जेसुइट वकीलों ने राष्ट्र निर्माण में योगदान देने का आह्वान किया

नई दिल्ली, 27 अक्टूबर, 2026: भारत के 12 प्रांतों का प्रतिनिधित्व करने वाले 22 जेसुइट वकील, 19 से 21 अक्टूबर तक 'इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट' में एक राष्ट्रीय सम्मेलन के लिए एकत्रित हुए। इस सम्मेलन का विषय "राष्ट्र निर्माण में हमारी भूमिका" था।

प्रतिभागियों ने अपने कानूनी कार्यों पर विचार-विमर्श किया, अपने अनुभव साझा किए और संवैधानिक लोकतंत्र, सामाजिक न्याय तथा मानवाधिकारों की सुरक्षा को आगे बढ़ाने के लिए रणनीतियां तैयार कीं।

सम्मेलन का उद्घाटन 20 अक्टूबर को हुआ। इसमें 'जेसुइट कॉन्फ्रेंस ऑफ साउथ एशिया' के अध्यक्ष फादर स्टैनी डिसूजा और कॉन्फ्रेंस के मनोनीत अध्यक्ष फादर अजीत ज़ेस ने मुख्य भाषण दिए।

दोनों ने जेसुइट फादर कॉन्स्टेंट लीवेंस और उनके उत्तराधिकारी फादर जॉन बैपटिस्ट हॉफमैन के अग्रणी प्रयासों पर प्रकाश डाला। इन्हीं के कार्यों के परिणामस्वरूप आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए 1908 का 'छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट' पारित हुआ था।

डिसूजा और ज़ेस ने प्रतिभागियों से इन अग्रदूतों से प्रेरणा लेने का आग्रह किया।

राष्ट्र निर्माण में वकीलों की भूमिका पर आयोजित सत्रों में वरिष्ठ अधिवक्ता रॉबिन आर. डेविड और अधिवक्ता माइकल डायस शामिल हुए। इन सत्रों ने प्रतिभागियों को कानूनी प्रैक्टिस से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा करने के लिए एक मंच प्रदान किया।

21 अक्टूबर को एक पैनल चर्चा हुई, जिसमें जेसुइट कानूनी पेशेवरों से जुड़ी अपेक्षाओं पर बात की गई। पैनल में अधिवक्ता सिस्टर स्नेहा गिल, डॉ. अलाना गोलमेई और दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य ए.सी. माइकल शामिल थे। चर्चा का मुख्य केंद्र हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए कानूनी सेवाओं का विस्तार करना था।

पांच जेसुइट वकीलों ने न्याय और कानूनी सेवा के प्रति अपने अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए:

रवि सागर ने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 'एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड' (Advocate-on-Record) बनने के अपने प्रयासों के बारे में बताया।
के.एम. जोसेफ ने पटना उच्च न्यायालय में अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े मामलों को संभालने का अपना अनुभव साझा किया।
अनूपचंद ने रांची स्थित 'हॉफमैन लॉ फर्म' के माध्यम से झारखंड उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए किए गए अपने कार्यों का विवरण दिया।
संथानम ने तमिलनाडु में 'लीगल एक्शन, एडवोकेसी एंड सर्विसेज सेंटर' (Legal Action, Advocacy and Services Centre) के कार्यों को प्रस्तुत किया। इसमें मुकदमेबाजी, पैरालीगल प्रशिक्षण, शोध-आधारित वकालत और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए चलाए गए अभियान शामिल हैं। ओवेन ने असम के गुवाहाटी में 'लीगल सेल फॉर ह्यूमन राइट्स' द्वारा कमजोर समुदायों की मदद के लिए किए गए कानूनी हस्तक्षेपों पर प्रकाश डाला।
भविष्य की कार्रवाई के लिए मुख्य प्राथमिकताओं में हर जेसुइट प्रांत में कानूनी केंद्र स्थापित करना, कानूनी मामलों और वकालत के प्रयासों का विस्तार करना, शोध टीमें बनाना, अल्पसंख्यक सहायता सेल को मजबूत करना और मौजूदा कानूनी नेटवर्कों के साथ मिलकर काम करना शामिल है।

प्रतिभागियों ने प्रांतीय समर्थन, कानूनी प्रतिनिधित्व में निरंतरता और राष्ट्र निर्माण में जेसुइट समुदाय के योगदान के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

इस बैठक में एक 'जेसुइट लॉयर्स फोरम' बनाने, हर साल आमने-सामने बैठकें आयोजित करने और धर्मांतरण विरोधी कानूनों सहित उभरते संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा करने का प्रस्ताव रखा गया।

प्रतिभागियों ने जेसुइट फादर जेरोम डी'सूजा के योगदान को भी याद किया। वे भारत की संविधान सभा के सदस्य थे और उन्होंने भारतीय संविधान (जिसमें प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और अल्पसंख्यक अधिकार शामिल हैं) को तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी।

2027 में उनके निधन की 50वीं बरसी के अवसर पर, राष्ट्रीय सेमिनार और सम्मेलन आयोजित करने तथा भारतीय संविधान की प्रतियां बड़े पैमाने पर वितरित करने की योजनाएं प्रस्तावित की गईं।

उपस्थित लोगों को भारतीय संविधान की एक शुरुआती प्रति भी दिखाई गई, जो मूल रूप से फादर जेरोम डी'सूजा को भेंट की गई थी। यह प्रति अब नई दिल्ली स्थित 'इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट' में सुरक्षित रखी गई है।

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