प्रेरित सन्त पेत्रुस

प्रेरित सन्त पेत्रुस बेथसाइदा के निवासी और मछुए थे। अशिक्षित और निर्धन होते हए भी वे बड़े ही निष्कपट, सरल प्रेममय, उत्साही तथा निर्भीक व्यक्ति थे। उनके भाई आन्द्रेयस योहन बपतिस्ता के शिष्य थे। योहन ने अपने शिष्यों को यह कहते हुए येसु का परिचय दिया था- “देखो , ईश्वर का मेमना।” यह सुनकर अन्द्रेयस येसु के पीछे हो लिए और उस दिन उनके घर में रहे। इस पर उन्हें विश्वास हो गया कि येसु ही इस्राएलियों के प्रतिज्ञात मुक्तिदाता हैं। अतः उन्होंने अपने भाई पेत्रुस को यह शुभ समाचार दिया कि हमें ख्रीस्त अर्थात् प्रतिज्ञात मुक्तिदाता मिल गये हैं और वह उन्हें येसु के पास ले गये। येसु ने पेत्रुस को देखकर कहा, “तुम योहन के पुत्र सिमोन हो, तुम केफस अर्थात् पेत्रुस कहलाओगे। "यह सुन कर पेत्रुस के हृदय में तुरन्त ही प्रभु येसु के विषय में यह दृढ़ विश्वास हो गया कि यही प्रतिज्ञात मसीह हैं और यह विश्वास उनके हृदय में निरन्तर बढ़ता गया।

 

एक दिन जब पेत्रुस अपने भाई के साथ समुद्र में मछली पकड़ रहे थे, येस ने उन्हें यह कहते हुए बुलाया, “आओ, मेरा अनुसरण करो। मैं तुम्हें मनुष्यों के मछुए बनाऊंगा। ” ( मत्ती 4 : 18-20) पेत्रुस तुरन्त अपनी नाव और जाल छोड़कर येसु के पीछे हो लिये। किसी दिन सिमोन की नाव पर बैठकर येसु ने देर तक लोगों को शिक्षा दी। शिक्षा समाप्त होने पर उन्होंने सिमोन से कहा, "मछलियाँ पकड़ने के लिए अपनी जाल डालो। " सिमोन ने उत्तर दिया, “गुरूवर, रात - भर मेहनत करने पर भी हम कुछ नहीं पकड़ सके, परन्तु आपके कहने पर मैं जाल डालूँगा।” ऐसा करने पर इतनी अधिक मछलियाँ फँसी कि नाव डूबने पर थी और जाल फटने को हो गयी। यह देख कर सिमोन ने येसु के चरणों पर गिर कर कहा, "प्रभु, मेरे पास से चले जाइये, मैं तो पापी मनुष्य हूँ ।” (लूक . 5 : 4-8 )येसु की असीम पवित्रता और दिव्य शक्ति के सम्मुख अपनी नगण्यता को उन्होंने पहचान लिया था।

 

पेत्रुस तीन वर्षों तक निरन्तर प्रभु के साथ - साथ रहे और उनके हर उपदेश को सुना और प्रत्येक चमत्कार को देखा। किसी दिन येसु ने अपने प्रेरितों से पूछा, “तुम मेरे विषय में क्या कहते हो', पेत्रुस ने तुरन्त उत्तर दिया, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।” ( मत्ती 16 : 15-16 ) इस पर प्रभु ने पेत्रुस की प्रशंसा करते हुए कहा , “ सिमोन , तुम धन्य हो। क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गीय पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है। मैं कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा। मैं तुम्हें स्वर्ग राज्य की कुँजियाँ दूंगा।” (मत्ती 16 : 17-19) इस प्रकार प्रभु ने शेष प्रेरितों के सम्मुख पेत्रुस को कलीसिया पर परम अधिकार प्रदान किया और उन्हें प्रेरितों का मुखिया बनाया।

 

प्रभु ने जब स्वयं को जीवन की रोटी कहते हुए लोगों को शिक्षा दी, तब बहुत से शिष्यों ने उनका साथ छोड़ दिया, यह कहते हुए कि यह तो कठोर शिक्षा है, इसे कौन मान सकता है? इसलिए येसु ने बारहों से पूछा- “क्या तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?" तब पेत्रुस ने उत्तर दिया- “प्रभु , हम किसके पास जाएँ आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है ।” ( यो . 6:68 ) पेत्रुस बड़े निर्भीक और जोशीले स्वभाव के व्यक्ति थे। वे अपने प्रभु के प्रति प्यार के कारण सब कुछ करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। इसलिए अन्तिम भोजन के समय बड़े जोश के साथ उन्होंने कहा- “आपके कारण चाहे सभी विचलित हो जाएँ, किन्तु मैं कभी विचलित नहीं हूँगा।” ( मत्ती 26:33 ) प्रभु को पकड़ने के लिए सिपाहियों को उनकी ओर बढ़ते देखकर उन्होंने तुरन्त तलवार खींच कर प्रधान याजक के सेवक का कान काट डाला। परन्तु प्रभु की आज्ञा मान कर वे तुरन्त तलवार रख देते हैं। फिर भी उन्होंने प्रभु का साथ नहीं छोड़ा बल्कि महापुरोहित के प्रांगण तक उनके साथ गये। किन्तु जब उन्हें किसी नौकरानी ने पहचान लिया, तब डर के मारे उन्होंने तीन बार प्रभु को इन्कार किया। शीघ्र उन्हें अपनी गलती महसूस हुई, और वे बहुत पछताये तथा आजीवन इसके लिए पश्चाताप करते रहे।

 

येसु ने अपने पुनरुत्थान के पश्चात् ब्यारी कोठरी में दर्शन देकर प्रेरितों को पाप क्षमा करने का अधिकार दिया। आगे तिबेरियस के तट पर दिखाई देकर प्रभु ने पेत्रुस को अन्य प्रेरितों के सम्मुख कलीसिया के संचालन का परम अधिकार दिया। पेन्तकोस्त के दिन पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर पेत्रुस ने यहूदियों के सम्मुख दृढ़ता पूर्वक साक्ष्य देकर प्रभु येसु के पुनरुत्थान को घोषित किया और कहा कि उन्हीं येसु को ईश्वर ने प्रभु और मुक्तिदाता बनाया है। लोग पेत्रुस की बातों से अत्यन्त प्रभावित हुए और उन्होंने विश्वास किया और बपतिस्मा ग्रहण किया। उसी दिन करीब तीन हजार लोग शिष्यों में सम्मिलित हो गये। इसके बाद वे बडी लगन एवं उत्साह के साथ लोगों को सुसमाचार की शिक्षा देने लगे। अनेक चिह्नों तथा चमत्कारों द्वारा प्रभु उनकी शिक्षा को प्रमाणित करते रहे। उन्होंने येरूसालेम में अनेकों को प्रभु के विश्वास में दीक्षित कर लिया। इससे क्रूद्ध होकर यहूदियों के नेताओं ने उन्हें गिरफ्तार कर महासभा के सम्मुख प्रस्तुत किया। उन्होंने पेत्रुस को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अब से तुम ईसा के नाम पर किसी को शिक्षा नहीं दोगे। किन्तु उन्होंने साहसपूर्वक यही उत्तर दिया- “आप लोग स्वयं निर्णय करें, क्या ईश्वर की अपेक्षा आप लोगों की आज्ञा मानना अधिक उचित होगा ? " ( प्रे.च. 4 : 19-20 ) जब यहूदियों का अत्याचार अत्याधिक बढ़ गया तो पेत्रुस ने यहूदिया से अन्ताखिया और वहाँ से रोम की ओर प्रस्थान किया। रोम नगर उन दिनों रोमी साम्राज्य की राजधानी थी। अतः उन्होंने वहीं से ख्रीस्तीय धर्म की स्थापना एवं कलीसिया का संचालन प्रारम्भ किया। स्वर्गदूत की आज्ञा से रोमन शतपति कोरनेलियुस ने पेत्रुस को अपने घर में बुलाया । उस समय उनके मन में यह विचार उठा- “मैं एक गैर यहूदी के घर में कैसे प्रवेश करूँ" ? यहूदी लोग गैर यहूदियों को अपवित्र मानकर उनसे कोई सम्बन्ध नहीं रखते थे। ईश्वर ने एक दिव्य दर्शन द्वारा पेत्रुस को प्रकट किया कि कोई भी मनुष्य ईश्वर की दृष्टि में अशुद्ध या अपवित्र नहीं है। बिना किसी भेद - भाव के ईश्वर समान रूप से सबको प्यार करता है। इस तरह उस समय समाज में प्रचलित भेद - भाव की भावना को दूर कर वास्तविक भ्रातृ - प्रेम की स्थापना करने में भी सन्त पेत्रुस को प्रेरणा मिली। रोमी सम्राट नीरो के कठोर शासन काल में ख्रीस्तीयों पर अत्याचार चरम सीमा तक पहुँच गया। पेत्रुस को भी ख्रीस्तीयों के मुखिये के रूप में बन्दी बनाया गया और उन्हें क्रूस पर चढ़ाने का आदेश दिया गया। अपने अन्तिम क्षणों में उन्होंने सम्राट से यह प्रार्थना की कि क्रूस पर चढ़ाते समय उनका सिर नीचे और पाँव ऊपर कर दिये जाएँ ; क्योंकि वे उसी प्रकार क्रूस पर मरना नहीं चाहते थे जिस प्रकार उनके दिव्य गुरू मरे थे। वैटिकन पहाड़ी की तराई में उन्हें क्रूस पर चढ़ाया गया। वहीं उनकी कब्र बनायी गयी। अब उनकी कब्र पर ही सन्त पेत्रुस का महामन्दिर खड़ा है जो संसार का सबसे महान् गिरजाघर है और वह उनका त्याग, निर्भीकता और महानता का स्मरण दिलाता है। कलीसिया में सन्त पेत्रुस और पौलुस का पर्व 29 जून को मनाया जाता है।

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