क्रिसमस और बड़ा दिन

क्रिसमस या बड़ा दिन ईसा मसीह या येसु के जन्म की खुशी में मनाया जाने वाला पर्व है। जिन्हें ईसाई ईश्वर का पुत्र मानते हैं।

'क्रिसमस' नाम मास ऑफ क्राइस्ट से आया है। एक पवित्र मिस्सा (जिसे होली कम्युनियन या पवित्र यूखरिस्ट भी कहा जाता है) वह जगह है जहां ईसाई याद करते हैं कि येसु हमारे लिए मर गए और फिर जीवित हो गए। केवल 'क्राइस्ट-मास' धर्मविधि ही थी जिसे सूर्यास्त के बाद (और अगले दिन सूर्योदय से पहले) होने की अनुमति थी, इसलिए लोगों ने इसे मध्यरात्रि में किया था! इसलिए हमें क्राइस्ट-मास नाम मिलता है, जिसे छोटा करके क्रिसमस कर दिया जाता है।

क्रिसमस अब दुनिया भर के लोगों द्वारा मनाया जाता है, चाहे वे ईसाई हों या नहीं। यह एक ऐसा समय है जब परिवार और दोस्त एक साथ आते हैं और उनके पास मौजूद अच्छी चीजों को याद करते हैं। लोग, और विशेष रूप से बच्चे, क्रिसमस को भी पसंद करते हैं क्योंकि यह एक ऐसा समय है जब आप उपहार देते और प्राप्त करते हैं!

25 दिसम्बर ईसाइयों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। क्योंकि इस दिन येसु मसीह का जन्मोत्सव क्रिसमस बहुत ही ख़ुशी एवं हर्षोल्लास के साथ विश्व भर में मनाया जाता है। क्रिसमस प्रभु येसु के जन्म का पर्व है। क्रिसमस की पूर्व संध्या यानि की 24 दिसंबर से ही क्रिसमस से जुड़े कार्यक्रम शुरू हो जाते हैं। यूँ तो लोग क्रिसमस के लगभग एक महीने पहले से ही क्रिसमस की तैयारियों में लग जाते है। जिसमें रीथ सजाना, मोमबत्ती जलाना, चरनी बनाना, केरोल गीत गाना, घरों एवं चर्चों की सजावट, केक बनाना इत्यादि शामिल है। विश्वभर में इस दौरान खूब रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 24 दिसंबर की संध्या को लोग कैरोल गीत गाते हुए चर्च जाते है। एवं अपने लिए एवं परिवार के लिए प्रार्थना करते है। भारत में भी क्रिसमस की काफी धूम रहती है इसके अलावा विभिन्न शहरों के चर्चों में भी इस दिन सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर प्रभु येसु से प्रार्थना करते हैं। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर लोग एकत्रित होकर येसु मसीह की प्रशंसा में कैरोल गीत गाते हैं और क्रिसमस के दिन प्यार व भाईचारे का संदेश हैं।

आगमन

आगमन का अर्थ होता है "आना"। आगमन के दिनों में चार रविवार होते हैं। यह मौसम शारीरिक रूप से गले लगाने, स्वागत करने और येसु से मिलने के लिए समर्पित है। आगमन काल ईसाई विश्वासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। क्रिसमस के ठीक चार रविवार पहले से आगमन काल की शुरुआत होती है। ईसाई लोग पूजन विधि के नए वर्ष की शुरुआत आगमन काल के पहले रविवार से करते है। आगमन काल विशेष रूप से तयारी का समय होता है जिसमे विश्वासीगण श्रद्धा भक्ति से स्वयं को येसु मसीह के जन्म के लिए तैयार करते है।

 

रीथ (माला)

रीथ आगमन के दिन का मुख्य प्रतीक है, जिसे सजाया जाता है और आगमन के दिन चर्च या घरों में रखा जाता है। आगमन काल की शुरुआत क्रिसमस के पहले के चौथे रविवार को होती है। इस परंपरा को सोलहवीं शताब्दी में अपनाया गया था। रीथ आमतौर पर एक चक्र के रूप में होती है जिसका बहुत गहरा अर्थ होता है। चक्र मानव के लिए ईश्वर के निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक है जिसकी ना तो कोई शुरुआत है और न ही कोई अंत है। रीथ पर पांच मोमबत्तियाँ लगाई जाती हैं और आगमन के लेकर क्रिसमस तक हर रविवार को एक मोमबत्ती जलाई जाती है और क्रिसमस के दिन पाँचवी और आखरी मोमबत्ती जलाई जाती है। प्रत्येक मोमबत्ती का अपना अर्थ होता है। इन पांच मोमबत्ती में से तीन मोमबत्तियाँ बैंगनी रंग की, एक मोमबत्ती गुलाबी रंग की और एक मोमबत्ती सफ़ेद रंग की होती है। येसु के जन्म की तैयारी के लिए आगमन काल मनाया जाता है। जिसमे हम आगमन से क्रिसमस तक ईश्वर के प्यार के घेरे में रहते हैं और आने वाले मौसम को आशा में बिताते हैं।

 

क्रिसमस के प्रतीक:-

प्रतीक शुरू से ही कैथोलिक चर्च का हिस्सा रहे हैं। प्रतीक ईसाई धर्म में गहरे अर्थ और आध्यात्मिकता का एक स्रोत हैं। प्रतीकों की श्रृंखला लूथरन वर्ष की शुरुआत में शुरू होती है। लुथेरन मौसमों, प्रार्थनाओं और महत्व के लिए प्रतीक कई बार जोड़ते हैं। इसमें सूफीवाद का रंग और मान्यताओं का आनंद है।

 

बेथलेहम का सितारा:

एस्ट्रोनॉमर्स ने ईसा मसीह से पहले लगभग 3,000 सितारों की मैपिंग की थी, लेकिन गैलिलियन टेलीस्कोप का तब तक आविष्कार नहीं हुआ था, जिससे की आकाश में सितारों की संख्या का पता चल सकें। बेथलेहम का सितारा जिसने येसु मसीह के जन्म की खुशखबरी दी थी। ऐतिहासिक रूप से इस तारे का तीन तरह से वर्णन किया गया है।

ईसाइयों का मानना है कि यह तारा येसु के जन्म को चिन्हित करने वाला एक चमत्कारी संकेत था। धर्मशास्त्रियों का कहना है कि तारा भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणियों को पूरा करता है। वैज्ञानिकों और खगोलविद्वानों का मानना है कि मागी द्वारा देखे गए विभिन्न ग्रहों का संयोजन एक महत्वपूर्ण घटना को इंगित करता है। बेथलेहम का सितारा प्रभु येसु मसीह के जन्म का तारा है, जिसे चरवाहों ने अपने ज्योतिष के माध्यम से पूर्व में देखा था, और वे जानते थे कि यह सितारा ईश्वरीय राजकुमार और उद्धारकर्ता के वादे को पूरा करने का प्रतीक है। येसु मसीह के जन्म पर होने वाली प्रक्रियाएँ हमारे अंकगणित में गहराई लाती हैं।

 

क्रिसमस ट्री:

अन्य परंपराओं की तरह, क्रिसमस ट्री सजावट की शुरुआत भी यूरोप से हुई थी। क्रिसमस का पेड़ जीवन के पेड़ का प्रतीक है। प्रभु येसु मसीह स्वयं कहते हैं कि : मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। क्रिसमस ट्री का शीर्ष ईश्वर को इंगित करता है और इसकी हरी पत्तियां आशा का प्रतीक हैं जो हमें संकेत देती हैं कि हम विश्वास और आशा में बढ़ रहे हैं।

 

क्रिसमस की घंटी:

प्राचीन काल में भेड़ों को वापस बुलाने के लिए घंटी का इस्तेमाल किया जाता था। प्रभु येसु हमारा चरवाहा है और हम उसकी भेड़ हैं जो उसकी आवाज को पहचानते और सुनते हैं। घंटियाँ उद्घोषणा, शुभ समाचार का संदेश देती हैं। क्रिसमस के दिन चर्च की घंटियाँ हमें येसु के सामने झुकने के लिए आमंत्रित करती हैं।

 

स्वर्गदूत:

अन्य प्रतीकों के साथ, स्वर्गदूत का भी क्रिसमस के साथ गहरा संबंध है। येसु के जन्म की खुशखबरी एक स्वर्गदूत के द्वारा मरियम के लिए लाई गई थी, और यहाँ तक कि येसु के जन्म के अवसर पर, स्वर्गदूत येसु के सुसमाचार को चरवाहों को देते हैं। और चरवाहों ने शांति के गीत को गाया: "सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शान्ति मिले!"

 

सांता क्लॉज़:

एक बुजुर्ग आदमी लाल रंग के कपड़े पहने और सफेद बालों से ढके सिर के साथ क्रिसमस पर अपनी पीठ पर एक बड़ा बोरा लटकाए हुए व्यक्ति को दर्शाता है। सांता क्लॉज़ ईसाई संत निकोलस से संबंधित है। संत निकोलस कम उम्र में ही बहुत दयालु और उदार थे। वे अपने गाँव के लोगों की मदद करते थे। अक्सर उन लोगों को भोजन प्रदान किया करते थे जिनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। वे बचपन से बहुत धार्मिक थे। छोटी उम्र में उन्होंने एक पुरोहित बनने का फैसला किया। अपनी देहाती सेवा के दौरान भी, वह लोगों का केंद्र बने रहे। वह लोगों, विशेषकर बच्चों की मदद करना चाहते थे। वह अपने मिलनसार स्वभाव, भक्ति भावना और ज्ञान के कारण लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। वह जल्द ही चर्च के बिशप बन गए। उनकी उदारता और दयालुता के बारे में कई परंपराएं हैं।

वह अक्सर घोड़े पर एक लाल बागे में गाँव की यात्रा करता, जिसमें छोटे बच्चे उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। एक दिन उन्हें एक ऐसे परिवार के बारे में पता चला, जहाँ एक आदमी अपनी 3 बेटियों को न तो खिला सकता था और न ही जीवन की जरूरतों को पूरा कर सकता था, इसलिए वह अपनी बेटियों को कहीं भेजना चाहता था। सेंट निकोलस ने उस परिवार की मदद करने के बारे में सोचा, और जब हर कोई रात में सो रहा था, तो वह छत पर गया और सोने के तीन बंडलों को झोपड़ी में फेंक दिया। उस रात आदमी की बेटियों ने अपने मोज़े धोए और उन्हें घर की चिमनी से सूखने के लिए रख दिया। जब संत निकोलस ने सोने के सिक्कों को नीचे फेंका तो वह मोज़े में गिर गए। सुबह जब लड़कियों को उनके मोज़े सोने के सिक्कों से भरे हुए मिले, तो वे बहुत खुश हुए। जब यह कहानी पूरे गाँव में फैली तो ग्रामीणों में खुशी की लहर दौड़ गई। इसके बाद वे सब भी रात में अपने मोजे बाहर रखने लगे। अब हर सुबह सभी को सुंदर उपहार मिलना शुरू हुआ जो संत निकोलस द्वारा दिया गया था। इन उपहारों ने लोगों को खुश कर दिया और उसके बाद उन्होंने इसे एक क्रिसमस की रस्म बना दिया जिसमें खुशी दी गई और दूसरों को जादुई उपहार देकर प्राप्त किया गया। एक प्रसिद्ध कहावत है, "कोई भी व्यक्ति कभी भी गरीब नहीं रहा है" और क्रिसमस का संदेश खुशी, दान, शांति और सभी प्रेम से ऊपर देना है, क्योंकि क्रिसमस के दिन प्यार पैदा होता है।

 

क्रिसमस कार्ड:

एक परंपरा के अनुसार नीदरलैंड के एक चर्च में चर्च के सारे सदस्य 24 दिसंबर की शाम को इकट्ठा होते थे और एक-दूसरे को क्रिसमस की शुभकामनाएं देते थे। चर्च में एक बुजुर्ग महिला भी थी जो नियमित रूप से चर्च की गतिविधियों में भाग लेती थी। एक साल वह क्रिसमस के दिन बहुत बीमार हो गई। उसकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि चर्च के अन्य सदस्यों को क्रिसमस की शुभकामनाएँ कैसे भेजें। उसने अपने दोस्त को एक पत्र लिखा और उसे 24 दिसंबर की शाम को चर्च भेज दिया। लोगों को इन टुकड़ों पर लिखकर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए देखना बहुत अच्छा था, एक परंपरा जो धीरे-धीरे दुनिया भर में फैल गई, एक छोटे से शहर में शुरू हुई थी।  क्रिसमस के दौरान हर साल हमें अपने प्रियजनों, दोस्तों और अन्य लोगों को शुभकामनाएं भेजने का अवसर मिलता है और हम क्रिसमस कार्ड के माध्यम से ऐसा करते हैं। कार्ड तैयार किए गए या हस्तनिर्मित भेजने वाले और ग्रहण करने वाला दोनों को क्रिसमस के मौसम की खुशियों को आकर्षित करते हैं और उन क्षणों को ताज़ा करते हैं जो उन्होंने एक साथ बिताए थे। प्यार की भावनाओं को लिखकर साझा करें क्योंकि यह प्यार को बांटने (साझा करने) का मौसम है। आइए हम सभी मिलकर प्यार को साझा करें क्योंकि नफरत वैसे भी बढ़ रही है।

 

कैरोल:

जब येसु का जन्म हुआ था तो येसु के जन्म पर गड़रियों ने ख़ुशी में गीत गाये थे। उन्ही गीतों को कैरोल कहते है। आज भी येसु के जन्म पर लोग ख़ुशी में झूमते हुए और कैरोल गाते हुए चर्च में जाते है। साथ ही लोगों के घर घर जाकर भी कैरोल के गीतों के माध्यम से उन्हें शुभकामनाये एवं बधाई देते है।

 

गौशाला:

जब मरियम के गर्भ के दिन पुरे हुए तो मरियम और युसूफ को सराय में कही भी जगह नहीं मिली। तब उन्हें एक गौशाले में जगह मिली। माता मरियम ने प्रभु येसु को एक गौशाले में जन्म दिया था। और फिर बालक येसु को कपड़ों में लपेटकर चरनी में लेटा दिया था। आज भी उसी समय को याद करते हुए ख्रीस्तीय विश्वासी गौशाले एवं चरनी का निर्माण करते है। जो की उनकी ख़ुशी को और बढ़ा देते है। येसु ने ईश्वर होते हुए भी एक सामान्य से गौशाले में जानवरों के बीच जन्म लिया था। उसी के प्रतिक के तौर पर गौशाले का निर्माण किया जाता है। गौशाले में येसु के जन्म के समय को दिखाया जाता है।

 

सभी प्रतीकों का प्रमुख: क्रिसमस

क्रिसमस के दिन की मुख्य वास्तविकता यह है कि यह सभी प्रतीकों का प्रमुख है। इसे सभी प्रतीकों की जननी कहना गलत नहीं होगा। पृथ्वी एक स्वर्गीय निवास बन गया था क्योंकि येसु के जन्म के समय आकाशीय प्राणी, तारे, स्वर्गदूत और स्वयं येसु मसीह मानव रूप धारण कर पृथ्वी पर आ गए थे। देवत्व का उदय हमारी आध्यात्मिकता को बढ़ाता है। हम अपनी परंपरा के अनुसार क्रिसमस की परंपराओं और प्रतीकों को अपने घर का एक हिस्सा बनाते हैं। इस खूबसूरत मौसम में हम अपने दिल और जीवन में सादगी और संस्कृति को अपनाएं और अपने घर के बाहरी कोने में मन्जर लगाकर दिव्य और आध्यात्मिक संस्कृति की नींव रखें।

 

क्रिसमस की कहानी

एक बार ईश्वर ने स्वर्गदूत गाब्रिएल को मरियम नामक एक कुँवारी के पास भेजा।  मरियम की सगाई यूसुफ़ नामक एक व्यक्ति से हुई थी। स्वर्गदूत ने मरियम से कहा- “प्रणाम, प्रभु की कृपापात्री! प्रभु आपके साथ है।" स्वर्गदूत ने मरियम को ईश्वर की इच्छा बतलाते हुए कहा कि -"मरियम! आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है। देखिए, आप गर्भवती होंगी, एक पुत्र प्रसव जन्म देंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी। तब मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, "यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि मैं तो अभी कुंवारी हूँ।" स्वर्गदूत ने मरियम से कहा, "पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे। क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।" तब मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, "देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।" और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया। स्वर्गदूत ने यूसुफ़ को भी ईश्वर की इस इच्छा के बारे में बतलाया।

उस समय यूसुफ़ और मरियम नाजरेथ जो कि वर्तमान में इजराइल का एक भाग है, में रहा करते थे। उस समय नाजरेथ रोमन साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। एक बार जनगणना के लिए यूसुफ़ और मरियम बैथलेहम, जो कि इस समय फिलस्तीन में है, में जनगणना के लिए अपना नाम लिखवाने गए। वे वहीं थे जब मरियम के गर्भ के दिन पूरे हो गये। उन दिनों वहां और भी बहुत से लोग जनगणना के लिए आए हुए थे जिस कारण सभी धर्मशालाएं और शरणालय भरे हुए थे जिससे यूसुफ़ और मरियम को अपने लिए शरण नहीं मिल पाई। काफी मशक्कत करने के बाद उन्हें एक गौशाले में जगह मिली और और मरियम ने येसु को वही गौशाले में जन्म दिया, और उसे कपड़ों में लपेट कर चरनी में लिटा दिया। गौशाले के निकट कुछ गडरिए अपनी भेड़ें झुण्ड पर पहरा दे रहे थे। स्वर्गदूत ने उन गडरियों को प्रभु येसु के जन्म का सन्देश दिया। स्वर्गदूत ने उन्हें बालक येसु की पहचानते हुए कहा कि -आप एक बालक को कपड़ों में लपेटा और चरनी में लिटाया हुआ पायेंगे।" गडरिए उस नवजात शिशु के पास गए और उसे नमन किया। येसु के जन्म के बाद तीन राजा भी तारे को देखते हुए बालक येसु के दर्शन के लिए आये।

येसु जब बड़े हुए तो उन्होंने पूरे गलीलिया और आसपास के प्रांतों में घूम−घूम कर उपदेश दिए और लोगों की हर बीमारी और दुर्बलताओं को दूर करने के प्रयास किए। धीरे−धीरे उनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलती गई। येसु ने अंधों को दृष्टि, गूंगों को वाणी दी, लंगड़ों को स्वस्थ किया, मुर्दों को जिलाया, रोगियों को स्वस्थ किया, कोढ़ियों को शुद्ध किया इसके साथ ही उन्होंने और भी बहुत से कार्य किये। येसु ने अपने जीवन काल में प्रेम सन्देश दिया। उन्होंने अपने उपदेश के माध्यम से लोगों को जीवन की शिक्षा दी। लोगों की भीड़ के भीड़ येसु के उपदेश सुनने के लिए एकत्रित होती थी। येसु जीवन पर्यन्त मानव कल्याण की दिशा में जुटे रहे।

येसु के इन सद्भावनापूर्ण कार्यों से कुछ लोगों को काफी दिक्कत हुई और उन्होंने येसु को यातनाएं देकर उन्हें क्रूस पर लटकाकर मार डाला। येसु ने मरने से पहले भी अपने शत्रुओं को क्षमा दी। तब भी वह यही बोले कि ''हे पिता इन लोगों को क्षमा कर दीजिए क्योंकि यह लोग नहीं जानते कि यह क्या कर रहे हैं।''

 

प्रवीण परमार

 

 

 

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