देवदूत प्रार्थना में पोप : क्षमाशीलता के बिना हम शांति नहीं रह सकते
रविवार को देवदूत प्रार्थना में पोप लियो 14वें ने दूसरों को क्षमा करने की ताकत पर चिंतन किया। ख्रीस्त ने हमें माफ किया है, ताकि हम भी नफरत, विभाजन और हिंसा का सामना कर सकें और शांति एवं प्यार को बढ़ावा दे सकें।
वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 14 सितम्बर को पोप लियो 14वें ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने रविवार के सुसमाचार पाठ पर चिंतन किया।
उन्होंने कहा, “आज का सुसमाचार पाठ हमें क्षमाशीलता के बारे बताता है जो ख्रीस्तीय जीवन की एक बुनियादी विशेषता है। येसु ने क्रूस पर भी क्षमाशीलता का पाठ पढ़ाया और इसका उदाहरण दिया, जहाँ उन्होंने अपने अत्याचारियों के लिए पिता से प्रार्थना की: “पिता इन्हें माफ कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।” (लूक. 23:34)
आज के पाठ में, पेत्रुस गुरु से यही सवाल पूछते हैं: "प्रभु! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?" (मती. 18:21)। उनके शब्द एक उदार हृदय को दिखाते हैं, क्योंकि बाइबिल में सात संख्या पूर्णता की निशानी है, और “सात बार माफ करने” का मतलब है बहुत अधिक माफ करना। हालाँकि, येसु का जवाब और भी आगे जाता है: “मैं तुमसे सात बार नहीं, बल्कि सत्तर गुना सात बार कहता हूँ।” (पद 22); दूसरे शब्दों में, सभी सीमाओं से परे, हमेशा क्षमा करना।
अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए, वे एक नौकर का दृष्टांत बताते हैं जिसपर उसके मालिक का एक बड़ा कर्ज था जिसे चुकाना उसके लिए लगभग नामुमकिन था। हालांकि मालिक उसका कर्ज दया करके पूरी तरह माफ कर देता है, लेकिन दूसरी ओर यह नौकर अपने साथी सेवकों में से किसी पर वैसी दया नहीं दिखता है, जिसके कारण उसे फटकार और कड़ी सजा मिलती है। (पद 23-30)
क्षमा हमारे अस्तित्व की नींव
पोप ने कहा कि इन शब्दों के साथ, येसु हमें याद दिलाते हैं कि उपहार और क्षमा हमारे अस्तित्व की नींव हैं। सभी चीजें हमें ईश्वर द्वारा विशुद्ध प्रेम से दी गई हैं, और हममें से कोई भी इस भलाई का जवाब देने में पूर्ण होने का दावा नहीं कर सकता।
इस कारण से, निःस्वार्थ होना – जो हमारे अस्तित्व का स्रोत है – हमारे जीवन के लिए भी सबसे अच्छा नियम है। हम इसे हर दिन अनुभव करते हैं। क्षमा अपरिहार्य है, और इसके बिना हम शांति से नहीं रह सकते।
देर-सवेर संघर्ष, आरोप, दुर्भावना और प्रतिशोध के कार्य हमारे दिलों में और लोगों के बीच उभरते हैं, और ये कार्य रिश्तों को नष्ट करते हैं, परिवारों को विभाजित करते हैं और युद्धों को उत्पन्न करते हैं। केवल क्षमा ही हमें स्वतंत्र करती है और प्रकाश को पुनर्स्थापित करती है, जहाँ मानव की भौतिक और नैतिक गरीबी ने क्षितिज को अंधकारमय कर दिया है और मार्ग को अनिश्चित बना दिया है। क्षमा, एक शीतल हवा की तरह, सबसे घने बादलों को भी तब तक बहा ले जाती है जब तक कि सूर्य एक बार फिर चमक न जाए।
संत पेत्रुस ने क्षमा का अनुभव किया
संत पेत्रुस ने स्वयं अपने जीवन में कई बार इसका अनुभव किया; खासकर, — दुःखभोग के दौरान येसु को इंकार करने और छोड़ने के बाद — जब वे झील के किनारे जी उठे प्रभु से मिले और उन्होंने खुद को सिर्फ एक सवाल पूछते सुना: “सिमोन … क्या तुम मुझसे प्यार करते हो?” (यो. 21:15)। इसके साथ एक निमंत्रण भी था, “मेरे पीछे आओ!” (19), जो वही निमंत्रण था जिसको उनकी पहली मुलाकात में दिया गया था। ऐसा लगा जैसे कुछ हुआ ही न हो।
यही प्यार, जो माफ करता और चंगा करता है, प्रथम प्रेरितों के लिए, उनके मिशन की पुष्टि का निशान होगा।
इसके बाद पोप ने माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, “इसलिए, आइए हम दया की माता, कुँवारी मरियम से प्रार्थना करें कि वे हमें माफ करने में मदद करें – हमेशा माफ करने, तब भी जब पहला कदम उठाना मुश्किल हो – और हिम्मत एवं लगन के साथ, प्यार की शांत और चंगा करनेवाली रोशनी फैलाएं जो नफरत पर जीत हासिल करती है और सभी गुस्सों को खत्म कर देती है।
इतना कहने के बाद पोप ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।
