बॉम्बे हाई कोर्ट ने 4 ईसाइयों के खिलाफ धर्मांतरण का मामला खारिज किया
बॉम्बे हाई कोर्ट ने चार ईसाइयों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया है। इन पर आरोप था कि उन्होंने एक हिंदू जोड़े को ईसाई धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि अपने धर्म का प्रचार करना, अपने आप में, नागरिकों के किसी भी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत करने जैसा अपराध नहीं है।
महाराष्ट्र राज्य में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने 6 अक्टूबर को एक फैसला सुनाया (जिसे 13 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया)। अदालत ने कहा कि आरोपों से यह साबित नहीं होता कि आरोपियों ने नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है या किसी धर्म का अपमान किया है।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उनकी पत्नी को ईसाई धर्म अपनाने के बदले मासिक भत्ता देने, उनके बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और उनके लिए घर बनवाने का प्रस्ताव दिया था।
आरोपियों ने इस बात से इनकार किया कि उनका कोई ऐसा दुर्भावनापूर्ण इरादा था जिससे नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाएं आहत हों या किसी धर्म का अपमान हो।
न्यायमूर्ति एम.डब्ल्यू. चंदवानी ने अपने फैसले में कहा, "आवेदक केवल अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे, और इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसा करने से उन्होंने किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को आहत किया है।"
अदालत ने कहा कि आरोपों से ज्यादा से ज्यादा यह पता चलता है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उनकी पत्नी पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला था, लेकिन यह साबित नहीं होता कि उन्होंने उनकी धार्मिक मान्यताओं को ठेस पहुंचाई है। अदालत ने चारों आरोपियों के खिलाफ दायर चार्जशीट को खारिज कर दिया।
पुलिस ने जोसेफ खुदावंत, उनके बेटे विक्टर खुदावंत, उनकी पत्नी एल्विना खुदावंत और अनंत मानकर के खिलाफ मामला दर्ज किया था। यह कार्रवाई 'इंडियन चिल्ड्रेन न्यू लाइफ मिशन' के एक सामाजिक कार्यकर्ता की शिकायत पर की गई थी। यह एक धर्मार्थ और सामाजिक कल्याण संगठन है, जिसे महाराष्ट्र के अमरावती जिले के चंदूर बाजार में खुदावंत परिवार द्वारा चलाया जाता है। शिकायतकर्ता को 6,750 रुपये का मासिक मानदेय मिलता था।
शिकायत के अनुसार, आरोपियों में से एक, जो इस मिशन का पदाधिकारी है, ने शिकायतकर्ता के बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और उनके लिए घर बनवाने का प्रस्ताव दिया था। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि उस पर सरकारी दस्तावेजों में ईसाई धर्म को अपना धर्म घोषित करने के लिए दबाव डाला गया था, और उसके बच्चों को संडे स्कूल में प्रभावित किया जा रहा था। भारत में आपराधिक जांच की औपचारिक शुरुआत करने वाले दस्तावेज़, यानी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) को 14 जनवरी, 2026 को दर्ज किया गया था, और इसके बाद चार्जशीट दाखिल की गई।
चारों आरोपियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कार्यवाही को रद्द करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं होती है।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कथित घटना 2025 की है, जो महाराष्ट्र के उस कानून (महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम) के लागू होने से पहले की है, जो प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने पर रोक लगाता है। यह कानून 28 अगस्त, 2026 को लागू हुआ था।
