पोप लियोः कलीसिया को प्रेम करें, उसकी रक्षा करें
पोप लियो 14वें ने गणतंत्र संत मरिनो की एकदिवसीय प्रेरितिक यात्रा के दौरान रीमीनी में “मित्रता पूर्ण संगोष्ठी” में सहभागी हो रहे प्रतिभागियों से भेंट करते हेतु उन्हें एकता, प्रेम और भाई-चारे में बने रहने का संदेश दिया।
पोप लियो ने 47वें “लोगों में मित्रता हेतु संगोष्टी” में सहभागी हो रहे प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा प्रिय भाइयो और बहनों, मैं रिमीनी में आपके संग मिलकर खुशी का अनुभव करता हूँ, आप की निष्ठा, सृजनात्मकता और वार्ता में आपका वार्षिक मिलन बहुत से लोगों को प्रेरित करता और उनके लिए वर्षों से जीवन का कारण रहा है।
मित्रता उत्पन्न करें
पोप ने संगोष्टी के नाम “लोगों से मित्रता हेतु संगोष्ठी” की सार्थकता और प्रेरिताई की गहरी महत्वपूर्ण पर चिंतन करते हुए कहा कि जैसे की संत पापा जोन पौल द्वितीय ने आप से कहा, “मित्रता हेतु एक मिलन”, “लोगों के बीच मित्रता”, इन शब्दों को सुनना मात्र ही हमारे हृदयों को आनंद से भर देता है। इतिहास के इस नाटकीय दौर में इन शब्दों का हमारे लिए एक विशेष अर्थ है। (29 अगस्त 1982)।
आज भी, पोप ने कहा, “शांति उन लोगों के हृदय में पोषित और प्रसारित होती है जो एक-दूसरे से भयभीत हुए बिना आपस में मिलन की एक चाह रखते हैं।” संत पापा फ्राँसिन ने अपने विश्व पत्र फ्रात्तेल्ली तूत्ती में हमें इस बात की शिक्षा दी है कि हम सामाजिक मित्रता उत्पन्न करें, जो अपने में सर्वाजनिक, गतिशील और ठोस रुप में भातृत्व की अभिव्यक्त है। वास्तव में, जब हम ईश्वरीय संतान के रूप में मानवीय सम्मान को पहचानते हैं, तो हम उस मानवता के संग अपने को संयुक्त करते हैं जे हमें हर विभिन्नता, विभाजन या संघर्ष से दूर करती है। हम एक-दूसरे के अनुभव में प्रवेश करते, उनकी सुनते और मित्र बनते हैं-सर्वप्रथम व्यक्तिगत रूप में और फिर एक समुदाय सदृश। सीमाओं, परिभाषाओं और संस्थाओं से पहले, हम सदैव व्यक्तियों को पाते हैं। उन्होंने कहा, “यह सचेतना ख्रीस्तीयता के हृदय में स्थापित है।” आप इसे अच्छी तरह वाकिफ हैं क्योंकि आप सुसमाचार का अध्ययन करते हैं जो ईश्वर के रहस्य की अभिव्यक्त है जो हम से मिलने आते हैं- एक घटना, एक दृश्य और एक अनुभव के रुप में- इस बात की सचेतना उत्पन्न करते हुए कि हममें से हर कोई प्रेम करने और प्रेम पाने की चाह रखता है। इस तरह, आपने “मिलन” को एक तरह का अपरिचित स्थान नहीं बनाया है। इसके विपरीत, यह कलीसिया और समाज के लिए एक चौराहा बन गया है: एक ऐसा मिलन जो आगे के मिलनों को जन्म देती है और नए मार्गों को प्रेरित करती है।
यह उत्तरदायित्व का समय
पोप लियो ने कहा कि हम इस सजीव विरासत के लिए ईश्वर का धन्यवाद करते हैं जो आप को कलीसिया की सीमाओं में एकता के एक ऐतिहासिक उत्तरदायित्व, मानवता की सेवा हेतु न्याय की भूख और प्यास प्रदान करती है। जैसे वाटिकन द्वितीय महासभा हमें शिक्षा देती है, “हमारे समय के लोगों की खुशियाँ और आशाएं, दुःख और तकलीफें विशेषकर वे जो गरीब या दुःख से पीड़ित हैं, वे उन लोगों की खुशियाँ और आशाएँ, दुःख और तकलीफें हैं जो खीस्त का अनुसरण करते हैं। कोई भी सच्ची मानवीय चीज़ उनके दिल में जगह बनाने से नहीं चूकती है।”( गैदियुम एत स्पेस, 1) उन्होंने कहा, “हाँ, प्रिय मित्रों, यह उत्तरदायित्व का समय है, विशेषकर उन लोगों के लिए जिन्होंने हजारों सालों के विश्वास की परंपरा को प्राप्त किया है जो संस्कृति को आकार देते हैं। विभिन्न मिलनों का संस्करण, जो वास्तव में, यह जानता है कि अतीत की वृहद विरासत से कला, संगीत, साहित्य, विज्ञान, अर्थव्यवस्था और विभिन्न मानवीय अभिव्यक्ति को कैसे निकाला जाये। इस वर्ष के मिलन की विषयवस्तु डिवाईन कोमेडी के अंतिम पद से ली गई गया है। “प्रेम जो सूर्य और अन्य नक्षत्रों” को संचालित करता है, अपने में लुप्त नहीं हुआ है, इसने न तो अपना जोश और न ही अपनी तीव्रता खोयी है। यद्यपि यह एक वह प्रेम है जो अपने को शांत रखता है, उन शोरशराबों के विपरीत जो पृथ्वी, आकाश और सभी प्राणियों को हिलाती है।
प्रेम में गतिशीलता
पोप लियो 14वें ने कहा, “हाँ, प्रेम हमें गतिशील बनाता है।” ईश्वर “भले और बुरे, दोनों पर सूर्य उगाता है, और वह धर्मी और विधर्मी दोनों के लिए लिए पानी बरसाता है।” (मत्ती.5.45) येसु इस रुप में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठता का जिक्र करते हैं, जहाँ हम ईश्वर के उदारता पूर्ण कार्यों और मानव के संकीर्ण विचारों के बीच अंतर पाते हैं। हमारा हिसाब करना वास्तविकता का दम घोंट देती है, लेकिन ईश्वर की उदारता उसे स्वतंत्र रूप से सांस लेने देती है। संत पापा ने अपने पूर्वार्ती परर्माध्यक्षों, संत पापा जोन पौल द्वितीय, बेनेदिक्त 16वें और संत पापा फ्रांसिस के दिव्य विचारों की ओर ध्यान आकर्षित कराते हुए कहा कि सबों ने दिव्य करूणा को इस युग के आश्चर्यजनक “नई चीजों” और सुसमाचार के मध्य मिलन बिंदु के रूप में इंगित किया है। बीसवीं सदी की नई शुरूआत और त्रासदियों के मध्य येसु ख्रीस्त का अनुसरण करना, वास्तव में, हममें स्पष्ट रूप से इस चेतना की मांग करती है कि बुराई पर जीत बुराई से नहीं हो सकती है। जैसे कि स्वर्ग में वैसे ही पृथ्वी पर, प्रेम जीवन का नियम और मुक्ति का माध्यम है- यह क्रूसित मसीह का मार्ग है। आज, ख्रीस्तीय संस्कृति को झूठे यथार्थवाद का सामना करना होगा जो मन, शब्दों और देशों को फिर से ताकतवर बनाता है, दया के यथार्थवाद से जो यह मानता है कि कोई दुश्मन नहीं हो सकता, और हर कोई, यहाँ तक कि जो हमारा विरोध करता है, वह भी एक भाई या बहन है जिसकी आँखों में आँखें डालकर हमारा मिलन सच्चाई से होता है।
