पोप लियोः सृष्टिकर्ता के संग मानव का सहयोग
पोप लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में वाटिकन द्वितीय धर्मसिद्धांत, गौदियुम एत स्पेस पर अपनी धर्मशिक्षा माला देते हुए कहा कि मानव अपने मेहनत में सृष्टिकर्ता ईश्वर के संग सहयोग करने हेतु बुलाया गया है।
पोप लियो 14वें ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में उपस्थित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात और सुस्वागतम।
वाटिकन द्वितीय महाधर्मसभा के प्रेरितिक धर्मसिद्धांत गौदियुम एत स्पेस की चर्चा करते हुए आज हम इसके तृतीत अध्याय के प्रथम भाग में आते हैं, जिसका एक दिलचस्प शीर्षक है- “सम्पूर्ण दुनिया में मानव के क्रिया कलाप”। हमारे लिए यहाँ मुख्य सवाल यह है, दुनिया में मानव के क्रियाकलाप का मूल्य क्या है, और इसलिए तकनीकी, सामाजिक और वैज्ञानिक विकास हमारे लिए क्या अर्थ रखते हैंॽ हम इस बात को याद कर सकते हैं कि वाटिकन महासभा की समाप्ति के चार वर्षों से कम समय के अंतराल में, 20-21 जुलाई 1969 की रात, को मानव ने पहली बार चन्द्रमा में अपने कदम रखे।
मानव प्रगति का वाहक
पोप लियो 14वें ने कहा कि ईश्वर के प्रति रुप में बनाया गया मानव प्रगति का वाहक है। अपनी स्वतंत्रता और बैद्धिक क्षमता में, वह अपने ज्ञान में वृद्धि करता है जिसके द्वारा वह एक पूरे समाज को आगे ले चलता है। हम इसे, एक के बाद एक पीढ़ियों के रहन-सहन की स्थितियों में हुए सुधारों पर चिंतन करते हुए सहज ही देख सकते हैं। वास्तव में, दस्तावेज हमें कहता है,“बहुत सारी लाभदायक चीजें जिसकी चाह हमने की, विशेषकर दिव्य शक्ति से, मानव ने अपनी कोशिश से उन्हें अपने लिए हासिल कर लिया है।”
विकास का प्रभाव
यही कारण है, कुछ विचारकों ने वैज्ञानिक खोज और तकनीकी प्रगति को इस भांति प्रस्तुत किया है मानो वे कुछ ऐसी चीजें हों जो ईश्वर से मनुष्य के संबंध को कमजोर बनाता हो, इस हद तक कि यह छिछली जान पड़ती हो, या यहाँ तक कि वे ख्रीस्तीय विश्वास का विरोध करते हों। और इस जीवन दर्शन ने समकालीन मानव में एक परिवर्तन लाया है जहाँ वह पहले के युगों की अपेक्षा आज की दुनिया को दूसरी निगाहों से देखता है। ऐसे पूर्वाग्रह विशेषकर पश्चिमी संस्कृति में मूख्य रूप से व्याप्त है जिसने ख्रीस्तीय प्रकटीकरण से अपने संबंध को खो दिया है। ख्रीस्तीयता उपरांत के मानवतावादी विचारकों ने, मानव और ईश्वर को गलत तरीके से एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी स्वरूप प्रस्तुत किया है: ऐसा माना जाता है कि अपने ज्ञान, अपनी स्वतंत्रता और अपनी प्रगति को साबित करने के लिए मानव को चाहिए कि वह खुद को ईश्वर से मुक्त करे। यद्यपि, अंततः कोई ईश्वर के संबंध से अपने को अलग करता, तो कोई भी व्यक्ति मानव के रूप में अपने से परे जाने के मूल्य की संभावना को सुदृढ़ करने की योग्यता खो देता है। यह “नास्तिक मानवतावाद की त्रासदी” है, जिसकी उचित व्याख्या एक प्रसिद्धि ईशशास्त्रीय हेनरी दे ल्यूबाक ने द्वितीय वाटिकन महाधर्मसभा के दौरान की।
