पत्रकारों से पोप लियो की बातचीत

रोम की वापसी यात्रा के समय पोप लियो 14 वें ने पत्रकारों से सभी लोगों तक सुसमाचार प्रसारित करने के अपने मिशन के बारे में बात की, ईरान और लेबनान में जारी युद्धों में मारे गए बच्चों को याद किया, प्राणदण्ड की निंदा की तथा अन्तरराष्ट्रीय कानून के सम्मान पर ज़ोर दिया।

कई मुद्दों पर चर्चा
“आप सभी का दिन शुभ हो। आशा है कि आप ठीक हैं और अगली यात्रा के लिए तैयार हैं। आपकी बैटरी पहले से ही पूरी तरह से रिचार्ज हो चुकी होगी!” इन शब्दों से पोप लियो विमान पर सवार लगभग 70 पत्रकारों से रुबरु हुए तथा उनके कई सवालों का उन्होंने जवाब दिया। इनमें उन्होंने युद्ध, अमरीकी-ईरान बातचीत, आप्रवास, प्राणदण्ड और समलैंगिक दम्पत्तियों को आशीर्वाद जैसे मुद्दों पर चर्चा की।

यात्रा का लक्ष्य साक्षात्कार  
पत्रकारों को सम्बोधित कर पोप ने कहा, जब मैं यात्रा करता हूँ, तो मैं अपने लिए बोलता हूँ, लेकिन आज कलीसिया के परमाध्यक्ष, रोम के धर्माध्यक्ष के रूप में बोल रहा हूँ। सबसे बढ़कर यह एक प्रेरितिक यात्रा है ताकि मैं ईश प्रजा का साक्षात्कार कर सकूँ, उनके साथ रह सकूँ और उन्हें जान सकूँ।

पोप ने कहाः प्रायः जो दिलचस्पी दिखाई जाती है वह अधिकतर राजनीति से जुड़ी होती है: ‘सन्त पापा इस या उस मुद्दे पर क्या कहते हैं? वह किसी एक देश की सरकार का न्याय क्यों नहीं करते?’ और निश्चित रूप से कहने के लिए बहुत सी बातें हैं। मैंने न्याय के बारे में बात की है और वे मुद्दे वहाँ हैं। लेकिन यह पहला शब्द नहीं है: यात्रा का सर्वोपरि उद्देश्य सुसमाचार प्रचार है, येसु ख्रीस्त के प्रेम सन्देश की घोषणा है, जो लोगों की खुशी में, उनके विश्वास की गहराई में, लेकिन उनके दुख में भी उनके करीब आने का एक तरीका है।

मिशन और ज़िम्मेदारी
अपने मिशन को स्पष्ट करते हुए पोप ने कहाः वहाँ, यह स्पष्ट है कि प्रायः टिप्पणी करना या लोगों को अपनी ज़िंदगी की ज़िम्मेदारी लेने के लिए बढ़ावा देने के तरीके खोजना ज़रूरी होता है। राष्ट्राध्यक्षों से बात करना भी ज़रूरी है ताकि सोच में बदलाव आए या सबकी भलाई के बारे में सोचने के लिये अधिक खुलापन आए और देश के संसाधनों के वितरण जैसे मुद्दों पर विचार किया जा सके। हमारी बातचीत में हमने थोड़ा-थोड़ा सब कुछ किया लेकिन सबसे बढ़कर हमने लोगों को उत्साहपूर्वक हमसे मिलते देखा।

इक्वेटोरियल गिनी में अपने अनुभव पर प्रकाश डालते हुए पोप ने कहाः मैं अपनी इस सम्पूर्ण  यात्रा से बहुत खुश हूँ, विशेष रूप से, इक्वेटोरियल गिनी के लोगों के साथ रहना और चलना सच में एक आशीर्वाद था। बारिश के साथ भी वे उस दिन खुश थे लेकिन सबसे बढ़कर यह सार्वभौमिक कलीसिया के साथ साझा करने का संकेत था जिसकी घोषणा हम अपने विश्वास में करते हैं।

नया नज़रिया अपनाये
ईरान पर अमरीकी-इस्राएली हमले के बाद शुरु हुई बातचीत और जिसके चलते विश्व्यापी अर्थव्यवस्था पर पड़े दुष्प्रभाव, ईरान में शासन के बदलाव और हाल के माहों में सड़कों पर हुए प्रदर्शम तथा नाभिकीय अस्त्रों के ख़तरों पर पूछे इताली टेलेविज़न के पत्रकार इग्नासियो इनग्राओ के सवाल के जवाब में पोप ने कहाः हमें एक नया नज़रिया और शांति की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहिए। प्रायः जब हम कुछ हालातों को देखते हैं तो तुरंत जवाब यही होता है कि हमें हिंसा, युद्ध और हमलों का रास्ता अपनाना चाहिए।

पोप ने कहाः हमने देखा है कि कई बेगुनाह लोग मारे गए हैं। मैंने अभी उन बच्चों के परिवारों का एक पत्र देखा जो हमले के पहले दिन मारे गए थे। वे बता रहे हैं कि कैसे उन्होंने अपने बच्चों को खो दिया जो उस घटना में मारे गए थे। मुद्दा यह नहीं है कि सरकार बदलेगी या नहीं; मुद्दा यह है कि इतने सारे निर्दोष लोगों की मृत्यु के बिना हम जिन मूल्यों में विश्वास करते हैं, उन्हें कैसे बढ़ावा दें।

अन्तरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करें  
उन्होंने कहाः ईरान में हालात साफ़ तौर पर बहुत मुश्किल हैं। यहाँ तक कि बातचीत भी, एक दिन ईरान हाँ कहता है और अमरीका ना कर देता है और यह सिलसिला चलता रहता है इसलिये हमें नहीं पता कि चीज़ें किस तरफ़ जा रही हैं। इस वजह से वैश्विक अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गई है और हालात गम्भीर बन गये हैं। साथ ही ईरान में भी इस जंग की वजह से बेगुनाह लोगों की एक पूरी आबादी परेशान है।

पोप ने कहाः मैं शांति के लिए बातचीत जारी रखने को बढ़ावा दूंगा कि सभी पक्ष शांति निर्माण हेतु युद्ध के ख़तरे को दूर करें और अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने की पूरी कोशिश करें। यह बहुत ज़रूरी है कि बेगुनाह लोगों को सुरक्षा मिले जैसा कि बहुत सी जगहों पर नहीं हुआ है।

शांति को बढ़ावा दें नफ़रत को नहीं
पोप ने बताया कि वे अपने साथ एक मुस्लिम बच्चे की तस्वीर लिये हैं, जो लेबनान यात्रा के दौरान वहाँ एक पोस्टर लिये इंतज़ार कर रहा था जिस पर लिखा था “वेलकम पोप लियो।” वह बच्चा  युद्ध के इस आखिरी चरण में मारा गया है। मानवीय परिस्थितियाँ कई होती हैं, और मुझे लगता है कि हमें इस नज़रिए से सोचना चाहिए। एक कलीसिया के तौर पर मैं दोहराता हूँ, एक मेषपाल के तौर पर मैं युद्ध का पक्षधर नहीं हो सकता। मैं सभी को साहस देना चाहूँगा कि वे ऐसे जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करें जो शांति की संस्कृति का फल हों न कि नफ़रत और बँटवारे का।