सन्त स्टीफन

कलीसिया ने सन्त स्टीफन प्रभु प्रभु येसु के प्रति अपने प्रेम और विश्वास के लिए प्राण अर्पित करने वाले प्रथम शहीद है। वह एक यूनानी यहूदी थे। उनकी मातृभाषा यूनानी थी। वह बड़े विद्वान तथा यहूदी धर्म के अच्छे जानकार थे। अनेक यहूदी यूनान के दिएसपोरा से आकर फिलिस्तीन में बस गए थे। उनमे से बहुतों ने प्रभु येसु में विश्वास किया था। मन जाता है कि स्टीफन प्रभु येसु के बहत्तर शिष्यों में से एक रहे  थे। वे विश्वास एवं पवित्रात्मा से परिपूर्ण थे। 
प्रेरित-चरित के अनुसार प्रेरितों पर पवित्र आत्मा के अवतरण के पश्चात् शीघ्र ही ख्रीस्तीयों की संख्या पांच हज़ार से अधिक हो गयी थी। फलस्वरूप यह शिकायत होने लगी कि रसद के दैनिक वितरण में यूनानी विधवाओं की उपेक्षा की जाती है। अतः प्रेरितों ने यह आवश्यकता महसूस की कि ऐसे कई एक धर्मसेवकों की नियुक्ति की जाए ताकि रसद का दैनिक वितरण सही रूप से किया जा सकें। अतः प्रेरितों ने शिष्यों की सभा बुलाकर कहा- "यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिए ईश्वर का वचन छोड़ दें। आप लोग अपने बीच से पवित्रात्मा से परिपूर्ण साथ बुद्धिमान तथा ईमानदार व्यक्तियों का चुनाव कीजिये। हम उन्हें इस कार्य के लिए नियुक्त करेंगे; और हम लोग प्रार्थना और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।" (प्रेरित चरित 06:3-4) तदनुसार जिन साथ व्यक्तियों की नियुक्ति हुई थी; स्टीफन उनमे से प्रथम थे। उन्होंने अपने कार्य को रसद वितरण तक ही सिमित नहीं रखा। चूँकि वे यूनानी भाषा जानते थे, इसलिए उन्होंने बड़े उत्साह एवं लगन से नवदीक्षित यूनानी लोगों के बीच ख्रीस्त के सुसमाचार का प्रचार करने लगे।
ईश्वर महान चमत्कार एवं चिह्नों द्वारा उनकी शिक्षा को प्रमाणित करते थे। वे बड़ी निर्भीकता से यह शिक्षा देते थे कि ख्रीस्त केवल यहूदियों के लिए ही नहीं, बल्कि सारी मानवजाति की मुक्ति के लिए आये थे। ख्रीस्त के बिना मुक्ति असम्भव है। वे फरीसियों को उनके झूठे सिद्धांतों तथा हृदय की कठोरता के लिए फटकारते थे। उनकी इस शिक्षा से गैर ख्रीस्तीय यहूदी तथा उनके नेता चिढ़ते थे। वे स्टीफन से जोरदार वाद-विवाद करते थे, किन्तु उनके ज्ञान एवं तर्कों का सामना करने में असमर्थ थे, क्योंकि स्टीफन आत्मा से प्रेरित होकर बोलते थे। तब उन्होंने घूस देकर कुछ व्यक्तियों से स्टीफन के विरुद्ध झूठी गवाही दिलवाई। इस प्रकार जनता, नेताओं तथा शास्त्रियों को भड़काने के बाद वे अचानक स्टीफन को गिरफ्तार कर यहूदियों की महासभा में ले गए। वहाँ स्टीफन ने पवित्रात्मा से परिपूर्ण होकर महासभा के सदस्यों तथा महायाजकों के सम्मुख जोरदार भाषण दिया। उनको भाषण ख्रीस्त की शिक्षा का पूर्ण समर्थन था। उन्होंने यहूदियों को भूतकाल में इस्राएल के प्रति की गयी ईश्वर की असीम दया और अब उनकी घोर कृतघ्नता की याद दिलाई। इससे वे आग बबूला हो गए और दाँत पीसते रहे स्थिर दृष्टि से स्टीफन की ओर देखते रहे। स्टीफन का मुखमण्डल उन्हें स्वर्गदूत के जैसा दिख पड़ा। (प्रेरित चरित 06:15)
स्टीफन ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर दृष्टि उठायी और ईश्वर की महिमा को तथा ईश्वर के दाहिने विराजमान येसु को देखा। वे जोर से बोल उठे- "मैं स्वर्ग को खुला और ईश्वर के दाहिने विराजमान मानवपुत्र को देख रहा हूँ।" इस पर उनके विरोधी यह  चिल्ला उठे, "यह ईश्वर की घोर निंदा है।" उन्होंने अपने काम बंद कर लिए और वे सब मिलकर स्टीफन पर टूट पड़े और उन्हें शहर के बाहर घसीट ले गए और उस पर पत्थर मारते रहे थे तो स्टीफन ने यह प्रार्थना की- "हे प्रभु, मेरी आत्मा  कर।" तब वह घुटने टेककर ऊँचें स्वर में बोल उठे - "हे प्रभु, यह पाप इन पर मत लगा"; और  कहकर उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए। (प्रेरित चरित 07:59-60)

इस प्रकार स्टीफन ने प्रेम के द्वारा हर मुसीबत पर विजय पायी। उनके ईश्वर -प्रेम ने अपने खूंखार शत्रुओं के सम्मुख झुकने से उनकी रक्षा की। उनके पडोसी-प्रेम ने उन्हें शक्ति दी कि वह अपने हत्यारों को क्षमा करे और उनके लिए प्रार्थना करें।
स्टीफन की इस सतावत के साथ कलीसिया में सतावत प्रारम्भ हुई। परन्तु इस शहीद के रक्त की एक बून्द भी व्यर्थ नहीं गयी। उनका रक्त कलीसिया के लिए प्रेम और सरगर्मी का प्रेरणा-स्त्रोत बन गया। 
माता कलीसिया 26 दिसम्बर को सन्त स्टीफन का पर्व मनाती है।

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