सन्त विन्सेंट पल्लोटी

सन्त विन्सेंट पल्लोटी आधुनिक युग के महान् सन्त हैं जिन्होंने कलीसिया की प्रेरिताई में समय की मांग एवं लोगों की आध्यात्मिक तथा भौतिक आवश्यकताओं के अनुसार अनेकों महत्वपूर्ण परिवर्तन किये। रोम नगर के लोगों के बीच खीस्तीय जीवन के पुनर्गठन एवं विश्वास निर्माण के लिए उन्होंने हर सम्भव तरीके से अथक परिश्रम किये। फलस्वरूप उन्हें रोम का प्रेरित कहा जाता है।

विन्सेंट का जन्म 1798 में रोम नगर में हुआ। परिवार के दस बच्चों में वे तीसरे थे। उनके पिता का नाम पॉल पल्लोटी तथा माता का नाम मग्दलेना था। वे दोनों अत्यन्त भक्त काथलिक थे। वे प्रतिदिन नन्हें विन्सेंट को अपने साथ निकट के गिरजाघर में मिस्सा के लिए ले जाया करते थे। उन्होंने विन्सेंट के हृदय में माता मरियम के प्रति गहरी भक्ति की नींव डाली। कुछ बड़े होने पर विन्सेंट प्रतिदिन सुबह शीघ्र ही स्वयं गिरजे की ओर चले जाते और वहाँ वेदी- सेवक का कार्य बड़ी खुशी से करते थे। उनकी तीव्र इच्छा थी कि वे बड़े हो कर पुरोहित बनें और सबकी सेवा करें।

विन्सेंट बचपन से ही बड़े तीव्र बुद्धि वाले थे और स्थानीय विद्यालय में प्रवेश पाने पर अध्ययन में उन्होंने शीघ्र ही बहुत उन्नति की। साथ ही साथ गरीबों तथा दुःखियों के प्रति उनके हृदय में बड़ी सहानुभूति एवं दया थीं। वे पढ़ाई के साथ समय बचा कर गरीबों की सेवा- सहायता करते थे। विद्यालय में अपने साथियों के बीच माँ मरियम की भक्ति का प्रचार करने में उनमें बड़ा उत्साह था। उस विद्यालय की शिक्षा बड़ी सफलतापूर्वक समाप्त करने के पश्चात् उन्होंने रोम के सुप्रसिद्ध रोमन कॉलेज में प्रवेश लिया जिसकी स्थापना सन्त इग्नेशियस लोयोला ने की थी। वहाँ माँ मरियम की भक्ति फैलाने के लिए एक विशेष युवा- संगठन था। विन्सेंट उसके सदस्य बने और अपने साथियों के साथ मरियम की भक्ति के प्रचार के लिए बड़े जोश के साथ कार्य करने लगे। वहाँ से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही उन्होंने पुरोहिताई के लिए अध्ययन भी जारी रखा और केवल 23 वर्ष की अवस्था में वे पुरोहित अभिषिक्त हुए।

तत्पश्चात् उन्होंने अपनी नियुक्ति के अनुसार रोम की सेमिनरी में दस वर्षों तक ईश- शास्त्र के अध्यापन का कार्य किया और सेमिनेरियनों को मरियम- भक्ति में आगे बढ़ने तथा गरीबों के बीच प्रेरिताई के लिए प्रबल प्रेरणा एवं प्रोत्साहन दिया। कुछ समय बाद उन्होंने प्रोफेसर के पद से इस्तीफा दिया और अपने धर्माध्यक्ष की अनुमति से रोम के गरीबों के बीच प्रेरिताई का कार्य करने लगे। उनके हृदय में गरीबों तथा असहायों के प्रति इतनी दया थी कि उन्हें देखने पर वे स्वयं पहने हुए चोगे और जूते तक भी उन्हें दे देते थे। रोम के विभिन्न गिरजाघरों तथा आम सभाओं में वे प्रवचन देते और लोगों के लिए आध्यात्मिक साधना का संचालन करते थे। उनके प्रवचन इतने प्रभावशाली थे कि लोग बड़े चाव से उनकी सुनते और अनेक पापियों, विधर्मियों तथा नास्तिकों का भी मन परिवर्तन होता और वे अपने पापों पर पछताते हुए फादर के पास आ जाते थे। फादर उनका पाप स्वीकार सुनते और उनके जीवन सुधार के लिए हर प्रकार उनकी सहायता करते थे। साथ ही वे अस्पतालों में जा कर रोगियों से तथा कारावासों में कैदियों से मिलते और उनको सांत्वना, सहायता एवं यथेष्ट परामर्श देते और उनका पाप स्वीकार सुनते थे। गरीबों की सेवा के लिए उन्होंने मोचियों, दर्जियों, बढ़इयों, कोचवानों तथा मालियों के लिए रात्रि पाठशालाएँ प्रारंभ की ताकि वे अपने कार्यों में दक्षता प्राप्त कर, उन्हें उत्तम ढंग से कर सकें। इसी प्रकार फादर ने युवा कृषकों तथा मजदूरों के लिए संध्याकालीन कक्षाएँ प्रारंभ की ताकि उन्हें भी अपने कार्य के लिए आवश्यक प्रशिक्षण दे सके और उनके आध्यात्मिक जीवन के लिए उनका मार्गदर्शन भी कर सकें। निर्धन युवाओं तथा बच्चों के लिए उन्होंने विद्यालयों की स्थापना की तथा अनाथों व असहायों के लिए अनाथालय भी खोले। शीघ्र ही सारे रोम निवासी गरीबों की सेवा के लिए उनके जोश एवं अथक परिश्रम को जान गये और उनकी सहायता के लिए आगे आने लगे। सभी लोगों की मुक्ति के लिए फादर विन्सेंट का जोश इतना तीव्र था कि वे संसार भर के सभी लोगों की सहायता के लिए तरसते थे। इस महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्होंने पुरोहितों की एक संस्था पल्लोटइन फादर्स की स्थापना की। इस प्रकार अनाथ एवं गरीब बालिकाओं तथा शोषित महिलाओं और बच्चों की सेवा के लिए उन्होंने पल्लोटाइन धर्मबहनों की संस्था की भी स्थापना की। इन संस्थाओं द्वारा उन्होंने रोम के अलावा इटली के अन्य नगरों में भी गरीबों और शोषितों की भौतिक एवं आध्यात्मिक उद्धार के लिए अनेकों कार्य किये।

सन्त विन्सेंट ने अयाजक प्रेरिताई की आवश्यकता को भी गहराई से समझा जिसके द्वारा उन्होंने मजदूर संघ, कृषक- विद्यालय तथा सस्ती ऋण योजनाओं का संचालन किया। इस प्रकार उन्होंने कलीसिया में समाज के गरीबों और शोषितों के उद्धार के लिए विस्तृत योजना का सूत्रपात किया जो अब समाज- कल्याण प्रेरिताई के नाम से जाना जाता है। सन्त विन्सेंट ही कलीसिया में इसके अग्रदूत हैं जिसे बाद में सन्त पिता लियो 13 वें ने मान्यता प्रदान की।

इस प्रकार निरन्तर कठिन परिश्रम करते हुए ख्रीस्त के इस अति उत्साही एवं अथक प्रेरित का देहान्त सन् 1850 में केवल 52 वर्ष की अवस्था में हो गया। कहा जाता है कि शीतकाल की एक रात्रि को जब वर्षा हो रही थी, तब उन्होंने अपना चोगा ठण्ड से कांपते हुए एक भिखारी को दे दिया था जिससे उनके फेफड़ों में ठंड लग गयी और वे इस दुनिया से चल बसे। उस समय उनके अनुयायियों की संख्या बहुत नहीं थी; किन्तु अब उनकी संस्था के पुरोहितों व धर्मबहनों की संख्या हजारों तक पहुँच गयी है और उनसे भी बढ़ कर बड़ी संख्या में वे अयाजक लोग हैं जो उनका अनुसरण करते हुए उनके लक्ष्यों की पूर्ति के लिए समर्पित हैं।

उनके देहान्त के 100 वर्षों पश्चात् 1950 में सन्त पिता पियुस 12 वें द्वारा उन्हें धन्य घोषित किया गया; और सन् 1963 में द्वितीय वैटिकन परिषद् के समय सन्त पिता जौन 23 वें ने उन्हें सन्त घोषित किया। उस अवसर पर सन्त पिता ने कहा- “यह महान् पुरोहित सन्त विन्सेंट सभी पल्ली पुरोहितों तथा प्रेरिताई के लिए समर्पित अयाजकों के लिए एक उज्वल उदाहरण हैं। उनका जीवन और प्रेरिताई का जोश आप सबको सदैव प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्रदान करते रहें ।” 22 जनवरी को इनका पर्व मनाया जाता है।

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