सन्त निकोलस

बच्चों के प्यारे "सांता क्लॉज"के नाम से सुप्रसिद्ध सन्त निकोलस कलीसिया में अत्यंत लोकप्रिय सन्तों में से एक है। किन्तु जन्म एवं जीवन के विषय में ऐतिहासिक रूप से बहुत काम जानकारी उपलब्ध है। इतना तो निर्विवाद सत्य है कि वे चौथी सदी के पूर्वार्द्ध में एशिया माइनर में मीर्रा नगर के धर्माध्यक्ष थे।
उनके विषय में अनेकों लोक-कथाएं प्रचलित है। उनमे से प्रमुख उनके धर्माध्यक्ष बनने के सम्बन्ध में है। कहा जाता है कि धर्माध्यक्ष बनने से पूर्व किसी समय निकोलस पवित्र देश की तीर्थ यात्रा पर गए और वहाँ से लौटते हुए वे मीर्रा नगर आये। कुछ दिनों पहले वहाँ के धर्माध्यक्ष का देहांत हो गया था और लोग एक नए धर्माध्यक्ष की नियुक्ति की प्रतीक्षा में थे। उन दिनों आज के समान सन्त पिता के द्वारा धर्माध्यक्ष की नियुक्ति की प्रथा नहीं थी। वहाँ के पुरोहितगण गुप्त रूप से इस बात पर सहमत हुए थे कि दूसरे दिन प्रातः जो व्यक्ति सर्वप्रथम नगर के गिरजाघर में प्रवेश करेगा, वही मीर्रा  के धर्माध्यक्ष होंगे। ईश्वर की योजना थी कि दूसरे दिन प्रभात में निकोलस ने सर्वप्रथम गिरजाघर में प्रवेश किया; और वहीं उनका धर्माध्यक्षीय अभिषेक हुआ। तब से वे वहाँ रहकर अपने लोगों की सेवा में तन-मन से लग गए।
मीर्रा उन दिनों रोमी साम्राज्य के अधीन था। सम्राट डायोक्लिशन के ख्रीस्तीय उत्पीड़न समय बिशप निकोलस भी बंदी बनाये गए और कारावास में डाले गए। किन्तु बाद में सम्राट कोंस्टांटिन के आदेश से उन्हें कारावास से मुक्त किया गया। अब धर्माध्यक्ष निकोलस निर्बाध रूप से अपने लोगों की देखरेख में जुट गए। सन 325 में निसेया की विख्यात महासभा में उन्होंने भाग लिया जिसमे एरियुस के पाखण्ड मत को भ्रामक एवं ख्रीस्तीय शिक्षा के विपरीत घोषित किया गया था।
धर्माध्यक्ष निकोलस अपने लोगों लिए एक भले चरवाहे थे। वे सबको पितृ-तुल्य प्रेम से प्यार करते थे और बच्चों के प्रति उनके हृदय में विशेष स्नेह था। गरीबों, दीन-दुःखियों के प्रति उनकी दया एवं सहानुभूति असाधारण थी वे हर संभव तरीके से, किन्तु जहाँ तक बने गुप्त रूप से उनकी सहायता किया करते थे।
प्रभु ने अपने इस विनम्र एवं विनीत हृदय भक्त पर विशेष वरदान बरसाए और उनके द्वारा गरीबों व दुःखियों की सेवा में अनेकों करामाते भी की। एक बार उस प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा। अन्न के अभाव के कारण लोगों के पास खाने के लिए कुछ नहीं था। लोग भूखों मरने लगे। उनकी यह दुर्दशा देखकर धर्माध्यक्ष जी को उनपर बड़ी दया आयी जो कुछ अपने पास था उन्होंने लोगों को बाँट दिया। किन्तु उतने से कुछ नहीं होता था। लोगों को भूख से तड़पते देखकर वे स्वयं अन्न की खोज में निकल पड़े। उन्होंने सोचा पहाड़ों और जंगलों में अवश्य कुछ कंद-मूल का पता लग जाएगा तो अगली फसल मिलने तक लोगों को कुछ राहत होगी। चलते-चलते रात हो गयी और थके-मांदे धर्माध्यक्ष जी रात बिताने लिए पहाड़ी के ऊपर एक सराय के अंदर गए और बरामदे में राखी चौकी पर लेट कर सो गए।  तभी सराय  मालिक ने उन्हें जगाया और उनसे भोजन करने का आग्रह किया। वे उठकर बैठ गए और सरायवाले ने उनके सामने थाली परोस दी जिसमें था- सुखाया हुआ माँस। धर्माध्यक्ष जी ने आश्चर्यपूर्वक पूछा, "आपको यह माँस कहाँ से मिला, जबकि कोई जानवर भी जिन्दे नहीं बचे हुए है।" सरायवाले ने हिचकते हुए कहा- "महोदय, नीचे एक तहखाना है। मैंने कहीं से कुछ माँस चुराकर उसमें रख छोड़ा है। धर्माध्यक्ष जी को उसकी बातों पर संदेह हुआ और उन्होंने तहखाना देखने की इच्छा की। सरायवाले ने यह कहकर इंकार किया कि वहाँ बहुत अँधेरा है। किन्तु धर्माध्यक्ष ने अधिकारपूर्वक कहा- "चिराग लाओ, और मुझे वहाँ ले चलो।" सरायवाला चिराग लाया और दोनों सीढ़ियां उतरकर एक भयानक अँधेरी कोठरी में पहुंचे। चिराग के प्रकाश में धर्माध्यक्ष जी ने देखा कि वहाँ एक बड़ा सा मटका रखा हुआ है। उसका ढ़क्कन हटा कर उन्होंने देखा कि उसमे माँस भरा हुआ था। धर्माध्यक्ष जी ने उस मटके पर अपना आशीर्वाद दिया। आश्चर्य! तुरंत ही तीन छोटे बालक उस मटके से कूदकर बाहर आये। उस दुष्ट सरायवाले ने माँस के आभाव में इन बच्चों को पकड़कर उन्हें मारकर उनके माँस में नमक-मसाला डालकर सूखा दिया था और ग्राहकों को उन्ही बच्चों का माँस परोसा करता था।

सन्त धर्माध्यक्ष तुरंत उसी रात को उन बच्चों के साथ नगर को लौट आये। बच्चों की माताएँ बड़ी बेचैनी से अपने बच्चों को ढूंढते हुए रो रही थी। अपने प्यारे नन्हें-मुन्नों को पाकर वे हर्ष-विभोर हो उठी। बच्चों के मुख से यह दर्दनाक घटना जानकार वे आश्चर्य-स्तब्ध हो गयी और अपने प्यारे धर्माध्यक्ष को लाखों धन्यवाद दिया। यह  शीघ्र दावानल जैसे सभी लोगों तक पहुँच गयी। इसी कारन सन्त निकोलस बच्चों के प्रिय मित्र माने जाते है और धीरे-धीरे वे "सांताक्लॉज"  नाम से विश्व प्रसिद्द हो गए।

सन्त के देहान्त के पश्चात् मीर्रा के लोगों ने अपने प्यारे धर्माध्यक्ष की स्मृति को सजीव रखने के लिए उनके पर्व की पूर्व रात्रि को बच्चों के लिए उनके प्रिय उपहार चुपके से ला देने की प्रथा प्रारम्भ की; और प्रातः काल उन उपहारों को पाकर बच्चे समझते थे कि उनके प्यारे सांता क्लॉज ने ही उन्हें ये उपहार भेजे हैं। धीरे-धीरे उपहारों की यह प्रथा क्रिसमस की पूर्व रात्रि के लिए निर्धारित की गयी। जिससे यह माना जाता है कि क्रिसमस की पूर्व रात्रि को सांता क्लॉज अपने प्यारे बच्चों से मिलने आते है; और उनके लिए उपहार क्रिसमस ट्री पर टाँग देते हैं। इसलिए हर घर में क्रिसमस ट्री सजाई जाती है। सन्त धर्माध्यक्ष निकोलस आज भी सम्पूर्ण ख्रीस्तीय जगत में बच्चों के अति प्यारे है। माता कलीसिया 06 दिसम्बर को संत निकोलस का पर्व मनाती है।

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