प्रधानमंत्री के आवास के पास स्थित मस्जिद को खाली करने का नोटिस मिलने पर आक्रोश

राष्ट्रीय राजधानी में प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के पास स्थित एक ऐतिहासिक मस्जिद को खाली करने का नोटिस मिलने के बाद, मुस्लिम नेताओं और शिक्षाविदों ने चिंता जताई है।

केंद्रीय भूमि और विकास कार्यालय (L&DO) ने 19 अक्टूबर को 'रेस कोर्स मस्जिद' को खाली करने के लिए छह दिन का नोटिस दिया। यह मस्जिद विरासत संपत्तियों (हेरिटेज प्रॉपर्टी) की सूची में शामिल है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 7 अक्टूबर को ही इस मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई थी।

मस्जिद के इमाम, मौलाना मोहम्मद हारून ने एक वीडियो बयान में कहा, "अधिकारी आए और अचानक हमसे कहा कि हमारे पास इस जगह को खाली करने के लिए एक हफ्ते से भी कम समय है, जबकि यह इमारत पीढ़ियों से यहां मौजूद है।"

इमाम ने बताया कि वे लगभग 40 वर्षों से इस मस्जिद से जुड़े हुए हैं।

हारून ने आगे कहा, "यहां तक ​​कि पीने का पानी भी बंद कर दिया गया है। बिजली और पानी काटकर, वे कानूनी समय-सीमा खत्म होने से पहले ही लोगों को इबादत की इस पवित्र जगह से दूर जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं।"

यह मस्जिद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उच्च सुरक्षा वाले आधिकारिक आवास के पास स्थित है।

L&DO का दावा है कि मस्जिद सरकारी जमीन पर बनी है, जबकि समुदाय के लोगों का कहना है कि यह वक्फ संपत्ति है- यानी इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक कार्यों के लिए दान की गई जमीन।

'वक्फ बोर्ड' नामक मुस्लिम संस्थाएं पूरे भारत में ऐसी संपत्तियों (जमीन और इमारतों सहित) का प्रबंधन करती हैं, जिन्हें समुदाय के कल्याण के लिए व्यक्तियों या संस्थानों द्वारा दान किया गया होता है।

स्वतंत्र समाचार वेबसाइट 'द वायर' की रिपोर्ट के अनुसार, "यह विवाद केवल मस्जिद खाली करने के नोटिस तक सीमित नहीं है; बल्कि मस्जिद की जमीन की स्थिति और इसे विरासत का दर्जा मिलना, विवाद के मुख्य बिंदु बन गए हैं।"

दिल्ली वक्फ बोर्ड, जो राष्ट्रीय राजधानी में वक्फ संपत्तियों की देखरेख करता है, ने इस बेदखली आदेश को चुनौती दी है।

बोर्ड का कहना है कि सरकार के 'दिल्ली गजट' में इस मस्जिद और इससे सटे कब्रिस्तान को सितंबर 1977 से ही एक संरक्षित धार्मिक संपत्ति (धार्मिक बंदोबस्त) के रूप में मान्यता दी गई है।

'जमीयत उलेमा-ए-हिंद' (मुस्लिम धार्मिक समूहों का एक संगठन) ने मस्जिद को तोड़े जाने की आशंका के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। साथ ही, उन्होंने केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से भी इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। 'द ट्रिब्यून' अखबार की एक रिपोर्ट के अनुसार, महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मस्जिद और उससे सटे कब्रिस्तान की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप की मांग करते हुए एक ज्ञापन सौंपा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के शिक्षाविद सबूर अली एम. ने कहा कि जब भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार मुश्किल में होती है, तो वह धार्मिक पहचान से जुड़े विवादों का सहारा लेती है।

उन्होंने 'यूसीए न्यूज़' से कहा, "इस तरह के विवादों का मकसद नागरिक समाज का ध्यान सरकार के कामों पर सवाल उठाने से भटकाना लगता है।" उन्होंने भारत में मतदाता सूची के बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण (revision) के दौरान हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ देश भर में युवाओं के चल रहे विरोध प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए यह बात कही।

ये विरोध प्रदर्शन 2 अक्टूबर को शुरू हुए। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि भारत के चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें। मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं, जिसके तहत लाखों नाम हटा दिए गए हैं, और इसमें विशेष रूप से मुसलमानों को निशाना बनाया गया है।

अली ने चेतावनी दी, "इससे न केवल एक खास धार्मिक समुदाय के अधिकारों को नुकसान पहुंचता है, बल्कि कानून का शासन, लोकतंत्र, देश का संवैधानिक भविष्य और राष्ट्र का समग्र विकास भी खतरे में पड़ जाता है।"

अधिकारों की निगरानी करने वाली संस्था 'मिल्लत टाइम्स' के आंकड़ों से पता चलता है कि 2020 से सितंबर 2026 के बीच, जबरन बेदखली, आंशिक रूप से खाली कराने और तोड़फोड़ जैसी 2,166 प्रशासनिक कार्रवाइयों में इस्लामी धार्मिक स्थलों, शैक्षणिक केंद्रों और इबादतगाहों को निशाना बनाया गया।

'मिल्लत टाइम्स' के अनुसार, इस छह साल की अवधि में, विशेष रूप से इस साल मई और जून में चलाए गए अभियानों के दौरान 23 मुस्लिम धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया गया। इसके बाद सितंबर तक सात और मस्जिदों को गिरा दिया गया, जबकि आठ अन्य स्थलों को बेदखली के आदेश मिले या वे संपत्ति विवादों का सामना कर रहे हैं।

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