पोप: परिवार ईश्वरीय प्रेम की निशानी बने

पोप फ्रांसिस ने शनिवार 25 जून को 10वीं विश्व परिवारों के मिलन समारोह में परिवारों को ईश्वरीय शांति, एकता और प्रेम की निशानी बनने का संदेश दिया।
संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में 10वीं विश्व परिवारों के मिलन समारोह यूखारिस्तीय बलिदान से समपन्न हुआ। कार्डिनल केविन फैरेल की अगुवाई में अर्पित मिस्सा बलिदान के दौरान संत पापा ने अपने प्रवचन में कहा कि यह परिवार है जहाँ हम सर्वप्रथम प्रेम करना सीखते हैं।  
उन्होंने कहा कि अब कृतज्ञता अर्पित करने का समय है। आज हम हमारे परिवारों में पवित्र आत्मा से मिले सभी वरदानों को कृतज्ञपूर्ण हृदय से लाते और अर्पित करते हैं। विभिन्न रुपों ने इस मिलन समारोह में सहभागी होते हुए हमने एक तरह से बृहृद “तारामंडल” का निर्माण किया है। पोप ने कि मैं बृहृद समृद्ध अनुभवों, योजनाओं और सपनों के साथ-साथ अनिश्चितता और चिंताओं की याद भी करता हूँ जिन्हें आप ने एक दूसरे के साथ साझा किया है। हम उन्हें ईश्वर को अर्पित करते हुए अपने लिए शक्ति और प्रेम की याचना करते हैं। आप माता-पिता,बच्चों, दादा-दादियों और चाचा-चाचियों के रुप में यहां हैं। आप सभी एक अलग पारिवारिक अनुभव को लाते हैं लेकिन आप की आशा और प्रार्थना एक है कि ईश्वर आप के परिवार को और विश्व के सभी परिवारों को अपनी आशीष से भर दें।
आज के दूसरे पाठ मे संत पौलुस स्वतंत्रता के बारे में कहते हैं। यह हमारे लिए एक अति आदर्श और प्यारा लक्ष्य है। हर कोई सभी रुपों में स्वतंत्र होने की चाह रखता है। यद्यपि बहुत से हैं जो एक बड़ी स्वतंत्रता जो आंतरिक स्वतंत्रता है कि कमी का एहसास करते हैं। प्रेरित हमें इस बात की याद दिलाते हैं कि ख्रीस्तीय स्वतंत्रता ऊपर से दिया गया एक उपहार है,“ख्रीस्त ने हमें स्वतंत्र किया है” (गला.5.1)। यह हमें दिया गया है। हम आंतरिक और बाह्य रूप विभिन्न तरह के बंधनों से जकड़े हुए हैं विशेष रुप से स्वार्थ की भावना से, जिसके फलस्वरूप हम अपने को सभी चीजें के केन्द्र-विन्दु में बनाये रखना चाहते और केवल अपनी इच्छाओं तक सीमित हो जाते हैं। इस गुलामी से ईश्वर ने हमें स्वतंत्र किया है। संत पौलुस हमें कहते हैं जिस स्वतंत्रता को ईश्वर ने हमें दिया है वह झूठी और दुनिया की नजर में खोखली नहीं है। हमारी इस स्वतंत्रता हेतु ख्रीस्त ने अपने लोहू की कीमत चुकाई है जो हमारे लिए उनके स्मपूर्ण प्रेम को व्यक्त करता है, अतः “प्रेम में हम एक दूसरे के सेवक बनते हैं।”
दंपतियों के रुप में, आप जो ईश्वरीय कृपा में परिवारों का निर्माण करते हैं, एक साहसिक निर्णय है, जहाँ आप अपनी स्वतंत्रता को अपने लिए नहीं लेकिन उस व्यक्ति को प्रेम करने के लिए उपयोग करते हैं जिसे ईश्वर ने आपके लिए दिया है। इस तरह अकेले जीवनयापन करने के बदले आप “एक दूसरे के लिए सेवक बनते हैं” जहाँ हम पारिवारिक मिलन, सेवा और अपने आप से परे जाते हुए दूसरों के संग खड़ा होते हुए स्वागत करने का एक स्थल बनते है। परिवार वह पहला स्थल है जहाँ हम प्रेम करना सीखते हैं।
पोप ने कहा कि परिवार की सुन्दरता का बखान करते हुए हमें इसे पहले से अधिक सुरक्षित रखने हेतु प्रतिबद्ध होते हैं। आइए हम अपने परिवारों को विभिन्न प्रकार के जहर, स्वार्थ, व्यक्तिगतवाद, उदासीनता से दूषित होने न दें, उसे टूटने से बचाते हुए उसकी डीएनए सेवा और स्वीकराने के गुण को सुरक्षित रखें।
आज के पहले पाठ में नबी एलियस और एलिशा के बीच संबंध हमें पीढ़ियों के संबंध को प्रस्तुत करता है, जहाँ हम माता-पिता के द्वारा बच्चों के लिए साक्ष्य देने की बातों को पाते हैं। वर्तमान समय में यह सहज नहीं है यह सदैव हमारे लिए चिंता की बात होती है। माता-पिता इस बात की चिंता करते हैं कि उनके बच्चे वर्तमान समय की जटिलता, समाज की दुविधा भरी स्थिति जहाँ सारी चीजें अस्त-व्यस्त लगती है, अपनी राह को खोजने के बदले खो जायेंगे। ये बातें उन्हें चिंतित करती और इसीलिए वे अपने बच्चों को अधिक सुरक्षा में रखते हैं। ऐसी स्थिति के कारण कभी-कभी हम दुनिया में नयी चीजों की पहल में असफल हो जाते हैं।
एलियस और एलिशा के बीच संबंध पर चिंतन करते हुए हम इस बात को पाते हैं कि मुसीबतों और आने वाले भय के मध्य, ईश्वर एलियस को एलिशा का अभिषेक करने की आज्ञा देते हैं। ईश्वर, अपनी प्रेरितिक जिम्मेदारी एलिशा को सौंपने के द्वारा एलियस को इस बात की अनुभूति प्रदान करते हैं कि दुनिया का अंत उसके द्वारा नहीं होता है। यह एलिशा के कंधों में चादर ढ़कने के द्वारा व्यक्त होता है जहाँ चेला गुरू का स्थान लेता है जिससे वह इस्रराएल के लिए प्रेरिताई कार्य कर सके। ईश्वर इस भांति युवा एलिशा पर अपने विश्वास को व्यक्त करते हैं।
पोप ने कहा कि माता-पिता के लिए ईश्वर के कार्यों पर चिंतन करना कितना महत्वपूर्ण है। ईश्वर युवाओं को प्रेम करते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन्हें जोखिमों, चुनौतियों और सभी मुसीबतों से बचाये रखने की चाह रखते हैं। ईश्वर चिंतित और उन्हें अत्यधिक सुरक्षा में नहीं रखते हैं इसके विपरीत वे उन्हें बुलाते और उन पर विश्वास करते हुए यह चाहते हैं कि वे अपनी जीवन और प्रेरिताई की ऊंचाई तक जायें। इस संदर्भ में साम्मुएल, युवा दाऊद, या नबी येरेमियाह और उनसे भी बढ़कर कुंवारी मरिया के बारे में हम सोच सकते हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर का वचन हमें मार्ग दिखलाता है जहाँ हम अपने बच्चों को छोटी मुसीबतों और दुःखों से बचाये रखने को नहीं कहे जाते, बल्कि जीवन हेतु जुनूनी होने हेतु शिक्षा देने, उनकी बुलाहट को पहचानने, और ईश्वर के प्रेरितिक कार्यों का आलिंगन करने हेतु प्रेरित किये जाते हैं जिसे ईश्वर ने उनके लिए सोच रखा है। 

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