देवदूत प्रार्थना में पोप : हम ईश्वर की नजर में मूल्यवान हैं
रविवार को वाटिकन में देवदूत प्रार्थना के पूर्व अपने संदेश में पोप लियो 14वें ने ख्रीस्तीयों से कहा कि वे जागते रहें, जो जरूरी है उस पर ध्यान दें, और यह कभी न भूलें कि हम ईश्वर की नजर में कितने मूल्यवान हैं।
वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में रविवार 18 जनवरी को पोप लियो 14वें भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।
उन्होंने सुसमाचार पाठ (यो.1:29-34) पर चिंतन किया जिसमें योहन बपतिस्ता के बारे बतलाया गया है। योहन बपतिस्ता ने येसु को ईश्वर के मेमने, मसीह के रूप में पहचाना, और घोषणा की, देखो ईश्वर का मेमना, जो दुनिया के पाप हर लेते हैं।
पोप ने कहा, “मैं इसलिए जल से बपतिस्मा देने आया हूँ कि वह इस्राएल पर प्रकट हो जाएँ।” (पद 31)
योहन ने येसु को मुक्तिदाता के रूप में पहचाना; उसने इस्राएल के लोगों को येसु के ईश्वर होने और उनके मिशन के बारे में बताया और फिर अपना काम पूरा करके किनारे हो गया, जैसा कि उसके शब्दों से पता चलता है: “मेरे बाद एक पुरुष आनेवाले हैं। वह मुझ से बढ़कर हैं, क्योंकि वह मुझ से पहले विद्यमान थे।” (पद 30)।
बपतिस्ता एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें भीड़ पसंद करती थी इतना कि येरूसालेम में अधिकारी भी उनसे घबराते थे। (योहन 1:19)
महत्वपूर्ण साक्ष्य
वे अपनी ख्याति का गलत फायदा उठा सकते थे, लेकिन, वे सफलता और लोकप्रियता के लालच में नहीं झुके। येसु के सामने, उसने अपने छोटेपन को स्वीकारा और येसु की महानता के लिए जगह बनाई। योहन जानते थे कि उन्हें प्रभु का रास्ता तैयार करने के लिए भेजा गया था और जब प्रभु आए, तो खुशी एवं विनम्रता के साथ उसने ईश्वर की उपस्थिति को माना और सुर्खियों से बाहर निकल गये।
पोप ने कहा, “आज हमारे लिए उनकी गवाही कितनी जरूरी है! वास्तव में, मंजूरी, आम सहमति और पहचान को अक्सर बहुत ज्यादा अहमियत दी जाती है, यहाँ तक कि यह लोगों के विचारों, व्यवहार और उनके आंतरिक जीवन को भी तय करती है। इससे दुःख और विभाजन होता है, और ऐसी जीवनशैली एवं रिश्ते बनते हैं जो नाजुक, निराशाजनक और बंद होते हैं। सच तो यह है कि हमें इस “खुशी के बदले” चीजों की जरूरत नहीं है। हमारी खुशी और महानता सफलता या शोहरत के पलभर के भ्रम पर नहीं, बल्कि यह जानने पर टिकी है कि हमारे स्वार्गिक पिता हमसे प्यार करते हैं और उन्हें चाहते हैं।
उनकी नजरों में मूल्यवान
येसु जिस प्यार की बात कर रहे हैं वह ईश्वर का प्यार है जो आज भी हमारे बीच आते हैं, हमें शानदार दिखावे से विस्मित करने के लिए नहीं, बल्कि हमारे संघर्षों में शामिल होने और हमारा बोझ अपने ऊपर लेने के लिए। ऐसा करके, वे हमें यह सच्चाई बताते है कि हम कौन हैं और उनकी नजर में हम कितने मूल्यवान हैं।
पोप ने विश्वासियों को सम्बोधित करते हुए कहा, “प्यारे मित्रो, आइए हम अपने बीच प्रभु की उपस्थिति से ध्यान भटकने न दें। हम दिखावे के पीछे भागकर अपना समय और ऊर्जा बर्बाद न करें। बल्कि, योहन बपतिस्ता से जागरूक रहना, सादगी पसंद करना, अपनी बातों में सच्चे बने रहना, संयम रखना, और मन एवं दिल की गहराई में बढ़ना सीख सकें।”
उन्होंने सलाह देते हुए कहा, “आइए, हम जो जरूरी है, उसी में खुश रहें और हर दिन, जब हो सके, कुछ समय के लिए चुपचाप प्रार्थना करने, चिंतन करने और सुनने के लिए समय निकालें – दूसरे शब्दों में, “निर्जन प्रदेश में चले जाएँ”, ताकि प्रभु से मिल सकें और उनके साथ रह सकें।”
पोप ने माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, “सादगी, समझदारी और विनम्रता की मिसाल कुँवारी मरियम इस इरादे में हमारी मदद करें।”
इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।
ख्रीस्तीय एकता प्रार्थना सप्ताह
देवदूत प्रार्थना के उपरांत संत पापा ने ख्रीस्तीय एकता प्रार्थना सप्ताह की याद दिलायी, जो 18 से 25 जनवरी को होता है।
पोप ने कहा, “प्यारे भाइयो एवं बहनो, आज से ख्रीस्तीय एकता के लिए प्रार्थना सप्ताह की शुरुआत हो रही है। इस पहल की शुरुआत दो सदी पहले हुई थी, और पोप लियो 13वें ने इसे बहुत बढ़ावा दिया था। ठीक सौ साल पहले, “ख्रीस्तीय एकता के लिए प्रार्थना सप्ताह का सुझाव” पहली बार प्रकाशित हुआ था। इस साल की विषयवस्तु को एफिसियों को लिखे संत पौलुस के पत्र से ली गई है: “एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।” (4:4)
प्रार्थनाएँ और चिंतन एक ख्रीस्तीय एकता दल ने तैयार किए थे, जिसे आर्मेनियाई प्रेरितिक कलीसिया के अंतर- कलीसियाई संबंध विभाग ने समन्वित किया था। संत पापा ने कहा, “इन दिनों, मैं सभी काथलिक समुदायों को सभी ख्रीस्तीयों की पूर्ण एकता के लिए अपनी प्रार्थनाएँ और गहरी करने के लिए आमंत्रित करता हूँ।
एकता के लिए हमारी जिम्मेदारी के साथ-साथ दुनिया में शांति और न्याय के लिए हमारा दृढ़ संकल्प भी होना चाहिए।”
कोंगो के लिए प्रार्थना का आह्वान
उसके बाद पोप ने कोंगो के लोगों की याद करते हुए कहा, “आज, मैं खास रूप से पूर्वी लोकतांत्रिक गणराज्य कांगो के लोगों की तकलीफों को याद करता हूँ। हिंसा की वजह से कई लोगों को अपने देश – खासकर बुरुंडी – से भागने पर मजबूर होना पड़ा है, और वे एक गंभीर मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं। आइए, हम प्रार्थना करें कि झगड़े में शामिल पक्षों के बीच मेल-मिलाप और शांति के लिए बातचीत हमेशा प्रबल हो सके।”
पोप ने दक्षिणी अफ्रीका के बाढ़ पीड़ितों की भी याद की एवं उन्हें अपनी प्रार्थनाओं का आश्वासन दिया।
तत्पश्चात् उन्होंने सभी तीर्थयात्रियों का अभिवादन किया तथा उनकी उपस्थिति एवं प्रार्थनाओँ के लिए धन्यवाद दिया। अंत में, सभी को शुभ रविवार की मंगल कामनाएँ अर्पित कीं।