संत योहन क्रिसोस्तम

संत योहन क्रिसोस्तम जो अपनी वाक-पटुता के कारण क्रिसोस्तम (स्वर्णमुख) कहलाते थे, वे पूर्वी कलीसिया महान धर्मोपदेशक, िश-शास्त्री एवं पूजन विधि के विद्वान थे। उनका जन्म एशिया माइनर के अन्ताखिया नगर में सन 349 ईस्वी में हुआ।  वे बचपन से ही प्रखर बुद्धि थे। उनके पिता जो अख्रीस्तीय थे, सिरियन सेना में उच्च अफसर थे। अपने अविश्वासी पिता के प्रभाव से योहन अपनी युवावस्था तक ग्रीक भाषा एवं साहित्य-शास्त्र का अध्ययन करते रहे। किन्तु 23 वर्ष की अवस्था में उनके मित्र संत बेसिल एवं अन्ताखिया के धर्माध्यक्ष संत मेलीसियुस के परामर्श से उन्होंने पवित्र बाइबिल एवं धर्मशास्त्र का अध्ययन प्रारम्भ किया और शीघ्र ही उसमें निपूर्ण हो गए। 
दो वर्षों बाद उन्होंने बपतिस्मा ग्रहण किया और ग्रीक साहित्य का अध्ययन छोड़कर ईश-शास्त्र पढ़ने लगे। तत्पश्चात वे अन्ताखिया के निकट एक पहाड़ी पर चले गए और वहाँ एक गुफा में एकांत वास करते हुए प्रार्थना एवं तपस्या का जीवन बिताने लगे। किन्तु धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। इससे विवश होकर सन 386 में उन्हें अन्ताखिया लौटना पड़ा; और वहाँ उनका पुरोहिताभिषेक हुआ। तत्पश्चात वे धर्माध्यक्ष का दाहिना हाथ बनकर उनकी सहायता करने लगे; और साथ ही लोगों को धर्मोपदेश देने लगे; और उन्होंने अनेक धार्मिक ग्रंथो की रचना की। उनके प्रवचन इतने प्रभावशाली थे कि सारी पूर्वी कलीसिया में उनका नाम फ़ैल गया और लोग दूर-दूर से उनका प्रवचन सुनने आते थे। फलस्वरूप अनेकों अविश्वासियों तथा पापियों का मन परिवर्तन हो गया और वे विश्वासपूर्वक कलीसिया में लौट आये। इस प्रकार उन्होंने बारह वर्षों तक अन्ताखिया में पुरोहितीय सेवा कार्य संपन्न किया। 
साथ ही साथ क्रिसोस्तम गरीबों तथा दुखियों के प्रति अत्यंत दयालु एवं उदार थे और उनकी सेवा सहायता के लिए हर संभव प्रयास करते थे। वे अपने प्रवचनों में बार-बार लोगों को प्रभुवर ख्रीस्त के इन शब्दों का स्मरण दिलाते थे-"मैं भूखा था, तुमने मुझे खिलाया; मैं प्यासा था, तुमने मुझे पिलाया.....। " "जो कुछ तुम इन छोटो में से एक के लिए भी करते हो, वह मेरे लिए करते हो। " उन्होंने इसके लिए कुस्तुन्तुनिया में कई अस्पतालों तथा अनाथालयों की स्थापना की जहाँ उन परित्यक्त एवं निराश्रय लोगों को शरण एवं प्रेमपूर्ण सेवा मिल सकें। 
तब सीरिया के सम्राट अर्कादियुस उनके चुपके से अपनी राजधानी कुस्तुन्तुनिया ले आये। क्योंकि वे जानते थे कि अन्ताखिया की जनता आसानी से अपने इस आदर्श पुरोहित को अपने बीच से जाने नहीं देंगे। सम्राट ने वहाँ फादर क्रिसोस्तम को पूर्वी कलीसिया की इस राजधानी के धर्माध्यक्ष के रूप में अभिषेक करा दिया। क्रिसोस्तम इस धर्माध्यक्ष के पद को स्वीकार करना नहीं चाहते थे; किन्तु सम्राट एवं अपने मित्रों के तीव्र आग्रह के कारण विवश होकर उन्हें यह पद स्वीकार करना पड़ा।

धर्माध्यक्ष क्रिसोस्तम बिना देरी कलीसिया में अनेक बुराइयों को दूर करने का प्रयास करने लगे। उन्होंने धर्माध्यक्षीय आवास के ठाट-बाट एवं फिजूलखर्ची को बंद किया और अत्यंत सदा जीवन बिताने लगे। उन्होंने अपने प्रवचनों में सम्राट के दरबार के विलासमय जीवन एवं धन के दुरूपयोग के विरुद्ध उनको चेतावनी दी। इससे आम जनता बहुत प्रसन्न हुई; किन्तु साम्राज्ञी तथा दरबारीगण और कई पुरोहित भी धर्माध्यक्ष क्रिसोस्तम के शत्रु बन गए। उन्होंने साम्राज्ञी के साथ मिलकर क्रिसोस्तम के विरुद्ध षड़यंत्र रचा और उन्हें पदच्युत करके देश से बाहर निर्वासित कर दिया। इस पर सारी ख्रीस्तीय जनता ने इस अन्याय का घोर विरोध किया। अतः साम्राज्ञी को विवश होकर क्रिसोस्तम को वापस बुलाना पड़ा। इस पर उनके कुछ शत्रुओं ने उनकी हत्या का प्रयास किया; किन्तु वे सफल नहीं हुए। तब क्रिसोस्तम को पहले अर्मेनिया में तथा बाद में काले सागर के जंगलों में निर्वासित किया गया और उन्हें अनेक प्रकार की यातनाए दी गयी। 
इन सब अत्याचारों के  बीच वे सदा संत पिता के प्रति विश्वस्त बने रहे और प्रभुवर ख्रीस्त के प्रेम से सभी अत्याचारों को धैर्यपूर्वक सहते हए प्रसन्न बने रहे। संत पिता इन्नोसेंट प्रथम उनके मित्र थे और उन्होंने क्रिसोस्तम को बचने का हर संभव प्रयास किया। किन्तु शत्रुओं  कठोरता के संमुक्ज उन्हें सफलता नहीं मिल सकी; और वहीं निर्वासन में 13 सितम्बर सं 407 को क्रिसोस्तम का देहांत हो गया। उनके अंतिम शब्द थे -"सब कुछ में ईश्वर की महिमा हो।" संत क्रिसोस्तम, धर्मोपदेशकों के संरक्षक संत है। उनका पर्व 13 सितम्बर को मनाया जाता है।

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