पोप लियोः काथलिक समुदाय युवाओं में धर्मप्रचार करे
पोप लियो 14वें सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया कि वे दुनिया भर के युवाओं में आध्यात्मिक गरीबी के संकट से निपटने की कोशिशों में मदद करें।
पोप लियो 14वें ने बुधवार को सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठ के पूर्ण अधिवेशन में भाग ले रहे प्रतिभागियों से मुलाकात की और उन्हें अपने संदेश में युवाओं के मध्य सुसमाचार प्रचार करने का आहृवान किया।
पोप लियो ने अपने संबोधन में आशा की जयंती वर्ष 2025 के दौरान, 33 मिलियन तीर्थयात्रियों का रोम की तीर्थयात्रा हेतु धर्मपीठ के अध्यक्ष को धन्यवाद दिया। इसे “कृपा का समय” घोषित करते हुए, संत पापा ने कहा कि इस जयंती के समय तीर्थयात्रियों ने रोम में चार महागिरजाघरों की तीर्थयात्रा के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भी भेंट कीं और अपने को आशा की एक गहरी निशानी से पुष्ट किया।
आशा जीवन का नायक
पोप ने कहा कि दुनिया के सारे ख्रीस्तीयों के लिए आशा जीवन का एक मुख्य नायक बना गया है। “दुनिया को हम पहले की अपेक्षा आज आशा हेतु प्यासा पाते हैं।” अतः सुसमाचार प्रचार के माध्यम हम विश्वास को पुनः स्थापित करते और अपने को आशा में मजबूत होता पाते हैं, क्योंकि सुसमाचार की घोषणा हममें उम्मीद जगाती है। “यह कोई काल्पनिक प्रस्ताव नहीं बल्कि एक साक्ष्य है जो हमें आकर्षित करती है क्योंकि यह प्रेम और सच्चाई को पुकार द्वारा दूसरों को अपनी ओर खींचती है।”
जीवन का आधार सुसमाचार का प्रचार
पोप ने कहा कि सुसमाचार की घोषणा इस बात की मांग करती है कि यह वैश्विक कलीसिया और स्थानीय समुदायों के हर कार्यो में आधार हो। “सिर्फ़ ऐसा करने के द्वारा ही विश्वास की खूबसूरती को फिर से खोजा जा सकता है और विश्वासनीयता को बेहतर रुप में प्रकट किया जा सकता है।”
पोप ने खासकर पश्चिमी देशों में विश्वास के संकट की ओर इशारा किया, जिससे धार्मिक उदासीनता आई है। उन्होंने कहा कि मानवता के लिए असली खतरा यह है कि उदसीनता के कारण हम अपने आस्तित्व से जुड़े सवालों के जवाब नहीं खोज पाते हैं, जैसे कि हमारे जीवन के अर्थ को।
ख्रीस्त से मिलन
“इस संदर्भ में, ख्रीस्त से मिलन लोगों की जीवन के अर्थ और उसके मूल्य को समझ, उसे जानने में मदद करता है। इसके साथ ही कलीसिया अपने में पुनर्जीवित येसु के उस आदेश के महत्व की पुनः खोज करती है जिसे उसने मसीह से पाया है।
पोप ने कहा कि कलीसिया की प्रेरिताई मानवता को विश्वास की नींव में बनने रहने को मदद करती है, ताकि हमारा भविष्य “शांति, न्याय, आज़ादी और भाईचारे” से भरा हो। उन्होंने कहा कि बहुत से युवा आध्यात्मिकता की इस भूख का एहसास कर रहे हैं, और कलीसिया निरंतर उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए सुसमाचार प्रचार के नए रूपों की खोज करने को कही जाती है।
सुसमाचार की भूख
“नयी पीढ़ी सुसमाचार से दूर नहीं है।” “इसके विपरीत, कई लोग, जब वे इसे दोबारा पाते हैं तो वे इसे और बेहतर ढ़ंग से जानने की चाह रखते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इसमें ही सच्ची खुशी का रहस्य छिपा है।”
क्योंकि प्रचार के तरीके लगातार बदल रहे हैं, इसलिए काथलिक समुदायों को चाहिए कि वे पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनें, ताकि वे बहुत से लोगों को मसीह और उनके बचाने वाले प्रेम और वचनों की ओर ले जा सके।
पोप लियो ने कहा कि दुनिया के कुछ हिस्सों में विश्वास की घोषणा में रूकावट आई है, जिससे आध्यात्मिक “निर्धनता” उत्पन्न हो रही है, जिसका कारण उन्होंने प्रेरणा और विश्वास की स्वतंत्रता में परिक्वता की कमी बतायी।
धैर्य की कमी
उन्होंने कहा कि अति-मध्यस्थ और उपभोक्तावाद समाज लोगों में हम सीखने और सच्चाई की खोज हेतु धैर्य की कमी को पाते हैं।
पोप ने कहा कि इन परिस्थितियों में विश्वास का प्रसार, उन समुदायों और लोगों के ऊपर निर्भर करता है जो खुश रहते और सुसमाचार को निरंतर और भरोसे के साथ जीते हैं। उन्होंने कहा, “इसलिए, जीवन की पवित्रता हमेशा ख्रीस्तीय धर्म की सुंदरता का सबसे भरोसेमंद स्वरूप रहा है, जो समय से परे है और हर संस्कृति के लिए है।”
अपने संबोधन के अंत में संत पापा लियो 14वें ने सुसमाचार प्रचार हेतु गठित परमधर्मपीठ धर्मशिक्षा की अपनी प्रेरिताई को आगे बढ़ाने हेतु प्रोत्साहन दिया विशेषकर उन्हें जो व्यस्क बपतिस्मा प्राप्त करने की चाह रखते हैं।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे नये विश्वासी ख्रीस्तीयता को ओर अपना पहला कदम बढ़ाते हैं, काथलिक समुदायों को चाहिए कि वे उन्हें विशेषकर “व्यक्तिगत संबंध और प्रेमपूर्ण सेवा में” आगे बढ़ने को मदद करें।