नागालैंड में ईसाई धार्मिक और संवैधानिक आज़ादी की मांग कर रहे हैं
नागालैंड में लगभग 5,000 ईसाई एक रैली में शामिल हुए। उन्होंने केंद्र सरकार से धार्मिक आज़ादी, अंतरात्मा की आज़ादी और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने की मांग की।
ईसाई-बहुल राज्य में विभिन्न ईसाई समुदायों के संगठन, 'नागालैंड जॉइंट क्रिश्चियन फोरम' ने 12 सितंबर को राज्य की राजधानी कोहिमा में यह रैली आयोजित की। इसमें अलग-अलग ईसाई समुदायों के लोगों ने हिस्सा लिया।
रैली का समापन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नौ सूत्रीय ज्ञापन सौंपकर हुआ। यह ज्ञापन राज्य में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि, गवर्नर नंद किशोर यादव के ज़रिए सौंपा गया।
ज्ञापन में जिन मुख्य चिंताओं का ज़िक्र किया गया है, उनमें 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट' (FCRA) में प्रस्तावित बदलाव, राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' का पूरा गायन अनिवार्य करना, और 'प्रोटेक्टेड एरिया परमिट' (PAP) सिस्टम व 'आर्म्ड फोर्सेज़ (स्पेशल पावर्स) एक्ट' (AFSPA) को जारी रखना शामिल है।
हिंदू-समर्थक भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने देश और विदेश में ईसाइयों की कड़ी आलोचना के बावजूद FCRA कानून में बदलाव करने की कोशिश की है।
प्रस्तावित संशोधनों का मकसद ईसाई धर्मार्थ संस्थाओं पर नियंत्रण बढ़ाना है। साथ ही, विदेशी फंड पाने की मंज़ूरी के लिए ज़रूरी अनिवार्य FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होने पर सरकार को उनकी संपत्तियां ज़ब्त करने की इजाज़त देना भी इसका मकसद है।
BJP सरकार ने राज्यों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' पूरा गाया जाए; इस कदम से विवाद और विरोध भी हुआ।
आलोचकों और धार्मिक अल्पसंख्यकों का आरोप है कि इस गीत के कई पद हिंदू देवी-देवताओं को समर्पित हैं, इसलिए यह उनके लिए उचित नहीं है।
PAP एक यात्रा दस्तावेज़ है जिसकी ज़रूरत गैर-भारतीय नागरिकों को भारत के कुछ खास इलाकों, खासकर पूर्वोत्तर राज्यों में जाने के लिए पड़ती है। मानवाधिकार समूहों ने इसे अनावश्यक और भेदभावपूर्ण बताया है।
AFSPA को एक कठोर कानून माना जाता है। यह कानून 'अशांत क्षेत्रों' (disturbed areas) में सुरक्षा बलों को व्यापक कानूनी और ऑपरेशनल अधिकार देता है। कई पूर्वोत्तर राज्यों में दमन के हथियार के तौर पर इसके इस्तेमाल के लिए इसकी आलोचना की जाती है।
फोरम के अध्यक्ष पादरी एन. पाफिनो ने कहा कि नागालैंड के लोग अपने अधिकारों और आज़ादी को लेकर चिंतित हैं और वे "भारतीयों और ईसाइयों के तौर पर" अपनी बात रख रहे हैं।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एकता को धार्मिक या सांस्कृतिक एकरूपता नहीं समझा जाना चाहिए और इसे उन पर थोपा नहीं जाना चाहिए। फ़ोरम के जॉइंट सेक्रेटरी, फ़ादर जॉर्ज रिनो ने कहा कि नागा ईसाई अपनी आज़ादी को लेकर सचमुच चिंतित हैं और विवादित कानूनों व नियमों की वजह से उन पर दबाव है।
उन्होंने FCRA में बदलावों को लेकर संबंधित लोगों के साथ और बातचीत करने पर ज़ोर दिया, ताकि ईसाई संस्थाओं द्वारा चलाई जा रही चैरिटेबल सेवाओं को कोई नुकसान न हो या उनमें कोई रुकावट न आए।
कोहिमा के बिशप जेम्स थोप्पिल ने कहा कि ईसाई राष्ट्रीय सुरक्षा, जवाबदेही और लोगों की भलाई बनाए रखने के लिए बने कानूनों या नियमों के खिलाफ नहीं हैं।
लेकिन उन्होंने कहा, "नियमों का पालन कराने का तरीका उत्पीड़न में नहीं बदलना चाहिए।"
कोहिमा डायोसिस के चांसलर, फ़ादर जैकब चारलेल ने AFSPA कानून को कठोर बताया और कहा कि यह सुरक्षा कर्मियों को बहुत ज़्यादा अधिकार और कानूनी कार्रवाई से छूट देता है।
पादरी ने UCA न्यूज़ को बताया, "नागालैंड अब एक शांतिपूर्ण राज्य है, इसलिए सरकार को इस कानून को खत्म करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि यह बहुत खतरनाक है।"
