मद्रास हाई कोर्ट ने कैथोलिक पुरोहितों के संपत्ति अधिकारों पर फैसला सुनाया

मद्रास हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि धार्मिक शपथ लेने के बाद कैथोलिक धार्मिक संघों के सदस्यों द्वारा अर्जित की गई संपत्ति, उनके कानूनी वारिसों के बजाय उनके धार्मिक संघ की हो सकती है। यह उस संघ के नियमों और उन परिस्थितियों पर निर्भर करेगा, जिनमें संपत्ति हासिल की गई थी।

जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश और के. के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने 'एबीवीएम सोसाइटी ऑफ द कैथोलिक एपोस्टोलेट' द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

'बार एंड बेंच' की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें दिवंगत फादर देवकुमार अरुलानंथम के रिश्तेदारों को 56 लाख रुपये (67,000 डॉलर) की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर उत्तराधिकार का अधिकार दे दिया गया था।

पुरोहित के भाइयों और भतीजी ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (सक्सेशन सर्टिफिकेट) हासिल करने के बाद इन जमा राशियों पर अपना दावा किया था।

हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि खाते पादरी के नाम पर थे, इससे स्वामित्व तय नहीं किया जा सकता।

इसके बजाय, कोर्ट ने कहा कि स्वामित्व तय करने के लिए उनके धार्मिक दायित्वों और उस संस्थागत संदर्भ को देखना जरूरी है, जिसमें संपत्ति हासिल की गई थी।

न्यायाधीशों ने धार्मिक संघ में शामिल होने के बाद अर्जित संपत्ति और पहले से मौजूद या परिवार से विरासत में मिली संपत्ति के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि विरासत में मिली संपत्ति अपने आप किसी धार्मिक समाज की संपत्ति नहीं बन जाती।

कोर्ट ने आंशिक रूप से अरुलानंथम द्वारा 1988 में हाथ से लिखे गए एक घोषणापत्र पर भरोसा किया। इसमें कहा गया था कि उनका निजी सामान समाज (सोसाइटी) को जाना चाहिए, जबकि परिवार से विरासत में मिली संपत्ति पर परिवार के अधिकार बने रहेंगे।

खंडपीठ ने रिश्तेदारों को आदेश दिया कि वे एक महीने के भीतर यह रकम समाज को लौटा दें, अन्यथा उन्हें सालाना 9% की दर से ब्याज देना होगा।

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