संत मोनिका

कलीसिया में विवाहित महिलाओं के आदर्श एवं विधवाओं की संरक्षिका संत मोनिका का जन्म उत्तरी अफ्रीका के टगास्ते नगर के एक ख्रीस्तीय परिवार  में सन 331 में हुआ। बचपन में उसी नगर के धर्मी एवं विश्वासी शिक्षक से उसने ख्रीस्तीय शिक्षा पायी थी। बड़े होने पर उसका विवाह पेट्रीशियस नामक गैर ख्रीस्तीय अफसर से हुआ। वह बड़ा क्रोधी एवं चरित्रहीन था। इससे मोनिका को बहुत कष्ट सहना पड़ा। साथ ही उसकी सास भी कई प्रकार से मोनिका को सताती थी। किन्तु मोनिका प्रभु येसु के प्यार के लिए सबकुछ चुपचाप सह लेती थी। वह इन दोनों के मन परिवर्तन के लिए प्रभु से लगातार प्रार्थना करती और एक आदर्श ख्रीस्तीय जीवन बिताती थी। उसके इस व्यवहार का सास और पति पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा की दोनों ने बपतिस्मा ग्रहण किया और उत्तम ख्रीस्तीय जीवन बिताने लगे। मोनिका का हृदय प्रभु के प्रति धन्यवाद और प्रेम से छलक उठा। किन्तु यह ख़ुशी थोड़े दिनों की थी। 
कुछ ही दिनों बाद उसकी सास मर गयी और साल भर बाद पति भी दो पुत्रों और एक पुत्री को छोड़ कर चल बसा। मोनिका पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा किन्तु उसने हिम्मत नहीं हारी। पति की मृत्यु के बाद मोनिका की सारी आशा अपने बड़े बेटे अगस्तिन पर लगी थी जो उस समय सत्रह वर्ष का था। वह बड़ा प्रखर बुद्धि एवं परिश्रमी था। किन्तु कार्थेज नगर में उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए उसने मनिकेयी नामक विधर्मी मत को स्वीकार कर लिया। और आवारा जीवन बिताने लगा। यह समाचार पाकर मोनिका का हृदय तीव्र दुःख से कराह उठा। वह अनेकों  रात जाग कर घुटनों के बल गिरती अपने पुत्र के मन-परिवर्तन के लिए प्रार्थना करने लगी। इस तरह नौ वर्ष बीत गए। किन्तु बेटे के मन परिवर्तन के लिए माँ की प्रार्थना और तपस्या में कोई कमी नहीं आयी। उसका हृदय भीतर ही भीतर रोता रहा। कहा जाता है कि -जहाँ कहीं भी वह प्रार्थना किया करती थी, वहां की धरती को आंसुओं से भिगोती थी। ऐसे में उसकी भेंट मिलान के ज्ञानी एवं अनुभवी धर्माध्यक्ष अम्ब्रोस से हुई। उसने धर्माध्यक्ष जी को अपने पुत्र की दुर्दशा के विषय में बताकर उनसे निवेदन किया कि वे अपने पुत्र को मनिकेयी विधर्म से वापस लाएं। धर्माध्यक्ष ने मोनिका को धीरज बांधते हुए कहा- "यह कैसे संभव है कि जिस पुत्र के लिए इतने आंसू बहाये जा रहे है, वह नष्ट हो जाए ?" इन शब्दों ने मोनिका को आशा की एक किरण दिखयी पड़ी और वह आशा पूर्वक अपनी प्रार्थनाओं में निरंतर बनी रही। 

अब अगस्तिन ने रोम जाकर वहाँ अलंकार-शास्त्र का प्रोफेसर बनना चाहा। वहाँ  से वे मिलान गए जहाँ उसे प्राध्यापक का पद प्राप्त हुआ। मिलान में उसका परिचय महान धर्माध्यक्ष संत अम्ब्रोस से हुआ। धर्माध्यक्ष की संगती एवं पवित्र जीवन से अगस्तिन बहुत प्रभावित हुआ। माँ की प्रार्थना सुनी गयी और पवित्र जीवन से अगस्तिन ने सन 387 में मनिकेयी विधर्म त्याग दिया और काथलिक धर्म में दीक्षित हुआ। माँ की चिरकाल की अभिलाषा पूर्ण हुई। इतना ही नहीं उसने एक पुरोहित बनकर ख्रीस्त के सुसमाचार का प्रचार करना चाहा। माँ का हृदय आनंदातिरेक से उमड़ पड़ा। उसने कहा-"बीटा, जिस दिन को देखने के लिए मैं जी रही थी, ईश्वर ने उससे भी बड़ा दिन मुझे दिखा दिया। तुम ख्रीस्त के लिए जीवन अर्पित करने जा रहे हो, इससे बढ़कर आनंद की बात क्या हो सकती है ? प्रभु ने तुम्हे सीखा दिया है कि उनका अनुसरण करने के लिए इस संसार की सभी खुशियों को त्याग देना है। मेरा एक ही निवेदन है कि तुम प्रभु की वेदी पर प्रतिदिन मेरी याद करना।" जब मोनिका अपने महान पुत्र के साथ कार्थेज जाने के लिए रोम तक पहुँची, वहीं अपने पुत्र के ही बाँहों में उसका देहांत हो गया। उसकी आयु केवल छप्पन वर्ष थी। उसका पुत्र अगस्तिन आगे हिप्पो नगर के धर्माध्यक्ष, कलीसिया के धर्माचार्य एवं संत बने। अगस्तिन ने अपनी माँ के विषय में कहा-"मैं कभी यह वर्णन नहीं कर पाऊंगा कि मेरी माँ का प्रेम मेरे लिए कितना महान था।  उसने अपनी दृष्टि से तथा अपने शब्दों से मेरे हृदय को ईश्वर की ओर उठाया। हे ईश्वर, यदि मैं अब तुम्हारा पुत्र हूँ, तो वह इस कारण कि तूने मुझे ऐसी महान माता प्रदान की।
कलीसिया में 27 अगस्त को मोनिका का पर्व मनाया जाता है। सदियों से भक्तजन मोनिका को विधवाओं की संरक्षिका एवं आदर्श माता मान कर उसकी मध्यस्थता से प्रार्थना करते आ रहे  है।

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