प्रेरित सन्त योहन

प्रेरित सन्त योहन जेबेदी और सलोमी के पुत्र एवं प्रेरित सन्त याकूब के छोटे भाई थे। योहन ने अपने सुसमाचार में स्वयं को प्रभु का प्रिय शिष्य बताते है। वे अपने पिता एवं भाई के साथ गलीली सागर में मछली पकड़ने का कार्य करते थे। प्रभु येसु के द्वारा बुलाये जाने से पहले वह योहन बपतिस्ता के शिष्य थे। प्रेरितों में केवल वही कुंवारा था। प्रभु ने दोनों भाइयों को 'गर्जन के पुत्र' नाम दिया था।

प्रभु के जीवन के सभी महत्वपूर्ण घटनाओं जैसे- जैरुस की बेटी की जिलाना, पर्वत पर प्रभु का रूपांतरण और गेतसेमनी के की बारी में प्राण-पीड़ा के समय योहन उनके साथ थे। अंतिम भोजन कक्ष की तैयारी करने के लिए ब्रभु ने पेत्रुस के साथ योहन को भेजा। अंतिम भोजन के उन गंभीरतम क्षणों में, योहन को जो प्रेरितों में सबसे छोटे थे, प्रभु ने अपनी छाती पर सिर झुकाये बैठने का अनुग्रह प्रदान किया। तीन वर्षों तक प्रभु के साथ रहते हुए उन्होंने प्रभु की वाणी सुनी। ईश्वर के विषय में महान सच्चाइयों, गूढ़ रहस्यों तथा मनुष्यों के प्रति ईश पिता के असीम प्रेम का गहरा अनुभव किया। वे अपने प्रभु को इतना अधिक प्यार करते थे कि संसार की कोई भी शक्ति उन्हें प्रभु से अलग नहीं कर सकती थी। प्रभु  पकड़वाये जाने की रात को केवल योहन प्रभु के साथ महायाजक के प्रांगण में चले गए; और द्वारपालिन से कहकर पेत्रुस को भी अंदर ले गए। प्रभु के दुःख भोग के समय योहन शुरू से अंत तक उनके साथ रहे। माता मरियम के साथ भी क्रूस के निचे खड़े रहे। मरते हुए प्रभु ने अपनी निष्कलंका माता को अपने इस प्रिय शिष्य के संरक्षण में सौंपा जो कुँवारा था।

प्रभु के पुनरुत्थान के प्रभात में मरियम मग्दलेना से सन्देश पाकर पेत्रुस और योहन प्रभु की खली कब्र को देखने के लिए दौड़ पड़े। कब्र के अन्दर देखने के बाद यहां ने सर्वप्रथम प्रभु के पुनरुत्थान पर विश्वास किया। गलीली सागर के तट पर जब पुनर्जीवित प्रभु ने प्रेरितों को दर्शन दिए, तब योहन ने सबसे पहले उन्हें पहचाना। प्रभु के स्वर्गारोहण के समय भी योहन उनके साथ थे। पेंतेकोस्ट के पश्चात् यहां अन्य प्रेरितों के साथ येरूसालेम में ही प्रभु के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते हुए लोगों को शिक्षा देते रहे। किन्तु अत्याचार के कारन जब सब प्रेरित सुसमाचार प्रचार के लिए विभिन्न प्रदेशों में बिखर गए तब सन्त योहन माँ मरियम के साथ एशिया माइनर गए। वहाँ उन्होंने एफेसुस को केंद्र बनाते हुए साथ कलीसियाओं की स्थापना की। एफेसुस में रहते हुए उन्होंने अपने सुसमाचार की रचना की जिसे 'आध्यात्मिक सुसमाचार' कहा जाता है। इसे 'प्रेम का सुसमाचार' भी कहा जाता है। क्योंकि इसमें पिता ईश्वर के प्रेम का वर्णन निम्न शब्दों में किया गया है- "ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।" (सन्त योहन 03:16)

रोमी सम्राट डोमिशयन के समय ईसाईयों पर बहुत अत्याचार हुए। सम्राट के आदेशनुसार योहन को उबलते हुए तेल के कड़ाह में दाल दिया गया। किन्तु प्रभु ने अद्भुद रीती से उनकी रक्षा की और उन्हें कोई हानि नहीं हुई। सम्राट ने क्रुद्ध होकर उन्हें पातमोस द्वीप में निवासित कर दिया। वहाँ पर उन्हें कलीसिया एवं संसार के अंत के विषय में प्रकाशना प्राप्त हुई जिनका वर्णन उन्होंने प्रकाशना ग्रन्थ में किया है। सम्राट की मृत्यु के पश्चात् वे एफेसुस लौटे और वहाँ की कलीसिया की देख-रेख की।
संत योहन ने तीन पत्र भी लिखे है जिनका विषय भी ईश्वर का महान प्रेम है जो कि ख्रीस्त के रूप में उन्होंने हमें दिया है। इसलिए हमें ईश्वर को और अपने पडोसी को प्यार करना चाहिए। योहन वृद्धावस्था में ही केवल यही उपदेश देते थे- "बच्चों, एक दूसरे को प्यार करो।"
रोमी सम्राट ट्रोजन के समय के लगभग सन 100 ईस्वी में 97 वर्ष की अवस्था में योहन की मृत्यु हुई। बारह प्रेरितों में से वे ही एक ऐसे रहे जो शहीद न होकर स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हुए।
माता कलीसिया 27 दिसम्बर को प्रेरित सन्त योहन का पर्व मनाती है।

Add new comment

6 + 1 =