छत्तीसगढ़ में चर्चों ने गैर-ईसाइयों को प्रार्थना सभाओं में शामिल होने से मना किया

छत्तीसगढ़ राज्य में चर्चों ने नोटिस लगाकर पूजा के लिए सिर्फ़ ईसाइयों के प्रवेश की अनुमति दी है। कथित धर्मांतरण और प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने की घटनाओं के कारण बढ़े तनाव के बीच इसे एहतियाती कदम बताया गया है।

धमतरी ज़िले के कई चर्चों में ऐसे नोटिस लगाए गए हैं। धमतरी शहर में 116 साल पुराने सुंदरगंज मेनोनाइट चर्च के बाहर लगे एक नोटिस में लिखा था: "चर्च प्रबंधन के नियमों के तहत, पूजा के लिए चर्च की इमारत में प्रवेश केवल ईसाइयों तक सीमित है।"

इसमें आगे कहा गया है कि "जो गैर-ईसाई अपनी मर्ज़ी से अंदर आते हैं, वे अपनी ज़िम्मेदारी पर ऐसा करेंगे।"

'चर्च ऑफ़ गॉड' की एक सभा के बाहर भी ऐसा ही नोटिस लगा था, जिसमें कहा गया था, "पूजा केवल ईसाइयों के लिए है और परिसर में प्रवेश करने वाले गैर-ईसाई अपने कार्यों के लिए व्यक्तिगत रूप से ज़िम्मेदार होंगे।"

धमतरी ज़िला ईसाई फ़ोरम के महासचिव डायमंड फ़िलस ने 25 सितंबर को बताया कि इन नोटिस का मकसद सभाओं को विवादों और राज्य के नए धार्मिक स्वतंत्रता कानून के तहत संभावित कानूनी पेचीदगियों से बचाना था।

फ़िलस ने कहा, "हम किसी को रोक नहीं रहे हैं, लेकिन अगर लोग आना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी पर आना चाहिए।"

ईसाई नेता ने बताया कि धमतरी शहर के आठ चर्चों में नोटिस लगाए गए थे, जबकि स्थानीय हिंदी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार ज़िले भर के लगभग 40 चर्चों और प्रार्थना केंद्रों पर ऐसे ही बोर्ड लगाए गए थे।

उन्होंने आगे कहा, "हमने अप्रैल में धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू होने के तुरंत बाद ऐसे नोटिस लगाने शुरू कर दिए थे।"

जब से यह कानून लागू हुआ है, हिंदू समूह धमतरी में ईसाई पूजा और अन्य सभाओं में जा रहे हैं और अवैध धर्मांतरण के आरोपों को लेकर पादरियों और प्रतिभागियों से सवाल-जवाब कर रहे हैं।

15 सितंबर को ईसाई समूहों के साथ हुई एक बैठक में हिंदू राष्ट्रवादियों और स्थानीय आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि गरीब हिंदुओं और आदिवासियों को चर्चों में बुलाकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाया जाता है।

बैठक में मौजूद फ़िलस ने बताया कि इसके जवाब में लगभग 1,000 लोगों ने ज़िला कलेक्ट्रेट में स्व-घोषणा पत्र जमा किए हैं, जिनमें कहा गया है कि वे अपनी मर्ज़ी से ईसाई प्रार्थना सभाओं में शामिल हुए थे। नेशनल न्यूज़ एजेंसी 'प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया' से नाम न बताने की शर्त पर बात करते हुए ज़िला प्रशासन के एक अधिकारी ने इस मामले पर कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें इस मुद्दे पर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है।

छत्तीसगढ़ धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2026, जो 7 अप्रैल को लागू हुआ, 1968 के उस कानून की जगह लेता है जिसे पहले मध्य प्रदेश राज्य ने पारित किया था। मध्य प्रदेश को ही बाँटकर 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनाया गया था।

नया कानून उन धार्मिक धर्मांतरणों के लिए सख़्त नियम और कड़ी सज़ा का प्रावधान करता है जिन्हें अधिकारी ज़बरदस्ती या धोखे से किया गया धर्मांतरण मानते हैं।

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