मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में गैर-हिंदुओं के हिंदू मंदिरों में प्रवेश पर रोक लगाई

तमिलनाडु की एक उच्च अदालत ने फैसला सुनाया है कि जो लोग गैर-हिंदू हैं, अपने धर्म के धार्मिक प्रतीक धारण करते हैं और हिंदू देवी-देवताओं के प्रति सम्मान व्यक्त नहीं करते, उन्हें राज्य के 'आगमिक' (Agamic) मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।

'आगमिक' मंदिर ऐसे हिंदू पूजा स्थल होते हैं, जिनका निर्माण, प्राण-प्रतिष्ठा और संचालन पूरी तरह से 'आगमों' (Agamas) के अनुसार किया जाता है। 'आगम' पारंपरिक पवित्र ग्रंथ और नियमावलियां हैं, जिनमें मंदिर की वास्तुकला, अनुष्ठान, मूर्तिकला और शुद्धिकरण के नियम दिए गए हैं।

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने 23 अक्टूबर को एक आदेश दिया (जिसे 27 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया), जिसमें कहा गया कि इन मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश "इनकी पवित्रता का उल्लंघन करेगा।"

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की खंडपीठ ने यह आदेश थंगम वेंकटेश नामक एक हिंदू भक्त की याचिका पर दिया। याचिकाकर्ता ने मंदिरों में प्रवेश से जुड़े कानूनों को लागू करने और 'आगमों' के नियमों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की थी।

अदालत ने कहा, "याचिकाकर्ता को यह मांग करने का अधिकार है कि तमिलनाडु के विभिन्न 'आगमिक' मंदिरों के ट्रस्टी 'आगमों' के नियमों का पालन करें। इसके तहत, जो गैर-हिंदू एक औपचारिक घोषणा-पत्र (undertaking) पर हस्ताक्षर नहीं करते, उन्हें मंदिर के ध्वज-स्तंभ (flagpole) के आगे जाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।"

ध्वज-स्तंभ एक पवित्र खंभा होता है, जो पारंपरिक हिंदू मंदिरों में मुख्य गर्भगृह या सामने के मंडप के ठीक सामने स्थापित किया जाता है।

न्यायाधीशों ने कहा, "यदि ऐसे लोगों को प्रवेश की अनुमति दी जाती है, तो इससे मंदिर की पवित्रता दूषित हो जाएगी।"

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई गैर-हिंदू किसी हिंदू देवी-देवता के प्रति सम्मान व्यक्त करना चाहता है, तो उसे "संबंधित संस्थान द्वारा निर्धारित प्रारूप" में ऐसा करना होगा।

न्यायाधीशों ने सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो का जिक्र किया, जिसमें कुछ लोग (जो आमतौर पर मुस्लिम पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली टोपी पहने हुए थे) भक्तों के विरोध के बावजूद एक हिंदू मंदिर में प्रवेश करते दिख रहे हैं। अदालत ने मंदिर के कर्मचारियों की इस बात के लिए आलोचना की कि वे केवल "मूक दर्शक" बने रहे।

आदेश में मदुरै शहर के प्रसिद्ध मीनाक्षी मंदिर में एक स्थानीय मुस्लिम विधायक के प्रवेश का भी उल्लेख किया गया। बताया जाता है कि उन्होंने भक्तों और आगंतुकों के लिए उपलब्ध सुविधाओं का निरीक्षण करने के अधिकार का दावा किया था।

इसके विपरीत, अदालत ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय (Joseph Vijay) का उदाहरण दिया, जो कैथोलिक होने के बावजूद, एक औपचारिक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद मीनाक्षी मंदिर में पूजा-अर्चना करने गए थे। न्यायाधीशों ने कहा कि उनसे धर्म परिवर्तन के लिए नहीं कहा गया था, बल्कि केवल देवता के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए कहा गया था। उन्होंने इसे एक "समावेशी दृष्टिकोण" बताया।

ऑल इंडिया कैथोलिक यूनियन के प्रवक्ता जॉन दयाल ने कहा कि इस तरह के फैसले हिंदू धर्म की वैश्विक छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। हिंदू धर्म के धार्मिक नेताओं के साथ-साथ भारत की हिंदू-समर्थक केंद्र सरकार और उसके विचारकों ने भी इसे सहिष्णुता का धर्म बताया है।

उन्होंने 28 अक्टूबर को UCA न्यूज़ से कहा, "भारत में मस्जिदों, गुरुद्वारों, बौद्ध विहारों और ईसाई चर्चों में अन्य धर्मों, जातियों या राष्ट्रीयताओं के लोगों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है।"

दयाल ने आगे कहा, "यहाँ सभी का स्वागत है, और गुरुद्वारों में तो लोगों को मुफ्त भोजन भी कराया जाता है।"

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में लोयोला इंस्टीट्यूशंस के रेक्टर, जेसुइट फादर फ्रांसिस पी. ज़ेवियर ने कहा कि किसी को भी पूजा-स्थल में प्रवेश करने और प्रार्थना करने से नहीं रोका जाना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा, "मंदिर में प्रवेश से रोकना इस सार्वभौमिक समझ के खिलाफ है कि इंसान एक ही परिवार हैं, जिन्हें एक ही ईश्वर ने बनाया है — भले ही हम ईश्वर के लिए अलग-अलग नामों और रूपों का उपयोग करते हों।"

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