पोप : घायलों और परित्यक्तों की देखरेख, आशा की राजनीति
पोप लियो 14वें ने अपनी बुधवारीय आमसभा की धर्मशिक्षा माला में ख्रीस्तीयों का ध्यान इस ओर केंद्रित कराया कि कैसे वे आर्थिक और राजनैतिक जीवन में योगदान देते हुए समाज में शांति स्थापित कर सकते हैं। उनकी धर्मशिक्षा माला धर्मसिद्धांत “गौदियुम एत स्पेस” पर जारी है।
पोप लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात एवं सुस्वागतम्।
सामाजिक आयाम मानव स्वभाव का एक सम्पूर्ण अंग केवल नहीं है बल्कि यह येसु ख्रीस्त में हमारे विश्वास का भी एक भाग है, जिसे हमने ईश पुत्र के शरीरधारण स्वरुप एक मूल्यवान विरासत के रुप में पाया है। धर्मसिद्धांत गौदियुम एत स्पेस का तीसरे और चौथे अध्याय का भाग दो मानव जीवन के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक समुदाय को समर्पित है। इन क्षेत्रों में भी, ख्रीस्तीय विश्वास हमारे लिए आत्मपरख के मापदंण्डों को प्रदान करता है।
तकनीकी विकास काफी नहीं
धर्मसभा के आचार्य सर्वप्रथम विश्व शांति के लिए उस खतरे को ओर प्रकाश डालते हैं, जो ऐसे आर्थिक विकास से जुड़े असंतुलनों से पैदा होता है—एक ऐसा विकास जो न तो न्यायपूर्ण है और न ही सृष्टि का सम्मान करता है। यह एक दूर-दृष्टिकोण है जिसकी उत्पत्ति दुर्भाग्यवश पिछली शताब्दी के अंत में हुई थी जिसे हम आज की परिस्थिति में स्पष्ट रुप से देखते हैं। इस दशा को सुधारने के लिए, दस्तावेज हमें चुनौती देता है, तकनीकी विकास केवल अपने में काफी नहीं है, हमारे लिए जरूरी है “सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में कई सुधारों की, और सभी की मानसिकता तथा दृष्टिकोण में बदलाव लाने की।”
अतः गौदियुम एत स्पेस आर्थिक विकास के ख्रीस्तीय दृष्टिकोण को संक्षेपित करता है जिसे चाहिए कि वह सदैव मानवता की सेवा और उनके नियंत्रण में रहे। समग्र विकास की विषयवस्तु को हम यहाँ पहले से ही स्पष्ट पाते हैं, एक विषयवस्तु जिसे संत पापा पौल 6वें ने अपने विश्व पत्र पोपुरोरूम प्रोग्रेसियो के केन्द्र विन्दु में रखा। हम इसमें पहले से अधिक सबसे कमज़ोर सामाजिक समूहों और प्रवासियों के ख़िलाफ़ भेदभाव को ख़त्म करने के लिए प्रतिबद्ध की अपीलों को पाते हैं।
अर्थव्यवस्था का हृदय है, कार्य
कार्य अर्थव्यस्था का हृदय है। इसके द्वारा, एक व्यक्ति अपना विकास करता है, वह अपने परिवार की जरुरतों को पूरा करता, अपने गुणों को व्यक्त करता, सामाजिक जीवन में सहभागी होता और ईश्वर के सृजनात्मक कार्य के संग सहयोग करते हुए विश्व को बेहतर बनाने में मदद करता है। काम को कभी भी इस तरह से नहीं बदला जाना चाहिए जिससे लोगों, जन-कल्याण या सृष्टि को नुकसान पहुँचे। हमारे लिए असल चुनौती हरएक को अवसर प्रदान करने की है जिससे वे अपनी योग्यताओं का अधिकतम उपयोग कर सकें- बेरोजगारी, शोषण और कार्यस्थल की परिस्थितियाँ जो स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरा उत्पन्न करती है, अस्वीकार्य है। यह श्रमिकों का अधिकार और कर्तव्य है कि वे निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागी हों जो उनके कार्यों को प्रभावित करता है, इसके साथ ही श्रम संगठनों के माध्यम उन्हें चाहिए कि वे अपनी समस्याओं का सामाधान वार्ता औऱ अहिंसक कार्य द्वारा करें।
