मानव तस्करों से पोप : प्रायश्चित करें! ईश्वर का न्याय आपकी प्रतीक्षा में है
तेनेरिफ में आप्रवासियों के साथ काम करनेवाले संगठनों से मिलते हुए, पोप लियो 14वें ने एकीकरण को एक साझा जिम्मेदारी बताया जो सम्मान और अपनापन वापस लाती है, साथ ही मानव तस्करों से ईश्वर के न्याय का सामना करने से पहले प्रायश्चित करने की अपील की।
एक पुरोहित एवं तीन आप्रवासियों का साक्ष्य सुनने के बाद पोप लियो 14वें ने तेरेरिफ के प्लाजा देल क्रिस्तो देला लगुना में आप्रवासियों और उनके एकीकरण के लिए काम करनेवाले संगठनों को अपना संदेश किया।
“दीवारों से रहित शहर”
पोप ने कहा, “इस धर्मप्रांत के मुख्यालय, सन क्रिस्टोबल दे ला लगुना में, आपके साथ इस पल को व्यतीत करना, मेरे लिए खुशी की बात है। इस शहर के बारे में जो कहा गया है, उससे मैं विस्मित हूँ: यह बिना दीवारों वाला, एक खुला शहर है।”
शायद यह बात हमें यह समझने में मदद कर सकती है कि जिन रुकावटों को तोड़ना सबसे मुश्किल होता, वे हमेशा पत्थर की नहीं होतीं। कभी-कभी वे हमारे नजरिए में, डर में या उदासीनता में होती हैं। इन द्वीपों को घेरे हुए यह समुद्र हमारे लिए ऐसी कहानियाँ लाता है जिनका मतलब हम अक्सर नहीं समझ पाते: दर्द की कहानियाँ, उम्मीदों की कहानियाँ और खोज की कहानियाँ। बिना दीवारोंवाले शहर में, दिल भी उन लोगों का स्वागत करने के लिए खुल जाता है जो इन कहानियों को अपने साथ लाते हैं। इसीलिए हमें सामीप्य की भाषा सीखने की जरूरत है, जिसे शब्दों से ज्यादा हाथों से समझा जाता है।
दूसरी तरह से देखने सीखना
ब्रेल (नेत्रहीन लोगों के लिए प्रयुक्त लिपि) और स्पर्श योग्य दूसरी तरह की लिखावट हमें याद दिलाती है कि शब्दों को छूकर भी पढ़ा जा सकता है। उसी तरह, जुड़ने के लिए एक अलग तरीके से पढ़ने सीखना होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनकी नजरें देखती हैं, फिर भी पहचान नहीं पातीं; वे एक चेहरे को एक नंबर में, एक कहानी को एक दस्तावेज में और विविधता को दूरी में बदल देते हैं। इसलिए, सुसमाचार हमें असलियत को पढ़ने का एक गहरा तरीका सिखाता है: जो सामीप्य, धैर्य और मदद करने, साथ देने, मार्गदर्शन करने, सिखाने और रास्ते खोलने में साक्षम हाथों से शुरू होता है।
हमारे इन भाइयों और बहनों को जोड़ने की कोशिशों में — जैसा कि हर उदार कार्य में होता है — कलीसिया उन लोगों के असल जीवन में पढ़ना सीखती है जो शरीर या आत्मा से परेशान हैं, एक जीता-जागता चिन्ह जो पवित्र सुसमाचार की ओर इशारा करता है। जब हम दूसरों के जख्मों को महसूस करते हैं, तो यह स्पर्श करने और करीब आने से साफ हो जाता है। जैसे संत थॉमस ने जी उठे प्रभु के महिमामय शरीर के सामने देखा था, वैसे ही कलीसिया भी सीखती है कि विश्वास के लेंस से देखने पर, घाव पहचान की जगह बन जाते हैं। जहाँ मानवीय दुःख को प्यार से छुआ जाता है, वहाँ ख्रीस्त हमें यह सुनिश्चित करते हैं कि वे भूखे, प्यासे, नंगे, बीमार, कैदी और अजनबी में मौजूद हैं (मती. 25:35–40)। उस विश्वास से जो जीवित ख्रीस्त को पहचानता है, फादर डार्विन (जिन्होंने साक्ष्य दी) और कई दूसरे लोगों की सेवा शुरू होती है।
उदारता से बढ़कर
ख्रीस्तीय उदारता विश्वासी के दिल में डाले गए ईश्वर के प्यार से बहती है; इसी वजह से, जरूरतमंदों की मौजूदगी में, विश्वास मजबूत हो जाता है और ख्रीस्त के लिए प्यार कामों में बदल जाता है। इस यकीन से, हमारी उपस्थिति का मकसद इस बात का साक्ष्य देना है कि एकजुटता मानव प्रतिष्ठा को पहचानने से उत्पन्न होती है और यह सिर्फ दान या भलाई के काम से बढ़कर है। इसे एक प्रतिबद्धता कहा जाता है और इसे एक प्रक्रिया का रूप लेना चाहिए। स्वागत द्वार खोलता है; एकाकीकरण की दहलीज पार करने में मदद करता है। मदद घाव पर मरहम लगाती है, और एकीकरण भविष्य को फिर से बनाता है।
एकीकरण का मतलब यह नहीं है कि जो लोग आते हैं, उनका इतिहास मिटा दिया जाए या उनसे वह सब कुछ पीछे छोड़ने के लिए कहा जाए जो उनकी यादों का हिस्सा है। न ही इसका मतलब एक-दूसरे से अलग-थलग समानांतर दुनिया बनाना है, जहाँ लोग एक-दूसरे से मिले बिना साथ-साथ रहते हैं। एकीकरण एक आपसी यात्रा है: जो लोग आते हैं वे एक नई भूमि पर रहना सीखते हैं, और जो लोग उनका स्वागत करते हैं वे अपनी पहचान को कमजोर किए बिना या मुलाकात के लिए अपने दिल बंद किए बिना अपने घरों को बढ़ाना सीखते हैं।
संत पापा ने कहा, “प्यारे प्रवासी भाइयों और बहनों, आप इस यात्रा के एक नेक और जरूरी हिस्से हैं: उस समुदाय के प्रति भरोसे के साथ खुद को खोलें जो आपका स्वागत करता है, उसकी भाषा सीखें, उसके कानूनों का सम्मान करें, उसके रीति-रिवाजों को जानें, सामुदायिक जीवन में हिस्सा लें और कृतज्ञता के साथ अपना उपहार दें।”
संत पापा ने स्वागत करनेवाले और स्वागत किये जानेवाले दोनों के कर्तव्यों की याद दिलाते हुए कहा कि हर स्वागत करनेवाले समाज की आगंतुकों के प्रति जिम्मेदारियाँ होती हैं, वहीं जिनका स्वागत किया जाता है उनका सम्मान तब फलता-फूलता है जब यह एक फर्ज बनता है और दूसरों के साथ मिलकर निर्माण की सच्ची इच्छा बन जाता है। इस तरह, जो लोग अजनबी के रूप में आए थे, वे रिश्तों को फिर से पा सकते हैं, भरोसा फिर से बना सकते हैं और एक समुदाय का जीता-जागता हिस्सा महसूस कर सकते हैं। यह दया का एक अनमोल रूप है।