प्रेरित सन्त अन्द्रेयस

सन्त अन्द्रेयस प्रभु येसु के अति प्रिय चार शिष्यों में से एक थे। वह सन्त पेत्रुस के बड़े भाई एवं बेथसाइदा के रहने वाले एक मछुए थे। वह बड़े मिलनसार, सरल, उदार एवं सेवा तत्पर व्यक्ति थे। प्रारम्भ में वह यहां बपतिस्ता के शिष्यों में से एक थे। एक दिन यहां बपतिस्ता अपने दो शिष्य अन्द्रेयस एवं  यहां के साथ खड़े थे। उन्होंने येसु को गुजरते देखा; और यहां बपतिस्ता ने उनसे कहा- "देखो, ईश्वर का मेमना।" यह सुनकर दोनों शिष्य येसु के पीछे हो लिए। उन्होंने येसु से पूछ, "आप कहाँ रहते हैं ?" प्रभु ने बड़े प्यार से उनका स्वागत किया और कहा-"आओ और देखो।" उन्होंने जाकर देखा कि वे कहाँ रहते है; और उस दिन वे उनके साथ रहे। (सन्त योहन 01:13-39) अपने चिर प्रतीक्षित मुक्तिदाता को पाकर अन्द्रेयस का हृदय इतना आनन्दित हो उठा कि यह शुभ समाचार अपने भाई को देने के लिए वह शीघ्रता से चल पड़े। उन्होंने अपने भाई पेत्रुस से मिलकर कहा- "हमें मुक्तिदाता मिल गए हैं" , और वह उन्हें येसु के पास ले गए। मुक्तिदाता को पाने की उनकी इच्छा इतनी तीव्र थी की बिना किसी चमत्कार को देखे ही उन्होंने प्रभु में गहरा विश्वास किया और अनुभव किया कि यही उनकी प्रतीक्षित मुक्तिदाता हैं। वास्तव में अन्द्रेयस ही प्रथम शिष्य हैं जो येसु द्वारा बुलाये गए। तब से वह येसु के निकट रहते और हर आवश्यक बात की जानकारी उन्हें देते थे।
सुसमाचारों में हमें अन्द्रेयस के नाम का उल्लेख तीन विशेष अवसरों पर मिलता है। पहला है, रोटियों के चमत्कार के समय। गलीलिया के समुद्र के उस पार विशाल जन समूह को देखकर जब येसु ने पूछा, "हम इन्हे खिलाने के लिए कहाँ से रोटियाँ खरीदें?" उस समय अन्द्रेयस ने ही येसु को बताया भीड़ में एक लड़के के पास जौ की पाँच रोटियां और दो मछलियाँ हैं। किन्तु यहाँ एकत्रित भीड़ के लिए यह कुछ नहीं के बराबर हैं। फिर भी अन्द्रेयस के दिल में अपने गुरु के प्रति अटूट विश्वास और आसरा था। उन्हें पूर्ण आशा थी कि येसु इन थोड़ी-सी रोटियों को ही उस विशाल जनसमूह के लिए पर्याप्त बना देंगे। इससे यह भी प्रकट होता है कि उस जनसमूह के अधिक से अधिक लोगों के विषय में अन्द्रेयस को जानकारी थी। इससे उनकी विशाल दृष्टि और उदारता का परिचय मिलता है।
दूसरा अवसर है जब कुछ यूनानी तीर्थयात्री पास्का पर्व के अवसर पर येरूसालेम आये थे; वे येसु से मिलना चाहते थे। उन्होंने फिलिप से इस सम्बन्ध में बातें की। फिलिप ने यह बात अन्द्रेयस को बताई। अन्द्रेयस ने फिलिप को साथ लेकर येसु को इसकी सुचना दी। अन्द्रेयस  और फिलिप दोनों यूनानी भाषा और संस्कृति के जानकर थे। अतः उन्होंने उन लोगों के लिए दुभाषिए का काम किया। अन्द्रेयस सदैव तत्पर थे कि सभी आगन्तुकों का येसु से परिचय कराये।
तीसरा अवसर वह था, जब येसु ने येरूसालेम मंदिर के विनाश के सम्बन्ध में भविष्यवाणी की। अन्द्रेयस ने तब अपने साथियों के साथ येसु से पूछा, "प्रभु, हमें बताइये, वह कब होगा और किस चिह्न से पता चलेगा कि यह सब पूरा होने को है?" (सन्त मरकुस13:1-4) इसके उत्तर में प्रभु ने मंदिर के विनाश एवं संसार के अन्त के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी उन्हें प्रदान की। साथ ही उन्हें शिक्षा दी कि वे सदैव सतर्क रहें।
परम्पराओं के अनुसार अन्द्रेयस  ने पेत्रुस के आग्रह को मानकर यूनान देश में सुसमाचार का प्रचार किया और दक्षिण अलबेनिया, टर्की आदि देशों में उन्होंने सफलतापूर्वक सुसमाचार की घोषणा की। जिस कलीसिया की उन्होंने स्थापना की वह रोम, फ़्रांस तथा इंग्लैण्ड तक फ़ैल गयी। रोमी सम्राट नीरो के शासनकाल में सन 60 ईस्वी में उनकी शहादत हुई। जब वह यूनान के पेत्रास नगर में प्रभु की वाणी सुना रहे थे, शत्रुओं ने उन्हें पकड़कर X आकर के क्रूस से कसकर बाँध दिया। अपने भाई पेत्रुस की तरह उन्होंने भी कहा- कि मैं अपने प्रभु के समान क्रूस पर ठोंके जाने योग्य नहीं हूँ। अतः उनके सर को निचा करके बाँध दिया गे ताकि उनकी मौत शीघ्र न हो, बल्कि वह देर तक घोर यातना सहते रहे। कहा जाता है कि उस हालत में रहते हुए भी उन्होंने दो दिनों तक अपने अनुयायियों को धैर्य बँधाया और कभी पीछे न हटने की शिक्षा दी।
जैसे ही उन्होंने अपनी यंत्रणा के साधन-रुपी क्रूस को देखा, उसका आलिंगन करते हुए उच्च स्वर में बोल उठे, "हे पावन क्रूस, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, जो मेरे दिव्य गुरु के शरीर के स्पर्श से पवित्र किया गया है। तुझ पर हमारे प्रभु के मरने से पूर्व तू हमारे लिए भयानक वास्तु थी। किन्तु अब तेरे प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं तुझे बहुमूल्य उपहार स्वरुप स्वीकार करता हूँ। अब प्रभु येसु के शिष्यगण उस महान आनन्द को जान गए हैं जो तुझमे छिपा है। अतः मैं बड़े आनन्द एवं गहरे विश्वास के साथ तेरी ओर आ रहा हूँ। प्रभु के विजयी शिष्य के रूप में मुझे भी स्वीकार कर। मुझे अपने गुरु के पास ले चल जिन्होंने तेरे द्वारा मेरी मुक्ति की।

दो दिनों तक क्रूस पर प्राण-संकट सहने के पश्चात् उनकी पावन आत्मा अपने सृष्टिकर्ता ईश्वर के साथ सदा सुखी रहने के लिए उनके साथ परम धाम में बुला ली गयी। इस प्रकार उन्होंने ख्रीस्तीय जीवन में क्रूस के महत्त्व को सिद्ध कर दिया कि क्रूस मुक्तिदाता के अनुरूप बनने का सर्वश्रेष्ठ साधन है।
सन्त अन्द्रेयस  के जीवन से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम भी उनकी तरह तत्परता से प्रभु का अनुसरण करें और जिन लोगों से हम मिलते हैं उनसे उत्साहपूर्वक येसु के विषय में बोले।
माना जाता है कि प्रेरित अन्द्रेयस ने रूस तथा स्कॉटलैंड में भी सुसमाचार का प्रचार किया। इसलिए वे रूस तथा स्कॉटलैण्ड के संरक्षक सन्त माने जाते है। 
माता कलीसिया 30 नवम्बर को प्रेरित सन्त अन्द्रेयस का पर्व मनाती है।

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