प्रेरित सन्त थोमस

 

सन्त थोमस जिन्हें दिदिमुस ( जुड़वा ) भी कहा जाता था , गलीलिया के एक सीधे - सादे, सरल एवं परिश्रमी मछुए थे। येसु ने उन्हें अपने शिष्य होने के लिए बुलाया और बारह प्रेरितों में से एक बनने के लिए चुन लिया।

 

थोमस के विषय में सुसमाचारों में केवल तीन ही घटनाओं का उल्लेख है। किन्तु ये घटनाएं ऐसी हैं कि प्रेरितों में से पेत्रुस और योहन के बाद थोमस से सर्वाधिक परिचित होने के लिए पर्याप्त है। अपने प्रभु के प्रति थोमस का प्रेम और आदर अत्यन्त तीव्र था। इसका प्रमाण हमें येसु द्वारा लाजरूस के जिलाये जाने की घटना में मिलता है। जब येसु को ज्ञात हुआ कि लाजरूस मर गये हैं, तो भी वे अपने मित्र के यहाँ जाना चाहते हैं, यह जानते हुए कि यहूदी उन्हें मार डालने की ताक में थे। अतः प्रेरित गण येसु को यहूदिया में जाने से रोकना चाहते थे। किन्तु येसु अपने निर्णय पर अटल थे। तब थोमस ने निर्भीकतापूर्वक अपने साथियों से कहा- "हम भी चलें और इनके साथ मर जाएँ।” (योहन11:16 )

 

इसी तरह अन्तिम भोजन के समय येसु ने अपने प्रेरितों से कहा कि मैं जहाँ जा रहा हूँ, वहाँ का मार्ग तुम जानते हो। इस पर थोमस ने निष्कटपता से कहा "प्रभु, हम यह भी नहीं जानते कि आप कहाँ जा रहे हैं, तो वहाँ का मार्ग कैसे जान सकते हैं? "थोमस ने अपनी अज्ञानता बेहिचक प्रभु के सम्मुख रखी और प्रत्युत्तर में प्रभु से यह आश्वासन पाया- “मैं ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ।” साथ ही येसु पिता के साथ अपने सम्बन्ध को भी विस्तार के साथ समझाते हैं।

इससे भी बढ़कर सन्त थोमस अपने प्रभु के पुनरुत्थान की सच्चाई को सार्वजनिक रूप से प्रमाणित करने की अपनी भूमिका के कारण प्रसिद्ध हुए हैं । पुनरुत्थान की संध्या को जब प्रभु ने प्रेरितों को दर्शन दिये तब थोमस उनके साथ नहीं थे। बाद में उनके लौटने पर जब दूसरे प्रेरितों ने उन्हें बताया कि हमने प्रभु को देखा है, तो थोमस ने विश्वास नहीं किया और स्वयं देखने पर ही विश्वास करने की जिद की। इसी से वे अविश्वासी थोमस कहलाये। किन्तु प्रभु येसु थोमस के हृदय के गहरे प्रेम को तथा स्वयं प्रभु को देखने की उनकी तीव्र इच्छा को जानते थे। अतः जैसे एक प्रेमी पिता अपने प्यारे पुत्र की भली इच्छा खुशी से पूर्ण करता है, उसी प्रकार येसु ने थोमस की मनोकामना पूर्ण की। आठ दिनों पश्चात् जब थोमस भी सबके साथ उपस्थित थे, प्रभु ने प्रेरितों को दूसरी बार दर्शन दिये और उनकी माँग पूर्ण करते हुए उन्हें अपने हाथ और बगल के चिह्न दिखाये और उन पर अपनी उंगलियाँ रखने के लिए कहा। इस पर थोमस तीव्र विश्वास से परिपूर्ण होकर- “मेरे प्रभु , मेरे ईश्वर " कहते हुए येसु की ईश्वरता में अपने सुदृढ़ विश्वास की घोषणा प्रकट रूप से की जो कलीसिया में विश्वास की सबसे सुन्दर स्वीकारोक्ति है।

 

येसु ने अपने पुनरूत्थान के पश्चात् गलीलिया की झील की तट पर सात प्रेरितों को तीसरी बार दर्शन दिये, तब थोमस भी उनके साथ थे; और प्रभु आदेशानुसार जाल डालने पर उन्हें अद्भुत रीति से बहुत मछलियाँ प्राप्त हुई। सन्त थोमस के विषय में ये ही तीन घटनाएँ नये व्यवस्थान में वर्णित हैं जो अत्यन्त के महत्त्वपूर्ण हैं।

 

काथलिक परम्परा के अनुसार कहा जाता हैं कि पेन्तेकोस्त के बाद जब प्रेरित गण प्रभु के आदेशानुसार सुसमाचार - घोषणा के लिए यहूदिया छोड़ कर अन्य स्थानों की ओर प्रस्थान करने लगे, तब थोमस पार्थिया, मेदिया तथा फारस देश गये और वहाँ के लोगों को उन्होंने प्रभु का सन्देश दिया । तत्पश्चात् वे वहाँ से भारत जाने वाले यात्री- दल के साथ उत्तरी - पश्चिमी भारत के सिन्ध प्रान्त में पहुंचे। वहाँ से जहाज द्वारा हाबान नामक एक यहूदी व्यापारी के साथ सन् 52 में भारत के पश्चिम में मलाबार तट पर कोडुंगल्लूर नामक छोटे से बन्दरगाह में उतरे। वहाँ उन दिनों यहूदियों की बस्ती थी। क्योंकि प्राचीन काल से ही दक्षिण भारत के साथ सीरिया के यहूदियों का व्यापारिक सम्बन्ध था। सीरिया के व्यापारी भारत से मसाले एवं सुगन्धित द्रव्य ले जाया करते थे। अब भी कोंडुगल्लूर तथा कोचिन में यहूदी लोग रहते हैं। वहाँ थोमस ने मलाबार तट के लोगों के बीच सुसमाचार प्रचार किया और सुदृढ़ विश्वास के साथ प्रभु का साक्ष्य दिया। ख्रीस्त के से प्रेम और दया के साथ उन्होंने सभी रोगियों, दुःखियों तथा लाचारों को प्रभु की शक्ति से चंगाई और सांत्वना दी; यहाँ तक कि उन्होंने मुर्दो को पुनर्जीवित भी किया। उनके खीस्त तुल्य प्रेम और दयापूर्ण सेवा- कार्यों तथा येसु की शक्ति से की गई करामातों को देखकर लोगों ने बड़ी संख्या में प्रभु में विश्वास किया। थोमस दिन भर लोगों की सेवा में लगे रहते थे और रात को देर तक अपने प्रभु के समान किसी एकान्त पहाड़ी स्थानों पर प्रार्थना किया करते थे। केरल में 'मलयाटूर ' नामक पहाड़ी सन्त थोमस के प्रार्थना स्थल के रूप में प्रसिद्ध तीर्थ स्थल बना हुआ है। वहाँ रह कर उन्होंने लोगों के विश्वास को सुदृढ़ किया और सात स्थानों पर कलीसिया की स्थापना की तथा गिरजाघरों का निर्माण किया। सन्त थोमस के द्वारा स्थापित यह कलीसिया अब केरल में सीरो- मलाबार रीति की कलीसिया कहलाती है।

 

मलाबार तट की कलीसिया को सुदृढ़ करने के पश्चात् सन्त थोमस मलयाटूर पहाड़ी को पार करते हुए पूर्व की ओर आगे बढ़कर चेन्नई पहुँचे और वहाँ आस पास के क्षेत्रों में सुसमाचार घोषणा करने लगे। वे दिन- भर लोगों की प्रेमपूर्ण सेवा में लगे रहते और रात को देर तक प्रभु से प्रार्थना किया करते थे। इस बीच वहाँ कई ईर्ष्यालु पुजारी उनके शत्रु बन गये। एक रात को जब वे चेन्नई के निकट एक छोटी पहाड़ी पर प्रार्थना कर रहे थे, तब शत्रुओं ने उन पर भाला भोंक कर उनकी हत्या कर दी। इस प्रकार सन् 72 ईस्वी में सन्त थोमस अपने प्रभु के लिए रक्त बहा कर शहीद बन गये। वह स्थान जहाँ सन्त थोमस शहीद बने, अब सेंट थोमस माउंट कहलाता है।

 

इस प्रकार सन्त थोमस ने अपने प्रभु येसु के आदेशानुसार उनके सुसमाचार की ज्योति को लेकर पृथ्वी की सीमान्तों तक की यात्रा की और विशेष रूप से दक्षिण भारत में उस ज्योति को प्रज्वलित किया जो दो हजार वर्षों से निरन्तर अक्षुण्ण रूप से जल रही है; और दिनों- दिन विकसित होकर लाखों- करोड़ों लोगों तक अपना दिव्य- आलोक बिखेर रही है। सन्त थोमस ने अन्य सभी प्रेरितों से बढ़कर सर्वाधिक लम्बी दूरी की यात्रा की और उस समय तक ज्ञात देशों की सीमान्तों तक पहुँचकर सुसमाचार की घोषणा करने का गौरव उन्हें प्राप्त है।

 

सन्त थोमस की पार्थिव देह को वहाँ निकट ही माइलापुर में दफनाया गया जहाँ उनके नाम से सन्त थोमस महा गिरजाघर बना हुआ है। बाद में उनके पूज्य अवशेषों को मेसोपोटेमिया के एदेसा नगर में ले जाया गया है; और 13 वीं सदी में उसे इटली में स्थानान्तरित किया गया।

 

सन्त थोमस का पर्व 3 जुलाई को मनाया जाता है।

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