शांति की तलाश में न्याय हमेशा साथ देना चाहिए, पोप 

इटली की न्यायपालिका की उच्च परिषद को दिये संदेश में, पोप फ्राँसिस ने जोर देकर कहा कि न्याय के लिए सच्चाई, विश्वास, निष्ठा और इरादे की शुद्धता की आवश्यकता होती है। न्याय मानवीय गरिमा और सामान्य भलाई की सेवा में एक उपहार और कर्तव्य है।
पोप फ्राँसिस ने शुक्रवार को इटली की न्यायपालिका की उच्च परिषद के सदस्यों से मुलाकात की। यह परिषद देश के सामान्य न्यायपालिका को नियंत्रित करता है। पोप ने कहा कि वे "एक महान और नाजुक मिशन" के लिए बुलाये गये हैं। उनके उपर न्याय के लिए लोगों की मांगों का जवाब देने की जिम्मेदारी है, जो बदले में सच्चाई, विश्वास, वफादारी और इरादे की शुद्धता की मांग करती है।
पोप ने कहा कि जिन्हें न्याय प्रदान करने का जिम्मा सौंपा गया है, वे "उन लोगों की पुकार सुनने के लिए भी बुलाये गये हैं, जिनके पास कोई आवाज नहीं है और जो अन्याय सहते हैं।"
न्याय प्रणाली में समय-समय पर सुधार की आवश्यकता पर विचार करते हुए, पोप फ्राँसिस ने इटली के संरक्षक संतों में से एक, सिएना की समत काथरीन को याद किया, जिन्होंने सिखाया है कि कुछ सुधार करने के लिए पहले स्वयं को सुधारना चाहिए। न्यायिक व्यवस्था में सुधार के संदर्भ में, संत पापा ने कहा, इसका अर्थ यह पूछना है कि "किसके लिए" न्याय दिया जाता है, "कैसे" इसे प्रशासित किया जाता है, और "क्यों" इसे प्रशासित किया जाता है।
पोप ने कहा कि प्रश्न "किसके लिए" एक रिश्ते का अर्थ है, यह देखते हुए कि जैसे-जैसे हमारी दुनिया अधिक जुड़ी हुई है, यह विरोधाभासी रूप से अधिक खंडित हो गई है। इस संदर्भ में, रिश्तों पर आधारित पुनर्स्थापनात्मक न्याय को "बदला लेने और विस्मृति के लिए एकमात्र सच्चा मारक" के रूप में पहचाना जा सकता है, क्योंकि यह टूटे हुए बंधनों के पुनर्संरचना को देखता है और भाई के खून से सनी हुई भूमि के सुधार की अनुमति देता है।
इसी तरह, व्यवहार में न्याय को "कैसे" प्रशासित किया जाता है, यह प्रश्न कई सुधारों से गुजर सकता है, जबकि यह स्वीकार करना चाहिए कि शांति केवल न्याय में स्थापित की जा सकती है। और फिर, "क्यों" के प्रश्न के उत्तर में, पोप फ्राँसिस ने न्याय का प्रशासन करने वालों के विवेक पर जोर देते हुए अपील की और कहा कि न्याय के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्तिगत और सामाजिक पहचान का एक हिस्सा होना चाहिए।
पुराने व्यवस्थान के राजा सुलेमान की महान शख्सियत को याद करते हुए, पोप फ्रांसिस ने कहा कि न्याय करना "उन लोगों का लक्ष्य होना चाहिए जो बुद्धिमानी से शासन करना चाहते हैं, जबकि समझ बुराई से अच्छाई को अलग करने की शर्त है।"
पोप फ्राँसिस ने पोंतुस पिलातुस का उदाहरण दिया, जिन्होंने राजनीतिक चिंताओं से प्रेरित होकर, सच्चे न्याय के प्रति अपनी रुचि होने के बजाय "अपने हाथ धोते हुए" येसु की निंदा करने में लोगों की इच्छा को स्वीकार किया। संत पापा पोप ने कहा, सही न्याय "साक्ष्य की विश्वसनीयता, अधिकार, अन्य गठित शक्तियों से स्वतंत्रता और पदों का एक वफादार बहुलवाद राजनीतिक प्रभावों, अक्षमताओं और विभिन्न बेईमानी को प्रचलित होने से रोकने के लिए मारक हैं।"
अंत में, पोप ने सकारात्मक, ठोस उदाहरण न्यायाधीश रोसारियो लिवाटिनो को याद किया, जो औपचारिक रूप से धन्य घोषित किये गये पहले न्यायाधीश हैं, जिन्होंने "एक तरफ कठोरता और निरंतरता और दूसरी ओर मानवता के बीच द्वंद्वात्मकता में ... सेवा के अपने विचार को रेखांकित किया और इतिहास एवं समाज के साथ चलने में सक्षम महिलाओं और पुरुषों की न्यायपालिका की सोच, "न्यायाधीशों और नागरिक नेताओं के साथ" न्याय के अनुसार अपना काम करने का आह्वान किया। संत पापा ने कहा, धन्य रोसारियो की 1990 में माफिया द्वारा हत्या कर दी गई थी, उन्होंने हमें न केवल एक "विश्वसनीय गवाही" दी है, बल्कि एक स्पष्ट विचार दिया है कि न्यायपालिका क्या होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "न्याय, हमेशा शांति की तलाश में साथ होना चाहिए, जो सत्य और स्वतंत्रता को मानता है।"
उच्च परिषद के सदस्यों को संबोधित करते हुए, पोप फ्राँसिस ने अपनी आशा व्यक्त करते हुए अपना संदेश समाप्त किया, "न्याय की भावना अन्याय के शिकार लोगों के साथ एकजुटता से पोषित होती है और न्याय एवं शांति के राज्य को देखने की इच्छा से पोषित होती है, आपमें बुझने न पाए।”

Add new comment

11 + 0 =