पोप : सांत्वना एक अद्वितीय उपहार

पोप फ्रांसिस ने बुधवारीय आमदर्शन की धर्मशिक्षा माला में आत्माओं की परख, ईश्वर की ओर से आने वाली सांत्वना के बारे में जिक्र किया हमें अच्छे कार्यों को करने के लिए सदैव प्रेरित करती है।
पोप फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।
हम आत्मा-परीक्षण पर अपनी धर्मशिक्षा माला जारी रखते हैं- यह हमें अपने हृदय में, हमारी आत्मा में होने वाली प्रेरणा को जानने में मदद करती है। निराशा की विषयवस्तु पर विचार करने के उपरांत जो हमारे हृदय का अंधकारमय क्षणों में होने को व्यक्त करता है, आज हम सांत्वना के बारे में जिक्र करेंगे जो हृदय का ईश्वरीय प्रकाश में होने की बात कहता है। यह आत्मा-परीक्षण का एक दूसरा महत्वपूर्ण कारक है जिसे हम सहज तरीके से नहीं ले सकते हैं, क्योंकि यह हमें भ्रमित कर सकता है। हमें इसे समझने की जरुरत है जैसे कि हमने निराशा को अच्छी तरह जानने का प्रयास किया।
पोप ने आध्यात्मिक सांत्वना के बारे में कहा कि यह आंतिरक खुशी की एक अनुभूति है, जहाँ हम सभी चीजों में ईश्वर की उपस्थिति को देखते हैं। यह हमारे विश्वास और आशा, यहाँ तक की अच्छे कार्य करने की योग्यता को मजबूत करती है। वह व्यक्ति जो अपने में ईश्वरीय सांत्वना का अनुभव करता है जीवन की कठिन परिस्थितियों में कभी निराशा नहीं होता है क्योंकि वह अपने अंदर एक शांति का अनुभव करता है जो किसी भी मुसीबत से अधिक मजबूत होती है। इस भांति यह आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ हमारे दैनिक जीवन के लिए एक अति बृहृद उपहार है। 
पोप फ्रांसिस ने कहा कि सांत्वना एक आंतरिक अवेग है जो हमारे हृदय अंतःस्थल का स्पर्श करती है। यह चकाचौंध करने वाली नहीं बल्कि मुलायम, सुकोमल होती है मानों एक स्पंज में पानी की बूंदें गिरती हों (आध्यात्मिक साधना,335)। इस स्थिति में व्यक्ति अपने को ईश्वरीय उपस्थिति में घिरा पाता जहाँ वह अपने व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सदैव सम्मान करता है। यह कभी विसंगति भरी नहीं होती जो हमारी चाहतों का दमन करती हो या न ही यह खत्म होने वाला एक उत्साह है। इसके विपरीत जैसे हमने देखा है, यहाँ तक की दुःख-दर्द की स्थिति में भी- उदाहरण के लिए जहाँ हम अपने पापों को देखते हैं यह हमारे लिए सांत्वना का एक कारण बनता है।
उन्होंने कहा कि हम संत अगुस्टीन के अनुभवों की याद करें, वे अपनी माता मोनिका के संग स्वर्गीय जीवन की सुन्दरता के बारे में बातें करते हैं, या हम संत फ्रांसिस के बारे में सोचें जिन्होंने अपने जीवन में घोर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, इस भांति हम बहुत से संतों के बारे में चिंतन कर सकते हैं जिन्होंने अपने जीवन में महान कार्य इसलिए नहीं किये क्योंकि वे अपने में वैभवशाली या अतियोग्य थे बल्कि उन्होंने अपने को ईश्वर के शांतिमय प्रेम की मधुरता से वशीभूत पाया। संत इग्नासियुस ने संतों की जीवनी पढ़ते हुए अपने लिए आश्चर्यजनक रुप में इसी शांति का अनुभव किया। सांत्वना का अनुभव करने हेतु हमें ईश्वर के संग शांति में रहने की जरुरत है, हमें यह अनुभव करने की आवश्यकता है कि सभी चीजें शांति में व्यवस्थित होती हैं, यह हमारे अंदर शांति लाती है। एडिथ स्टीन ने अपने मनफिराव के उपरांत इसी दिव्य शांति का अनुभव किया। अपने बपतिस्मा के एक साल बाद उन्होंने लिखा, “जैसे ही मैंने अपने को इस अनुभूति में छोड़ा, धीरे-धीरे एक नये जीवन की उत्पत्ति मुझ में हुई- जो मुझ पर कोई दबाव नहीं डाली- जहाँ मैं इस नयेपन का अनुभव करती हूँ। इस नये जीवन का प्रवाह एक क्रियाकलाप से उत्पन्न होता और मुझे शक्ति से भर देता है जो मेरा नहीं है, यह मुझमें कोई हिंसा बिना किये क्रियाशील हो जाता है।”
इससे भी बढ़कर सांत्वना हममें आशा उत्पन्न करती है जो हमें भविष्य की ओर एक यात्रा में आगे ले चलती है। यह हमें उन बातों की पहल करने हेतु प्रेरित करती है जिन्हें हम सदैव अपने से दूर करते रहे हैं या जिनकी हम आशा तक नहीं करते हैं, जैसे कि एडिथ स्टीन के साथ हुआ।
पोप ने कहा कि यह सांत्वना एक ऐसी शांति है जो हमें बैठे नहीं रखती...यह शांति हमें ईश्वर की ओर उन्मुख करती और हमें एक मार्ग में अच्छे कार्यों को करने हेतु अग्रसर करती है। सांत्वना की घड़ी में हम सदैव बहुत सारे अच्छे कार्यों करने की चाह रखते हैं। वहीं निराशा की स्थिति में हम अपने में बंद हो जाते और कुछ करना नहीं चाहते हैं। सांत्वना हमें आगे बढ़ने को प्रेरित करती है, जहाँ हम दूसरों की, समाज और लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं। आध्यात्मिक सांत्वना हमारे लिए “नियंत्रण” के बाहर होती है इसे हम अपनी इच्छा के अनुरूप कार्यान्वित नहीं कर सकते हैं। यह हमारे लिए पवित्र आत्मा का एक उपहार है। यह ईश्वर के संग एक संबंध स्थापित करने में मदद करती है जो दूरियाँ खत्म कर देती है। बालक येसु की संत तेरेसा, चौदाह साल की उम्र में अपनी रोम यात्रा के दौरान, येरुसालेम के पवित्र क्रूस महागिरजाघर में उस कील जिसकी आराधना की जाती है, स्पर्श करने की कोशिश करती है जिससे येसु को क्रूसित किया गया था। अपने इस साहस को तेरेसा प्रेम और विश्वास की निशानी स्वरूप देखती और समझती है। 

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