कार्डिनल परोलिन : युवाओं में निवेश करें, और उन्हें 'शिकार' बनने से रोकें
रोम के पास सक्रोफानो शहर में “कथेड्रा ऑफ हॉस्पिटालिटी” में बोलते हुए, वाटिकन राज्य सचिव, कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने युवाओं के सामने आनेवाले खतरों पर जोर दिया, जिसमें युद्ध, कट्टरवाद, आप्रवासन की चुनौतियाँ और कम जन्म दर आदि विषय शामिल हैं, और उन्हें सही मौका देने की जरूरत पर जोर दिया।
कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने मंगलवार को "कथेड्रा ऑफ हॉस्पिटालिटी" में अपनी बातें रखीं। "काथेड्रा ऑफ हॉस्पिटालिटी" एक सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कार्यक्रम है। सक्रोफानो के फ्रातेरना दोमस में हुए इस कार्यक्रम की विषयवस्तु थी, “युवा और कलीसिया: आतिथ्य जो अपनेपन को बढ़ावा देती है।” रोम के परमधर्मपीठीय लातेरन यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर आंदोलनों और तीसरे विभाग के संगठनों द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम, मौजूदा मुद्दों पर बातचीत और सोच-विचार के लिए जगह बनी।
अपने वक्तव्य में, कार्डिनल पारोलिन ने जोर देकर कहा कि युवा लड़ाई के शिकार हो रहे हैं, जिन्हें यूक्रेन या अफ्रीकी देशों में लड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। वे कट्टरपंथ और दूसरे "प्रलोभन" के आसान शिकार होते हैं क्योंकि उनके पास मौके नहीं होते। वे डर से बच्चे पैदा करने से बचते हैं, भारी जिम्मेदारियों को न निभा पाने की शिकायत करते हैं, या असलियत से दूर होकर वर्चुअल दुनिया में शरण लेते हैं। कार्डिनल पारोलिन ने कहा कि जो युवा आप्रवासन में एकीकृत नहीं हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है, या जो अपनी पहचान, जिसमें उनकी ख्रीस्तीय पहचान भी शामिल है, उसे खोजने के लिए संघर्ष करते हैं, और उन्हें भी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
कार्डिनल परोलिन ने कहा, “ये वो युवा हैं, जिन्हें हमें ‘संभावनाएँ’ देनी चाहिए; हमें उनमें ‘निवेश’ करना चाहिए और ‘शांति का भविष्य’ बनाने के लिए उन्हें ‘मुख्य पात्र’ बनाना चाहिए।”
पलायन और कम जन्म दर
बुर्किना फासो की यात्रा से लौटते हुए, जहाँ उन्होंने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और गबॉन के नए राजदूत मोनसिन्योर किसितो ओएड्राओगो के धर्माध्यक्षीय अभिषेक की अध्यक्षता की, कार्डिनल पारोलिन ने अपनी चर्चा शुरू की।
उन्होंने कहा, “तनाव के कारण हमारे फंसने का खतरा था।”
एक भाषण से ज्यादा, उनकी चर्चा प्रोफेसर विन्चेंसो बुओनोमो के साथ एक बातचीत थी, जिसमें उन्होंने उन हालातों पर गौर किया जिनमें युवा रहते हैं: उनके योगदान, उनकी गैर-मौजूदगी, हिस्सा लेने और काम करने में आनेवाले मुश्किलें और वे चीजें जो उन्हें प्रभावित या परेशान करती हैं।
इनमें से पहला है प्रवासन और आप्रवासियों का एकीकरण, जिसे कार्डिनल परोलिन ने “अनसुलझी चुनौती” बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों में कई कोशिशों के बावजूद, “एक अच्छा हल निकालने के लिए और सोचने एवं योगदान देने की जरूरत है।”
दूसरा है कम जन्म दर का मुद्दा। कार्डिनल ने कहा, “यह भविष्य के लिए जो रास्ता होना चाहिए, उसके ठीक विपरीत है।” उन्होंने “युवाओं के जन्म देने में आनेवाली मुश्किलताओं” पर जोर दिया और कहा, “युद्ध भविष्य के लिए डर बढ़ाता है और जिससे बच्चों को दुनिया में लाने की इच्छा नहीं होती।”
उन्होंने प्रश्न किया, “सबसे बड़ा मूल्य क्या है? आत्म ज्ञान? या खुद का दान करना? अगर बच्चे को समाज में कामयाबी के लिए रुकावट माना जाता है, तो नये जीवन का रास्ता बंद हो जाता है।”
कट्टरपंथ का खतरा
कार्डिनल परोलिन ने कहा, “यह बात पश्चिमी दुनिया की खासियत है,” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अफ्रीका “तेजी से बढ़ रहा है।” उन्होंने जोर देकर कहा, “युवाओं को भविष्य के लिए मौके दिए जाने चाहिए क्योंकि जब उनके पास पढ़ाई, काम और मौके नहीं होते, तो वे कट्टरपंथियों के शिकार बनते हैं, और वे सहज ही ऐसे प्रलोभनों के शिकार बन जाते हैं।”
उन्होंने आगे कहा, “युवा ही लड़ते हैं, मोर्चे पर जाते हैं,” उन्होंने “अफ्रीका में कई भूले-बिसरे युद्धों” और यूक्रेन में जारी युद्ध का जिक्र किया।
संस्थानों में अधिक जगह
कार्डिनल परोलिन ने इस बात का भी जिक्र किया कि “जहाँ सिर्फ बड़े लोग ही बातचीत और चर्चा में हिस्सा लेते हैं, युवाओं को ज्यादा हिस्सा लेना चाहिए, सिर्फ इसलिए नहीं कि भविष्य उनका है, बल्कि इसलिए भी कि समाधान उनसे आ सकते हैं।”
इसी वजह से, उन्होंने “संस्थानों, खासकर अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में, युवाओं के योगदान के लिए ज्यादा खुलापन लाने” की अपील की। उन्होंने जोर देकर कहा, “अंतरराष्ट्रीय संस्थान को नया बनाना होगा क्योंकि अब हालात शीत युद्ध या युद्ध के बाद के दौर जैसे नहीं रहे, और मुझे लगता है कि युवाओं के योगदान पर गंभीरता से सोचना चाहिए। हमें संस्थानों में पढ़े-लिखे युवाओं की जरूरत है।”
अयोग्य महसूस करना
कार्डिनल परोलिन ने कहा कि कई युवा “अत्यधिक निराशा महसूस करते हैं जब उनसे ऐसे काम करवाए जाते जिन्हें करने में वे अयोग्य महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे इसके लिए तैयार नहीं हैं।”
उन्होंने सुझाव दिया कि इसका हल सीधा है: “कोई उन्हें खुलकर प्यार करे, जो उन्हें परिणामों से बढ़कर प्यार करे। और हमारे लिए ईश्वर हैं, जो नतीजों के बावजूद हमसे प्यार करते हैं।”
कार्डिनल ने आगे कहा कि युवा पुरुषों और महिलाओं को “एक ऐसा ईश्वर मिलना चाहिए जो पूर्णता की मांग नहीं करता बल्कि हमारी उपलब्धियों से ऊपर हमसे प्यार करता और हमें महत्व देता है।”
मूल्यों को आगे बढ़ाना
कार्डिनल ने कहा कि युवाओं को “ख्रीस्तीय पहचान बनाने” और “मूल्यों को आगे बढ़ाने” का प्रोत्साहन देना जरूरी है, जिसमें कभी परिवार, स्कूल और पल्ली शामिल थे, लेकिन, आज “इन संस्थानों के बीच काम एक साथ नहीं होता।”
कार्डिनल परोलिन ने कहा कि कलीसिया को “दोहरा तरीका” अपनाना चाहिए: पहला, “सुनना,” यानी युवाओं की बात सुनने के तरीके और मौके ढूंढना। दूसरा, “उनके रास्ते पर, उनकी मुश्किलों में उनका साथ देना।”
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