नागालैंड में ईसाई समुदाय ने सुरक्षा कानून को रद्द करने की मांग फिर से उठाई
केंद्र सरकार द्वारा पूर्वोत्तर राज्य में विवादित सुरक्षा कानून को और छह महीने के लिए बढ़ाए जाने के बाद, नागालैंड में चर्च के नेताओं और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने आर्म्ड फोर्सेज एक्ट (AFSPA) को रद्द करने की मांग फिर से उठाई है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 25 सितंबर को घोषणा की कि AFSPA 1 अक्टूबर से नौ जिलों और पांच अन्य जिलों के पुलिस स्टेशनों के तहत आने वाले खास इलाकों में लागू रहेगा। यह आदेश 31 मार्च, 2027 तक प्रभावी रहेगा, जब तक कि इसे पहले वापस न ले लिया जाए।
जिन नौ जिलों को पूरी तरह से इसमें शामिल किया गया है, वे हैं - दीमापुर, न्यूलैंड, चुमौकेदिमा, मोन, किफायर, नोकलाक, फेक, पेरेन और मेलुरी। कोहिमा, मोकोकचुंग, लोंगलेन्ग, वोखा और ज़ुन्हेबोटो जिलों के कुछ खास इलाके भी इसमें शामिल हैं।
सरकार ने कहा कि यह फैसला सुरक्षा स्थिति के आकलन के बाद लिया गया है, जिसमें सुरक्षा एजेंसियों से मिली जानकारी, इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट और राज्य की कानून-व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा शामिल है।
AFSPA की धारा 3 के तहत, केंद्र सरकार किसी इलाके को "अशांत" घोषित कर सकती है जब उसे लगता है कि नागरिक प्रशासन की मदद के लिए सशस्त्र बलों का इस्तेमाल ज़रूरी है। यह कानून सुरक्षा कर्मियों को विशेष अधिकार देता है, जिसमें खास हालात में ऑपरेशन चलाने और बिना वारंट के लोगों को गिरफ्तार करने का अधिकार शामिल है, साथ ही अपनी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान की गई कार्रवाई के लिए कुछ कानूनी सुरक्षा भी मिलती है।
नागालैंड में AFSPA पहली बार 1958 में लागू किया गया था, जब भारत से आज़ादी की मांग कर रहे नागा समूहों ने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया था। दशकों की शांति वार्ता और संघर्ष-विराम समझौतों के बावजूद, राज्य में इसे समय-समय पर आगे बढ़ाते हुए लागू रखा गया है।
हालांकि, नागालैंड के ईसाई समुदाय के लिए, इस नए विस्तार ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या इतने सालों की अपेक्षाकृत शांति और नागा संघर्ष के राजनीतिक समाधान की लगातार कोशिशों के बाद भी ऐसे असाधारण अधिकारों की ज़रूरत है। नागालैंड जॉइंट क्रिश्चियन फोरम (NJCF) के जॉइंट सेक्रेटरी फादर जॉर्ज रिनो ने 29 सितंबर को UCA न्यूज़ को बताया, "नागालैंड के कई लोगों, खासकर ईसाइयों ने केंद्र सरकार द्वारा AFSPA की अवधि बढ़ाए जाने पर चिंता जताई है।"
उन्होंने कहा, "पिछले कुछ सालों से राज्य में शांतिपूर्ण माहौल रहा है। इस कानून की अवधि बढ़ाना गैर-ज़रूरी था और ईसाई समुदाय यह समझ नहीं पा रहा है कि केंद्र सरकार ने ऐसा क्यों किया है।"
अलग-अलग ईसाई समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले मंच, NJCF ने पहले ही 12 सितंबर को कोहिमा में "धार्मिक स्वतंत्रता के लिए रैली" के दौरान AFSPA और 'प्रोटेक्टेड एरिया परमिट' सिस्टम को खत्म करने की मांग की थी।
इस रैली में हज़ारों ईसाइयों ने हिस्सा लिया और फोरम ने गवर्नर के ऑफिस के ज़रिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक अधिकारों, 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट' (FCRA) में प्रस्तावित बदलावों और AFSPA समेत सुरक्षा उपायों को लेकर चिंता जताई गई।
नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष केगवेहुन टेप ने कहा कि सरकार को यह समझना चाहिए कि जिन हालात में कभी कड़े सुरक्षा उपायों को सही ठहराया जाता था, वे अब बदल चुके हैं।
टेप ने UCA न्यूज़ से कहा, "अब सरकार के लिए यह गंभीरता से सोचने का समय आ गया है कि मौजूदा हालात में इन कड़े उपायों की कोई ज़रूरत नहीं है।"
कोहिमा डायोसिस के चांसलर फादर जैकब चारलेल ने AFSPA को एक कठोर कानून बताया, जो सुरक्षा कर्मियों को बहुत ज़्यादा अधिकार और कानूनी सुरक्षा देता है।
फादर चारलेल ने 29 सितंबर को कहा, "सुरक्षा की स्थिति में काफी बदलाव आया है।" उन्होंने सरकार से इस कानून को लागू रखने के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया।
इस साल की शुरुआत में पेरन ज़िले के एक बैपटिस्ट चर्च में सुरक्षा कर्मियों से जुड़ी एक घटना के बाद चर्च की चिंताएं और बढ़ गई थीं।
मार्च में, नागालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल और ज़ेमे बैपटिस्ट चर्च काउंसिल ने समज़िउराम बैपटिस्ट चर्च में असम राइफल्स के ऑपरेशन की निंदा की थी। चर्च संगठनों ने कहा कि देर रात हुए ऑपरेशन के दौरान हथियारबंद जवान चर्च परिसर और उसके पादरी के घर में घुस गए थे। उन्होंने जवाबदेही तय करने और AFSPA की समीक्षा करने की मांग की।
इस घटना ने सुरक्षा अभियानों के दौरान चर्चों और आम लोगों की जगहों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं और बढ़ा दीं। AFSPA पर बहस का नागालैंड में शांति की लंबी कोशिशों से गहरा संबंध है। दशकों तक चले संघर्ष के दौरान, अलग-अलग नागा समूहों के बीच बातचीत, सुलह और एकता को बढ़ावा देने में चर्चों ने अहम भूमिका निभाई है।
ईसाई नेताओं का कहना है कि सिर्फ़ सुरक्षा उपायों से ही स्थायी समाधान नहीं मिल सकता, और शांति प्रक्रिया में राजनीतिक बातचीत और सुलह को मुख्य भूमिका में रखना ज़रूरी है।
