मणिपुर कैंप में हुई मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा

सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के सबसे बड़े सरकारी अधिकारी को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। यह रिपोर्ट पूर्वोत्तर राज्य में सरकारी राहत कैंपों में रह रहे 25 विस्थापित लोगों की असामान्य मौतों के हालात के बारे में है।

अदालत ने राज्य सरकार से राहत कैंपों में रह रहे आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों (IDPs) की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी मांगी। सरकार गीता मित्तल कमेटी को असामान्य मौतों का विवरण देने में विफल रही थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ितों के लिए राहत और पुनर्वास के प्रयासों की निगरानी के लिए एक न्यायिक समिति नियुक्त की थी। इसकी अध्यक्षता जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल कर रही हैं। इन पीड़ितों में वे लोग भी शामिल हैं जो मई 2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के कारण विस्थापित हुए थे।

यह हिंसा मूल निवासी कुकी-ज़ो और मुख्य रूप से हिंदू मैतेई समुदायों के बीच भड़की थी। हिंसा तब शुरू हुई जब आदिवासी समूहों ने मणिपुर हाई कोर्ट के उस आदेश का विरोध किया जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की सिफारिश की गई थी; यह विरोध हिंसक हो गया।

हिंसा शुरू होने के बाद से 260 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और 60,000 से ज़्यादा लोग विस्थापित हुए हैं। मारे गए और विस्थापित हुए लोगों में ज़्यादातर मूल निवासी ईसाई हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने - जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे - मणिपुर के मुख्य सचिव को 25 असामान्य मौतों का पूरा विवरण देने का निर्देश दिया। इसमें पोस्टमार्टम रिपोर्ट और मौत के कारणों का पता लगाने वाले अन्य संबंधित दस्तावेज़ शामिल हैं।

अदालत ने राज्य सरकार को राहत कैंपों में IDPs की सुरक्षा के लिए किए गए सुधारात्मक और सुरक्षा उपायों के बारे में बताने का भी आदेश दिया, खासकर तब जब एक कैंप में कथित यौन उत्पीड़न की जानकारी मिली थी।

अदालत राहत कैंपों में रह रहे लोगों के पुनर्वास के प्रयासों की प्रगति और पिछले तीन वर्षों में जातीय हिंसा के संबंध में दर्ज 3,000 से अधिक मामलों की जांच की समीक्षा कर रही थी।

बेंच ने उन रिपोर्टों पर भी ध्यान दिया जिनमें कहा गया था कि आठ जिलों में राहत कैंपों में 640 विस्थापित लोगों की मौत हुई है। अदालत ने राज्य सरकार से सवाल किया कि केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम क्यों किए गए।

अदालत ने कैंपों में मरने वाले लोगों के परिवारों को केवल 20,000 से 30,000 भारतीय रुपये का मुआवजा दिए जाने और विस्थापित लोगों को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने मणिपुर लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे यह पक्का करें कि असामान्य मौतों के सभी मामलों में FIR दर्ज हों, मौत की वजहों का पता लगाया जाए और राहत कैंपों में विस्थापित लोगों (IDPs) की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों का आकलन किया जाए।

कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह कैंपों में रह रहे लोगों के लिए पर्याप्त मेडिकल सुविधाएं और रोज़मर्रा की बुनियादी ज़रूरतें उपलब्ध कराए।

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि उसने आठ ज़िलों में हिंसा से जुड़े 3,020 मामलों की जांच के लिए 42 स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीमें बनाई हैं।

सरकार ने कहा कि 302 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई हैं, 1,583 मामलों में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की गई हैं और 1,135 मामलों की जांच अभी चल रही है। 33 मामलों में ट्रायल शुरू हो चुके हैं।

चर्च के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्वागत किया, लेकिन उन्होंने चिंता जताई कि हो सकता है कि इन आदेशों को ज़मीनी स्तर पर लागू न किया जाए।

बदले की कार्रवाई के डर से नाम न बताने की शर्त पर एक चर्च नेता ने UCA न्यूज़ से कहा, "राज्य में मैतेई-नियंत्रित प्रशासन की उदासीनता के कारण शीर्ष अदालत के आदेश ज़्यादातर कागज़ों तक ही सीमित रह जाते हैं।"

चर्च नेता ने 18 सितंबर को कहा कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार और राज्य प्रशासन "मैतेई लोगों के नियंत्रण में हैं, जो विस्थापित लोगों की कभी परवाह नहीं करते, जिनमें से ज़्यादातर कुकी-ज़ो समुदायों से हैं।"

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