सन्त स्तनिस्लाउस कोस्तका

सन्त स्तनिस्लाउस कोस्तका पोलैंड के रोस्तकोवों नगर के एक कुलीन परिवार में सन 1550 में हुआ। उनके पिता का नाम जॉन कोस्तका एवं माता का नाम मार्गरेट क्रिस्का था। पिता पोलैंड की सभा के सदस्य थे। वे दोनों उत्तम काथलिक थे। परिवार के साथ बच्चों में सन्त स्तनिस्लाउस दूसरे थे। उनके ज्येष्ठ भ्राता का नाम पॉल था। माता-पिता ने इन दोनों भाइयों को बचपन से घर में ही उत्तम ख्रीस्तीय जीवन की शिक्षा प्रदान की। फलस्वरूप वे विश्वास में अत्यंत सुदृढ़ एवं सभी ख्रीस्तीय सद्गुणों में आदर्श बन गए। प्रभु के प्रेम ने स्तनिस्लाउस के हृदय को गहराई से स्पर्श किया था और वे सम्पूर्ण हृदय से प्रभु को प्यार करने के लिए निरंतर तरसने लगे। इसके लिए वे हर संभव त्याग-तपस्या का जीवन बिताने लगे। बाल्यावस्था से ही उनकी तीव्र भक्ति, माँ मरियम के प्रति पुत्र-तुल्य प्रेम तथा निष्कपट जीवन से सभी प्रभावित होते थे और उन्हें "नन्हा दूत" कहकर पुकारा करते थे।
चौदह वर्ष की अवस्था में स्तनिस्लाउस अपने ज्येष्ठ भाई पॉल के साथ वियन्ता में येसु समाजियों के कॉलेज में भर्ती हुए। वहाँ वे तीन वर्ष तक रहे और शीघ्र ही अपने सौम्य स्वभाव, प्रसन्न प्रकृति, सरगर्म भक्ति एवं धार्मिक जीवन के कारन अपने साथियों के प्रिय बन गए। किन्तु उनके भाई पॉल को उनका तपस्यामय जीवन कुछ भी पसन्द नहीं था। अतः वे स्तनिस्लाउस को बुरी तरह डाँटते-फटकारते और झिड़कियाँ देते रहते थे। किन्तु स्तनिस्लाउस अपने ही भाई के इस निर्मम व्यवहार को येसु के प्रेम से चुपचाप धैर्यपूर्वक सहन करते रहे। फलस्वरूप वे गंभीर रूप से रोगग्रस्त हो गए और मरणासन्न हो गए। क्योंकि वे लूथरन धर्मावलम्बी छात्रों के साथ रहते थे। इसलिए किसी पुरोहित को बुलाना सम्भव नहीं था। इसलिए उन्होंने अपनी स्वर्गीय मध्यस्था, सन्त बारबरा से सहायता की याचना की। उनका विश्वास था कि जो कोई सन्त बारबरा से मदद माँगते, वे बिना परम-प्रसाद पाए नहीं मरते। संत बारबरा ने उनकी दीन प्रार्थना स्वीकार को और दो दूतों के साथ आ कर उन्हें परम प्रसाद प्रदान किया। बाद में माता मरियम ने उन्हें इस बिमारी से स्वस्थ किया।
तत्पश्चात स्तनिस्लाउस ने माता मरियम से प्रेरणा पाकर येसु समाज में भर्ती होने का निर्णय लिया। किन्तु उनके पिताजी उन्हें रोकना चाहते थे। अतः उन्होंने चुपके से वियन्ना छोड़ दिया और रोम के लिए प्रस्थान किया। उनके पास यात्रा का कोई साधन नहीं था। अतः पैदल ही जाना था। लोगों से पहचाने नहीं जाने के लिए उन्होंने अपना वेश बदल कर भिक्षुओं का-सा वस्त्र धारण किया और पैदल यात्रा करते हुए लम्बे समय के पश्चात् रोम पहुँच गए। इस यात्रा से वे पूरी तरह थक गए थे। वहाँ वे येसु समाज के महाध्यक्ष सन्त फ्रांसिस बोर्जिया से मिले और अपनी इच्छा उन्हें बतायी। स्तनिस्लाउस के कमजोर स्वास्थ्य को देखते हुए सन्त फ्रांसिस बोर्जिया उन्हें भर्ती करने में हिचकिचाए। किन्तु कुछ समय तक उन्हें आराम करने दिया। तब उनकी तीव्र इच्छा एवं आज्ञाकारिता तथा किसी भी सेवा कार्य को करने की तत्परता को देखकर उन्हें येसु समाज के नवशिष्यालय में ग्रहण किया। उस समय किसी ने यह कल्पना भी नहीं की थी कि स्तनिस्लाउस के जीवन के केवल दस महीने ही शेष थे। उन दस महीनों में वे अपनी आज्ञाकारिता, सरगर्म भक्ति, तपस्यामय जीवन, सबके प्रति प्रेम, निःस्वार्थ सेवाभाव इत्यादि गुणों  धार्मिक सिद्धांतों का परिपूर्ण आदर्श एवं सजीव नमूना प्रमाणित हुए। यद्यपि उनका स्वास्थ्य अत्यंत कमजोर था, फिर भी उन्होंने किसी भी तपस्या के कार्य से स्वयं को मुक्त नहीं किया।

धीरे-धीरे उनकी शारीरिक दुर्बलता बढ़ती गयी और सन्त लॉरेन्स पर्व दिवस पर वे अत्यधिक कमजोरी एवं तेज बुखार से पीड़ित हुए। उन्हें स्पष्ट अनुभव हुआ कि उनके जीवन का अंत निकट आ गया है। इस उन्होंने अपनी स्वर्गीय माँ मरियम एक पत्र लिखा, यह निवेदन करते हुए कि माँ के महिमामय स्वर्ग उद्ग्रहण का महान समारोह वे माँ के साथ स्वर्ग में मना सकें। अपनी स्वर्गीय माता के प्रति स्तनिस्लाउस के हृदय में तीव्र भक्ति एवं गहरा विश्वास था। उनकी प्रार्थना सुन गयी। 15 अगस्त 1568 को प्रातः चार बजे जब स्तनिस्लाउस का हृदय माँ मरियम के स्तुतिगान में लीन, था,तब मरियम अपने स्वर्दूतों के साथ आयी और अपने इस पुत्र की पावन आत्मा को अपनी बाहों में भरकर स्वर्ग ले गयी। उनका चेहरा एक दिव्य आभा से चमक उठा। स्तनिस्लाउस की आयु उस समय केवल सत्रह वर्ष थी। उनके देहान्त होते ही रोम के सारे विश्वासीगण सन्त के रूप में उनका सम्मान करने लगे। 
सन 1726 को सन्त पिता ने उन्हें सन्त घोषित किया। वे धर्मसंघियों के विशेष मध्यस्थ माने जाते है।
माता कलीसिया सन्त स्तनिस्लाउस का पर्व 13 नवम्बर को मनाती है।

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