देश में रेप के मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा पर फिर से ध्यान खींचा है
देश में रेप के कई मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा पर बहस को फिर से हवा दी है और सवाल उठाए हैं कि बड़े कानूनी सुधार और कड़ी सज़ा के बावजूद यौन हिंसा क्यों नहीं रुक पाई है।
हाल ही में हुए एक हाई-प्रोफाइल मामले के बाद, 23 सितंबर को नई दिल्ली की सड़कों पर सैकड़ों छात्रों ने मार्च किया। उन्होंने नारे लगाए और बेहतर सुरक्षा उपायों की मांग करते हुए पोस्टर दिखाए।
अधिकारियों के अनुसार, सोमवार को हुई उस घटना में, पुलिस अधिकारी बनकर आए तीन लोगों ने राजधानी के बीचों-बीच एक पब्लिक पार्क में 17 साल की लड़की के साथ कथित तौर पर गैंगरेप किया।
यह मामला 2012 में बस में हुई 23 साल की फिजियोथेरेपी छात्रा के गैंगरेप और हत्या की घटना की याद दिलाता है, जिसने देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया था और यौन हिंसा के खिलाफ कड़े कानून बनाने की वजह बनी थी।
लेकिन एक्टिविस्ट का कहना है कि वे बदलाव- जिनमें यौन अपराधों की परिभाषा का दायरा बढ़ाना और रेप के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान शामिल था - नाकाफी साबित हुए हैं।
महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली एक्टिविस्ट योगिता भयाना ने AFP को बताया, "कोई भी असली समाधान पर काम नहीं कर रहा है, जो कि सोच बदलना है।"
उन्होंने कहा, "सोच (अभी भी) यही है कि देर रात घर से बाहर निकलना महिला की गलती है, या अगर महिलाएं किसी दूसरे पुरुष के साथ दिखती हैं तो पुरुष उन पर नज़र रखते हैं।"
"यह बहुत हैरानी की बात है कि समाज अभी भी ऐसा सोचता है।"
ताज़ा उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत में हर दिन औसतन 80 रेप के मामले दर्ज किए गए। इसकी तुलना 2012 में हर दिन लगभग 68 मामलों से की जा सकती है, जो कड़े कानून लागू होने से ठीक पहले का साल था।
एक्टिविस्ट का कहना है कि यौन हमलों की असली संख्या इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है क्योंकि कई पीड़ित कभी रिपोर्ट दर्ज नहीं करातीं, अक्सर गहरे पितृसत्तात्मक समाज में बदनामी के डर से।
कानून लागू करने में कमी
सोमवार को हुए कथित हमले से पहले 16 साल की लड़की के साथ रेप और हत्या की घटना हुई थी, जिसकी लाश पुलिस को सड़ी-गली हालत में मिली थी। इसके अलावा, भारी बारिश के दौरान लिफ्ट देने वाले बस ड्राइवर और कंडक्टर द्वारा 17 साल की लड़की के साथ कथित रेप का मामला भी सामने आया था। ये दोनों मामले हाल के हफ़्तों में दिल्ली में सामने आए – जिसे अक्सर भारत की "रेप कैपिटल" (बलात्कार की राजधानी) कहा जाता है – लेकिन दूसरे इलाके भी इससे अछूते नहीं हैं; इस महीने एक वीडियो सामने आया जिसमें पूर्वी राज्य बिहार में एक किशोर लड़की के साथ यौन उत्पीड़न होते हुए दिखाया गया।
हर मामले में गिरफ्तारियां हुईं, राजनीतिक निंदा हुई और जनता का गुस्सा भी देखने को मिला।
2012 के अहम मामले के बाद – उस महिला को राष्ट्रीय स्तर पर "निर्भया" या "निडर" के नाम से जाना जाता है, क्योंकि भारतीय कानून प्रेस को रेप पीड़िता का नाम छापने की इजाज़त नहीं देता – सरकार ने पेनिट्रेशन (यौन प्रवेश) और सहमति की आपराधिक परिभाषाओं का दायरा बढ़ाया।
गैंग रेप के लिए कम से कम 20 साल की जेल की सज़ा का प्रावधान किया गया, और बार-बार रेप करने वालों के लिए मौत की सज़ा का नियम लाया गया।
वकीलों और कार्यकर्ताओं का कहना है कि असली चुनौती इसे लागू करने में है।
यौन हिंसा की शिकार महिलाओं का पक्ष रखने वाली क्रिमिनल लॉयर शिल्पी जैन ने AFP को बताया कि पुलिस और अदालतों पर काम का बहुत ज़्यादा बोझ है और उनके पास मामलों की ठीक से जांच करने के साधन नहीं हैं, जिससे सुधारों का असर कम हो जाता है।
उन्होंने कहा, "समस्या कानून में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले लोगों में है।"
"जजों पर काम का बोझ है। पुलिस वालों पर काम का बोझ है। एक पुलिस स्टेशन 2 लाख से 3 लाख लोगों की ज़िम्मेदारी संभालता है। यह कैसे काम करेगा? यह एक दुष्चक्र है।"
भारत में रेप के मामलों में सज़ा दिलाने की दर (कनविक्शन रेट) 2012 से लगभग स्थिर रही है, जो ट्रायल तक पहुंचने वाले कुल मामलों का लगभग एक-चौथाई है।
लेकिन क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (आपराधिक न्याय प्रणाली) को मामलों के भारी बैकलॉग (लंबित मामलों) से जूझना पड़ता है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2024 में अदालतों के सामने आए रेप के 2 लाख से ज़्यादा मामलों में से 10 प्रतिशत से भी कम मामले असल में पूरे हो पाए।
जैन ने कहा, "रेप के एक मामले में औसतन सात से आठ साल लगते हैं। अगर मामला सुप्रीम कोर्ट तक जाता है, तो 20 साल लग जाते हैं, इसलिए अपराधियों का कानून का डर खत्म हो जाता है और पीड़ितों की उम्मीद खत्म हो जाती है।"
जेंडर राइट्स एक्टिविस्ट पूनम मुतरेजा के लिए, सिर्फ़ कानूनी सुधारों से उस समस्या का समाधान नहीं हो सकता जो सामाजिक सोच और असमानता से जुड़ी है।
