पोप : जीवन के तूफानों में निराश न हों

पोप लियो 14वें ने 09 अगस्त को वाटिकन, संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के संग रविवारीय देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। पोप ने देवदूत प्रार्थना के पूर्व दिये गये अपने संदेश में कहा कि हम जीवन के तूफानों में भी येसु के संग संयुक्त रहे।

पोप लियो 14वें ने वर्ष के 19वें सामान्य रविवार को विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के संग देवदूत प्रार्थना का पाठ किया।

पोप ने सभों का अभिवादन करते हुए कहा प्रिय भाइयो एवं बहनों शुभ रविवार।

आज का सुसमाचार, गलीलिया समुद्र में एक आँधी के बीच पानी पर चलकर येसु का अपने शिष्यों के पास आने की चर्चा करता है। (मत्ती. 14.22-33)

शिष्यों का अनुभव
रोटियों और मछलियों के चमत्कार के उपरांत, (मत्ती. 14. 13-21) स्वामी अपने शिष्यों को नाव पर चढ़कर निकलने को कहते हैं, जबकि वे स्वयं पर्वत के ऊपर एकांत में प्रार्थना करने को जाते हैं। तट से दूर एक बार निकलने के बाद, शिष्यगण अपने को आंधी में फंसा पाते और आगे बढ़ने में संघर्ष करते हैं। एक सफल अनुभव के उपरांत जहाँ वे एक चमत्कारी निशानी के नायकों स्वरुप अपने को देखते, अब वे अपने में निसहाय आँधी और तूफान की जोखिम का सामना करने में भयभीत हो जाते हैं।

येसु ईश्वर के पुत्र
पोप लियो ने कहा कि जैसे की रात अपने में खत्म होने को थी, येसु उनकी ओर लहरों के उफान में पानी में चलते हुए आते हैं, और उन्हें देखकर शिष्य भयभीत हो जाते, वे उन्हें एक प्रेत समझते हैं। लेकिन वे उन्हें कहते हैं, “ढ़रस रखो, मैं ही हूँ, डरो मत।” ईश्वर की उपस्थिति सारी चीजों को बदल देती है, यहाँ तक कि पेत्रुस लहरों में कुछ कदम चल कर उनकी ओर आते हैं, लेकिन लहरों को देखकर वे भयभीत हो जाते और पानी में डूबने लगते हैं, जबकि येसु हाथ बढ़कर उन्हें बचा लेते हैं। इस भांति जब स्वामी नाव में चढ़ते तो आँधी थम जाती है, और स्वतः ही विश्वास की एक घोषणा शिष्यों के हृदय से निकल पड़ी है, “सचमुच, आप ईश्वर के पुत्र हैं।”

हमारे जीवन की अनुभूति
पोप लियो ने कहा कि इस विन्दु तक पहुंचने हेतु, शिष्यों के लिए एक चमत्कार को देखना काफी नहीं था, और न ही लोगों की निगाहों में अपनी सफलता एक एहसास करना, बल्कि उन्हें अपनी कमजोरी का अनुभव करना था और उसके अंदर ईश्वर की उपस्थिति को देखा। केवल यह अनुभूति ही उनकी आंखों और हृदयों को खोलती है जो उनके निकट रहते हैं, जहाँ वे तूफानों के मध्य भी शांति का अनुभव करते हैं।

कुछ समय बाद, येसु उन्हें कहेंगे, “यदि तुममें विश्वास होगा और तुम संदेह नहीं करोगे.. यदि तुम इस पर्वत से कहोगे, यहाँ से उखड़ कर समुद्र में जा लग, तो ऐसा ही होगा।” (मत्ती.21.21)। शिष्यों के लिए समुद्र में वैसी ही बातों का अनुभूति होती है, ख्रीस्त की शांति की, जो पर्वत प्रार्थना कर रहे होते, जो समुद्र की लहरों से होते हुए उनके बीच में उपस्थित होते हैं।

चमत्कार की शिक्षा
पोप ने कहा कि यह चमत्कार हमारे लिए एक विशेष बातों की शिक्षा देता है। पहला, हम अपनी सफलता से न बहकें और न ही अहंकारी बनें। वहीं, हम अपने जीवन में निराशा न हों, यहाँ तक की अंधेरे की स्थितियों में, जब हम शक्तिहीन अनुभव करते हुए मुसीबतों का सामना करते हैं, हमारे प्रयासों के बावजूद, हमें यह लगता है कि हम आगे बढ़ने के बदले पीछे की ओर जा रहे हैं। परिस्थितियाँ चाहे कुछ भी क्यों न हो, येसु हमारा परित्याग कभी नहीं करते हैं, और यदि हम नम्रता से अपने जीवन रूपी नाव में उनका स्वागत करते हैं- प्रार्थना, संस्कारों और उनके वचनों को सुनने के माध्यम से- तो हम उनमें शांति, ज्योति और अपने जीवन यात्रा के लिए शक्ति प्राप्त करते हैं।

माता मरियम, जो अपने विश्वास के कारण धन्य मानी गई, हमें ईश्वर में विश्वास करते हुए एक समर्पित जीवन जीने हेतु मदद करें।
 

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