देवदूत प्रार्थना में पोप : ईश्वर के प्रति प्यार दूसरों के प्रति प्यार में प्रवाहित हो

रविवार को देवदूत प्रार्थना के दौरान पोप लियो 14वें ने सबसे बड़ी आज्ञा पर चिंतन किया। उन्होंने जोर दिया कि प्रेम विश्वास का मूल तत्व है जिसे हमारे आसपास के लोगों के लिए उपहार बनना चाहिए। पोप लियो 14वें ने कहा, "हम ईश्वर से तब तक सच्चा प्यार नहीं कर सकते जब तक यह प्यार हमारे भाइयों और बहनों के प्रति प्यार में न बदल जाए।"

वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 25 अक्टूबर को पोप लियो 14वें ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।

आज के सुसमाचार पाठ में प्रभु हमें पुनः हमारे विश्वास के केंद्र की ओर लेते हैं। (मती. 22: 34-40) एक शास्त्री येसु की परीक्षा लेने के लिए उनसे पूछता है, “संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?" (36) उसके सवाल का उत्तर देने के लिए प्रभु विधिविवरण ग्रंथ के एक पद का हवाला देते हैं: "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।” (विधि. 6:5)

ईश्वर के साथ हमारा व्यक्तिगत संबंध
पोप ने कहा, “ख्रीस्त, प्रेम को ईश्वर के साथ हमारे संबंध के केंद्र में रखते हैं। निश्चय ही, यह जानना कि  ईश्वर मौजूद हैं, वे एकमात्र ईश्वर हैं अथवा वे सार्वशक्तिमान हैं काफी नहीं है। प्रभु हमारे साथ व्यक्तिगत संबंध बनाना चाहते हैं। एक सच्चे ईश्वर हमारे ईश्वर बनना चाहते हैं।”   

इसलिए, “उनके साथ हमारी मुलाकात में, प्यार की आज्ञा न तो कोई मजबूरी है और न ही कोई थोपा हुआ दायित्व। असल में, कोई "आदेश पर" प्यार नहीं कर सकता। ईश्वर के प्रति प्रेम मानव की इच्छा का असली सार है, जो उनके साथ मिलकर पूरा होता है। इसी कारण से, हमारा प्यार तभी सच्चा हो सकता है जब यह उनके प्रेम का जवाब हो, जो हमेशा हमसे पहले प्रेम करते हैं। इससे एक पूरी प्रतिबद्धता की जरूरत पैदा होती है जिसमें पूरा व्यक्तित्व शामिल हो: दिल, आत्मा और दिमाग।

ख्रीस्त की नजरों से पड़ोसी को देखना
पहली आज्ञा के साथ, प्रभु एक दूसरी आज्ञा जोड़ते हैं: "तुम अपने पड़ोसी से अपने समान प्यार करो।" (मती. 22:39) जीवन का यह नियम उसी स्रोत से आता है; इसीलिए येसु कहते हैं कि यह पहले के समान ही है। ईश्वर के साथ हमारे करीबी रिश्ते की वजह से, हम खुद को और अपने पड़ोसियों को ख्रीस्त की नजर से, उनके नजरिए से देख पाते हैं। इस तरह, स्वार्थ दूर हो जाता है और खुद के लिए प्यार भी करुणा बन जाता है: हमारा अस्तित्व दूसरों की ओर मुड़ जाता है और हमारे आस-पास के लोगों के लिए एक उपहार बन जाता है।

प्रेम विश्वास को मूल तत्व प्रदान करता
पोप ने इसका उदाहरण देते हुए कहा, “बालक येसु की संत तेरेसा इसे अच्छी तरह समझती थी। उन्होंने लिखा, “प्रेम ही कलीसिया के सदस्य को कार्य करने के लिए प्रेरित कर सकता है और यदि प्रेम खत्म हो जाता तो प्रेरित सुसमाचार की घोषणा नहीं किये होते।” निश्चय ही, प्रेम के बिना हमारा विश्वास मूल तत्व से रहित होगा, हमारे अच्छे कार्य महज नैतिकतावाद और हमारी आशा व्यर्थ होगी।  

पोप ने विश्वासियों का आह्वान करते हुए कहा, “प्यारे मित्रो, हम ईश्वर से सच्चा प्रेम तब तक नहीं कर सकते जब तक कि यह प्रेम हमारे भाइयों और बहनों की ओर प्रवाहित न हो। और हम अपने पड़ोसी से सच्चा प्रेम तब तक नहीं कर सकते, जब तक कि उन्हें उसी पिता की संतान स्वीकार नहीं कर लेते, जिसने सबसे पहले अपने बेटे, येसु में हमसे प्रेम किया है।

आइए, हम प्रभु से एक नए दिल की कृपा मांगें, जो सबसे बड़ी आज्ञा को अपनाने और जीने में सक्षम हो। धन्य कुँवारी मरियम हमारी मध्यस्थता करें, जिनके निष्कलंक हृदय में प्यार के अलावा कुछ नहीं है।

इतना कहने के बाद पोप ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

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