पोप : राजनयिकों को आशा के पुल बनना चाहिए जब अच्छाई हिल रही हो

जब परमधर्मपीठीय कलीसियाई अकादमी अपनी 325वीं सालगिरह मना रही है, पोप लियो 14वें अपने राजनयिकों को सुसमाचार के आलोक में मेल-मिलाप के रास्ते खोजने के लिए अपने प्रेरितिक बुलाहट को अपनाने हेतु आमंत्रित कर रहे हैं।

1701 में, पोप क्लेमेंट 11वें ने एक संस्था बनाई जिसका नाम आज “परमधर्मपीठीय कलीसियाई अकादमी” है।

यह शिक्षण संस्थान पुरोहितों को परमधर्मपीठ के राजनयिक कोर और वाटिकन राज्य सचिवालय में सेवा करने के लिए प्रशिक्षण देती है। इसके पुराने विद्यार्थियों में पोप क्लेमेंट 13वें, पोप लियो 12वें, पोप लियो 13वें, पोप बेनेडिक्ट 15वें, और पोप पॉल छटवें शामिल हैं।

जब परमधर्मपीठीय कलीसियाई अकादमी अपनी 325वीं सालगिरह मना रही है, तो पोप लियो 14वें ने संस्था के समुदाय को एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने संत पापा की सेवा में इसके लंबे और सफल इतिहास के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा किया है।

उन्होंने याद किया है कि उनसे पहले कई लोगों ने संस्थान के मिशन और विकास को सुरक्षित रखा, ताकि वाटिकन के पास हमेशा ऐसे राजनयिक रहें जो पोप का प्रतिनिधित्व कर सकें।

अपनी मृत्यु के कुछ दिनों पहले पोप फ्राँसिस ने एक काईरोग्राफ जारी किया जिसका शीर्षक था, “इल मिनिस्तेरो पेत्रिनो” (पेत्रुस की प्रेरिताई), जिसने इसे राजनयिकशास्त्र में उच्च शैक्षणिक प्रशिक्षण और शोध का एक उन्नत केंद्र बनाया।

पोप लियो ने अपने पूर्वाधिकारियों द्वारा शैक्षणिक संस्थान को वाटिकन के राजनयिक कार्य के सीधे साधन के रूप में सुदृढ़ करने को सही ठहराया।

उन्होंने कहा, “ये नवीनतम सुधार, एक ऐसे प्रशिक्षण कोर्स को शुरू करने के मकसद को दिखाते हैं जो एक मजबूत वैज्ञानिक बुनियाद पर बना हो, और कानूनी, ऐतिहासिक, राजनीतिक, आर्थिक और भाषाई काबिलियत को जोड़ सके एवं उन्हें युवा पुरोहितों के मानवीय और पुरोहितीय गुणों के साथ जोड़ सके।”

उन्होंने अकादमी के सुपीरियर और विद्यार्थियों को “विश्वास और खुलेपन की भावना से मेलजोल और नएपन का रास्ता अपनाने, अपनी जड़ों को भूले बिना बदलावों का स्वागत करने” के लिए भी धन्यवाद दिया।

पोप लियो ने उपस्थित विद्यार्थियों को अपनी ट्रेनिंग में लगे रहने के लिए आमंत्रित किया, यह याद दिलाते हुए कि राजनयिक सेवा कोई पेशा नहीं है, बल्कि मेल-मिलाप के रास्ते खोजने का एक प्रेरितिक बुलाहट है, जहाँ दूसरे दीवारें खड़ी करते एवं अविश्वास फैलाते हैं।

पोप ने कहा, “हमारी कूटनीति सुसमाचार से उत्पन्न हुई है। यह रणनीति नहीं बल्कि तार्किक उदारता है जो न तो जीतनेवाले और न ही हारनेवाले को खोजता है। यह कोई घेरा नहीं बनाता बल्कि सच्चे रिश्तों की रक्षा करता है।

पोप ने अपने डिप्लोमैट्स को ताकतवर लोगों से बात करने से पहले ईश्वर और दुनिया के कमजोर लोगों की बात सुनने के लिए कहा।

उन्होंने कहा, “पोप के राजनयिकों को अदृश्य, मजबूत पुल बनने के लिए कहा है जो तब सहारा देते हैं जब घटनाओं को रोकना मुश्किल लगता है, उम्मीद के पुल जब अच्छाई डगमगाती है।”

अंत में, पोप लियो 14वें ने परमधर्मपीठीय कलीसियाई अकादमी के विद्यार्थियों और पुराने विद्यार्थियों को अपने संरक्षक, मठाधीश संत अंतोनी की नकल करने के लिए कहा, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि वे जानते थे कि “रेगिस्तान की खामोशी को ईश्वर के साथ लाभदायक बातचीत में कैसे बदला जाए।”

उन्होंने कहा, “गहरी आध्यात्मिकता के पुरोहित बनो, ताकि प्रार्थना से दूसरों से मिलने के लिए जरूरी ताकत मिल सके।”