कहा कि हमारे युग में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर बहुपक्षीयता की कमज़ोरी खास तौर पर चिंता की बात है। एक कूटनीति जो बातचीत को बढ़ावा देती है और सभी पार्टियों के बीच आम सहमति बनाने की कोशिश करती है, उसकी जगह ताकत पर आधारित कूटनीति ले रही है। युद्ध फिर से चलन में है और युद्ध का जोश फैल रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के उपरान्त रखा गया सिद्धांत, जो देशों को दूसरों की सीमाओं का उल्लंघन करने के लिए बल प्रयोग करने से रोकता था, पूरी तरह से कमज़ोर हो गया है।
शांति हथियारों से नहीं
पोप ने कहा, शांति अब एक वरदान और अपने आप में एक अच्छी चीज़ के तौर पर नहीं मांगी जाती, न ही उसे “ईश्वर की इच्छा से एक सुव्यवस्थित विश्व के निर्माण की कोशिश समझा जाता है, जिसमें स्त्री-पुरुषों शांति और न्याय के वातावरण में रह सकें।” इसके बजाय, शांति हथियारों के ज़रिए मांगी जा रही है, ताकि अपना दबदबा कायम किया जा सके, जिससे कानून भंग होता है जो शांतिपूर्ण नागरिकों के सहअस्तित्व की बुनियाद है।