टूर्स के सन्त मार्टिन

फ़्रांस के संरक्षक सन्त के रूप में विख्यात सन्त मार्टिन का जन्म तत्कालीन रोमी साम्राज्य के पन्नोनिया में (जो वर्त्तमान हंगरी में है), सन 316 में हुआ। उनके माता-पिता दोनों ही गैर-ईसाई थे। उनके पिता रोमी सेना में उच्च अफसर थे। मार्टिन के जन्म के कुछ वर्षों पश्चात् उनका स्थानांतरण इटली के पाविया नगर में हुआ, जहाँ मार्टिन को प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त हुई।
जब मार्टिन दस वर्ष के बालक ही थे, पाविया के कुछ ख्रीस्तीयों से उनकी मुलाकात हुई। उन लोगों के मुँह से प्रभु येसु के विषय में मार्टिन को जानकारी प्राप्त हुई। बालक मार्टिन प्रभु येसु के प्रेम और दया से इतने प्रभावित हुए कि वे अपने माता-पिता की इच्छा के विपरीत उन ख्रीस्त-भक्तों के साथ गिरजाघर जाने लगे और बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए दीक्षार्थी बन गए। उन दिनों रोमी साम्राज्य में ख्रीस्तीय धर्म को सम्राट कोंस्टांटिन के द्वारा स्वीकृति मिल गयी थी, फिर भी समाज के उच्चा वर्ग के लोगों में इस धर्म का प्रचार बहुत कम हुआ था। मार्टिन जब पंद्रह वर्ष के हुए; तब उनके प्रभावशाली पिता के कारण उन्हें रोमी सेना के घुड़सवार विभाग में भर्ती किया गया और एमियर नगर में उनकी नियुक्ति हुई। कुछ समय पश्चात् मार्टिन को उनका कप्तान बना दिया गया। शीत ऋतू में एक दिन जब मार्टिन अपने सैनिकों के साथ घोड़े पर सवार होकर प्रस्थान कर रहे थे, तब उन्होंने एक अर्ध-नग्न भिक्षु को देखा, जो कड़ाके की ठण्ड में ठिठुर रहा था। जब मार्टिन ने अपनी जेब टटोली, उसमे कुछ भी पैसा नहीं था। अतः दयालु मार्टिन ने तुरंत अपना सैनिक चोगा उतरा और तलवार से उसके दो टुकड़े किये और आधा भाग उस गरीब को दे दिया। उस रात को जब मार्टिन सो रहे थे, प्रभु येसु ने वह आधा चोगा पहने हुए उन्हें दर्शन दिए जिसे मार्टिन ने उस भिखारी को था; और येसु ने अपने स्वर्गदूतों से कहा- "यही है, रोमी सैनिक मार्टिन जिसने अब तक बपतिस्मा ग्रहण नहीं किया है; फिर भी उसने मुझे वस्त्र पहनाया हैं।" इससे मार्टिन को पूर्ण विश्वास हो की जब हम किसी दीन-हीन पर दया करते हैं, तब हम सचमुच प्रभु येसु की ही सहायता करते है। अतः प्रभु येसु में  विश्वास और भी गहरा हो गया। बिना देरी उन्होंने बपतिस्मा ग्रहण किया और कलीसिया के सदस्य बन गए। आगे दो वर्षों तक वे रोमी सेना में सेवा करते रहे।
तत्पश्चात उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और घर लौटा आये। क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि मैं अब ख्रीस्त का सैनिक हूँ, और मुझे सबसे प्रेम करना है, लड़ना नहीं। इस पर सैनिक अधिकारियों ने उन पर कायरता का आरोप लगा कर उन्हें कारावास में दाल दिया। तब मार्टिन इस बात पर सहमत हो गए कि मैं बिना शस्त्र धारण किये सेना  टुकड़ी के आगे रहूँगा। अतः उनके अधिकारी उन्हें वापस लेना चाहते थे। इस बीच शत्रु सेना ने शांति की संधि कर ली और युद्ध टल गया। अतः मार्टिन को सेना से छुटकारा मिल गया और वे फिर पाविया में अपने घर आ गए। वहाँ वे अपनी माँ का मन-परिवर्तन करने में सफल हुए।  किन्तु उनके पिता अविश्वासी ही रहे। इस पर एरियन विधर्मियों ने मार्टिन को उनके घर से भगा दिया।
अब मार्टिन ने पोइटियर्स में सन्त हिलेरी के पास शरण ली और उनके शिष्य बन गए। किन्तु कुछ समय पश्चात् एरियन लोगो ने सन्त हिलेरी को पोइटियर्स से बहुत दूर निर्वासित कर दिया। इस पर मार्टिन ने भूमध्य सागर के एक द्वीप में शरण ली और वहाँ एकांत-वास करते हुए प्रार्थनामय जीवन बिताने लगे।
सन 361 में सम्राट के आदेश से मार्टिन फिर से पोइटियर्स लौट आये। इस पर आस-पास के अनेक मठवासी उनके साथ रहने आये। उनके साथ मिलकर मार्टिन ने पोइटियर्स के निकट लिगुंजे में सन्त बेनेदिक्त के नियमों के अनुसार एक मठ की स्थापना की जो फ़्रांस में इस प्रकार का प्रथम मठ था। वहाँ प्रार्थनामय जीवन बिताते हुए मार्टिन कई बार उस प्रान्त के गावों में प्रभु के सुसमाचार की शिक्षा देने के लिए जाया करते थे। गाँव के लोगों में मूर्ति पूजा का बड़ा चलन था। दस वर्ष पश्चात् मार्टिन को टूर्स नगर बुलाया गया और वहाँ के लोगों ने एक मत होकर उन्हें टूर्स नगर का धर्माध्यक्ष चुन लिया। क्योंकि वहाँ के धर्माध्यक्ष का देहांत हो जाने से धर्मासन रिक्त था। यद्यपि विनम्र मार्टिन इस पद को स्वीकार करना पड़ा।

धर्माध्यक्ष के रूप में उन्होंने,  विनम्र, प्रार्थनामय एवं तपस्यापूर्ण जीवन जिया। वहाँ के अधिकांश लोग मूर्तिपूजक थे। मार्टिन अपने तीव्र विश्वास एवं प्रवचनों तथा आदर्श जीवन के द्वारा उन लोगों का मन परिवर्तन करने में सफल हुए; और इस कारण वे टूर्स के प्रेरित कहलाये। उनका धर्माध्यक्षीय शासन न्याय एवं शांति पर आधारित था। फिर भी एरियन तथा अन्य विधर्मियों ने उनके कार्य में विविध प्रकार की बाधाएं कड़ी की। किन्तु मार्टिन की प्रार्थना एवं पवित्र जीवन के संमुखब वे टिक नहीं सके। शहर के कोलाहल से बचने के लिए मार्टिन कुछ दूर देहात में एक छोटी सी कोठरी बनवा कर उसमे रहने लगे। धीरे- कई मठवासी वह उनके साथ रहने आये और वहाँ फ़्रांस का दूसरा मठ बन गया। ईश्वरीय राज्य के प्रसार के लिए धर्माध्यक्ष मार्टिन ने निरंतर कठिन परिश्रम किया और अंत 11 नवम्बर 397 को 80 वर्ष की आयु में वे अनंत पुरुस्कार के लिए अपने पिता के निवास में बुला लिए गए।
पश्चिमी कलीसिया में सन्त मार्टिन ही ऐसे प्रथम सन्त थे जो शहीद नहीं होते हुए भी उन्हें सार्वजानिक रूप से सम्मान दिया जाता है। अनेक गिरजाघर उनके नाम पर समर्पित हैं जहाँ उनकी विशेष भक्ति की जाती है। कई शहर भी उनके नाम से पुकारे जाते है।
माता कलीसिया सन्त मार्टिन का पर्व 11 नवम्बर को मनाती है।

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