सन्त बरनाबस

संत बरनाबस
संत बरनाबस

 सन्त बरनाबस यद्यपि प्रभु येसु के विशेष चुने हुए बारह प्रेरितों में से एक नहीं थे, फिर भी पेन्तकोस्त के पश्चात् सन्त पेत्रुस एवं अन्य प्रेरितों के मुँह से प्रभु ये की शिक्षा सुन कर उनका मन - परिवर्तन हो गया। उन्हें प्रभु येसु में पूर्ण विश्वास हो गया कि वे ही प्रतिज्ञात मुक्तिदाता हैं ; और वे कलीसिया में सम्मिलित हो गये और येरूसालेम में ही रहने लगे। प्रेरितों के ही समान वे भी पवित्रात्मा से परिपूर्ण हो गये। आत्मा के सामर्थ्य से प्रेरित होकर प्रभु के सुसमाचार के प्रचार करने में उन्होंने ऐसे प्रभावशाली कार्य किये जिससे उनका नाम भी महान् प्रेरितों की श्रेणी में माना जाता है। बरनाबस का प्रारम्भिक नाम जोसेफ था। उनका जन्म भूमध्य सागर में स्थित कुघुस द्वीप में हुआ। वे लेवी - वंशी यहूदी थे और उनका परिवार काफी धनी - मानी था। उनकी शिक्षा - दीक्षा येरूसालेम में महान् यहूदी गुरू गमालिएल के शिष्यों के साथ हुई जहाँ स्वयं सन्त पौलुस ने भी शिक्षा पायी थी। बरनाबस बड़े धार्मिक एवं निष्कपट व्यक्ति थे। उन्होंने येरूसालेम में देखा कि प्रारम्भिक विश्वासीगण एक ही परिवार - जैसे आपसी प्रेम और एकता में रहते थे। वे लोग अपने लिए कोई व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं रखते थे, बल्कि अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर उसकी कीमत प्रेरितों के हाथों में सौंप देते थे। उनके इस सच्चे भ्रातृ - प्रेम और एकता पूर्ण जीवन से जोसेफ इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भी अपनी सारी सम्पत्ति बेच दी और उसका मूल्य प्रेरितों को सौंप दिया। प्रेरितों ने उनका नाम बदल कर बरनाबस रखा जिसका अर्थ है ‘सांत्वना - पुत्र'।। कुछ समय पश्चात् उन्हें पता चला कि साऊल जो ईसाइयों का कट्टर विरोधी था और उन्हें निर्दयता से सताता था, उसे दमिशक के रास्ते में प्रभु येसु ने दर्शन दिये और अपना मिशन उसे सौंपा। तब से साऊल का जीवन पूर्णतया बदल गया और वह प्रभु ईसा के अनन्य भक्त शिष्य बन कर दमिश्क के सभा घरों में लोगों को यह शिक्षा देने लगे कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं। हेरोद अग्रिप्पा प्रथम के शासनकाल में येरूसालेम में जब ख्रीस्तीयों पर अत्याचार प्रारम्भ हुआ, तब अनेकों शिष्य चारों ओर बिखर गये। उनमें से कुछ शिष्यों ने अन्ताखिया पहुँच कर वहाँ के यहूदियों तथा यूनानियों को प्रभु येसु की शिक्षा दी। उनमें से हजारों ने प्रभु पर विश्वास किया और उनके अनुयायी बन गये। येरूसालेम की कलीसिया को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने बरनाबस को अन्ताखिया भेजा कि वे उन्हें विश्वास में सुदृढ़ करें। बरनाबस ने जब वहाँ पहुँच कर ईश्वरीय कृपा का प्रभाव देखा तो वे बहुत आनन्दित हुए और उन लोगों से अनुरोध किया कि वे प्रभु के प्रति ईमानदार बनें और अपने विश्वास में दृढ़ रहें।
बरनाबस अपने लिए एक सुयोग्य साथी की खोज में थे जो यूनानियों के बीच उत्साहपूर्वक कार्य करें। अतः बरनाबस पौलुस की खोज में तारसुस गये और उनका पता लगा कर उन्हें अन्ताखिया ले आये। दोनों ने पूरे एक वर्ष तक अन्ताखिया में साथ रह कर बड़े जोश और उत्साह के साथ लोगों को शिक्षा दी। यहीं पर वे दोनों विजातियों के प्रेरित' कहलाने लगे। करीब तीन वर्षों के पश्चात् पौलुस येरूसालेम गये ताकि वह पेत्रुस तथा अन्य प्रेरितों से मिले। किन्तु वे पौलुस को सन्देह की दृष्टि से देखते थे। इस पर बरनाबस पौलुस का साथ देते हुए आगे आये। उन्होंने पेत्रुस को साऊल के मन - परिवर्तन का साक्ष्य दिया और उनके प्रति पत्रुस एवं प्रेरितों के हृदय में विश्वास और प्रेम पैदा करने के लिए सच्चे दिल से प्रयास किया जिसमें वे सफल हुए। उन दिनों येरूसालेम में भारी अकाल पड़ा। इस पर बरनाबस और पौलुस के आग्रहानुसार अन्ताखिया के ख्रीस्तीयों ने अपने गरीब भाइयों के लिए चन्दा एकत्र किया और उसे बरनाबस और पौलुस के हाथों येरूसालेम की कलीसिया के अध्यक्षों के पास भेजा। साथ ही बरनाबस और पौलुस दोनों ने भी अकाल - पीड़ितों की सेवा की और अन्ताखिया लौट आये। इसके पश्चात् उन्होंने कुपुस और एशिया माइनर के अन्य नगरों में भी जाकर सबको सुसमाचार सुनाया। उनकी शिक्षा से लोग इतने अधिक प्रभावित और आश्चर्य - चकित हा गये कि वे चिल्ला उठे, “ सचमुच देवता मनुष्यों का रूप धारण कर हमारे बीच उतर आये हैं। " उन्होंने बरनाबस का नाम ज्यूस रखा और पौलुस का हेरमस। पौलुस और बरनाबस ने कहा, “ भाइयो , हम भी आप लोगों के ही समान निरे मानव हैं। हम आपको यह सन्देश देने आये हैं कि अब आप लोगों को देवताओं की पूजा छोड़ कर जीवन्त ईश्वर की पूजा करनी चाहिए जिसने अपने पुत्र ईसा मसीह को हमारे बीच भेजकर हमारी मुक्ति की है। ” लोगों को इस प्रकार शान्त करके वे येरूसालेम लौट गये। क्योंकि इस बीच वहाँ की कलीसिया में यहूदी संहिता के नियमों के पालन के विषय में कई भ्रम पैदा हुए थे। पेत्रुस के नेतृत्व में येरूसालेम में सभा की बैठक हुई जिसमें काफी विचार - विमर्श के पश्चात् यह निर्णय लिया गया कि जो गैर - यहूदी प्रभु येसु में विश्वास करते हुए उनके अनुयायी बन गये और जिन्हें यहूदी ख्रीस्तीयों के समान पवित्रात्मा प्राप्त हुआ है, उन पर आवश्यक बातों के पालन के अलावा कोई अनावश्यक भार न डाला जाय। इस निर्णय के विषय में पत्र लेकर बरनाबस और पौलुस अन्ताखिया लौटे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने लोगों को एकत्र कर पत्र की सांत्वनापूर्ण बातें उनको सुनायी जिसे सुन कर लोगों को बड़ा आनन्द हुआ। बरनबास और पौलुस कुछ समय तक अन्ताखिया में रहे। इसके पश्चात् बरनाबस मारकुस को साथ लेकर नाव से से कुप्रुस चले गये; और पौलुस सीलस के साथ सीरिया तथा किलिकिया की यात्रा पर गये। इसके बाद बरनाबस के जीवन और मृत्यु के सम्बन्ध में प्रेरित - चरित में कोई उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु सन् 56 या 57 में कुरिंथियों के नाम लिखे गये सन्त पौलुस के पत्र से यह स्पष्ट है कि उस समय बरनाबस जीवित थे। माना जाता है कि सन् 60 के आस - पास सलामिस में विजातियों ने उन्हें पत्थरवाह कर मार डाला। इस प्रकार उन्होंने प्रभु के लिए अपना जीवन समर्पित करते हुए शहीदों का मुकुट प्राप्त किया। बरनाबस का व्यक्तित्व सदैव बड़ा आकर्षक, प्रेममय एवं अत्यन्त प्रभावशाली रहा। अतः उनका नाम प्रारम्भिक कलीसिया में सन्त पौलुस के साथ महान् धर्मशिक्षक के रूप में लिया जाता था। वर्षों बाद सन् 482 में उनकी कब्र का पता लगा जिसमें उनके पूज्य अवशेष के साथ सन्त मत्ती के सुसमाचार की एक इब्रानी प्रति भी सुरक्षित पायी गयी। कलीसिया में बरनाबस का पर्व 11 जून को मनाया जाता है।

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