पोप : येसु की शांति हथियारबंद नहीं

पोप फ्रांसिस ने अपनी बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में ईश्वर के द्वारा पास्का में मिलने वाली शांति का उल्लेख किया जो दुनिया की शांति से एकदम भिन्न है।
पोप फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पापा पौल षष्टम के सभागार में एकत्रित सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।
हम सभी पुण्य सप्ताह से मध्य में हैं जो खजूर रविवार से शुरू होकर पास्का रविवार तक जारी रहता है। दोनों ही रविवारों के त्याहोर में हम येसु को क्रेन्द-विन्दु में पाते हैं, लेकिन वे दोनों अलग-अलग महोत्सव हैं। 
विगत सप्ताह हमने बड़े समारोह के साथ येसु का येरुसालेम में प्रवेश करने की यादगारी मनाई जहां लोगों ने चादरों और डालियों को रास्ते में बिछाते हुए (लूका.19.36) उन्हें मुक्तिदाता के रुप में स्वागत किया। आनंद से भरी भीड़ उन्हें राजा घोषित करते हुए ऊंची आवाज में पुकारती है, “धन्य है वह राजा, जो प्रभु के नाम पर आते हैं, स्वर्ग में प्रभु की जय (लूका.19.38)। जनता उल्लासित होती है क्योंकि उन्होंने येसु को नये राजा के रुप में प्रवेश करते देखा, जो शांति और महिमा स्थापित करेंगे। हम यहाँ लोगों की आशा को देखते हैं जो शांति की चाह रखते हैं, वे यह इच्छा रखते हैं कि वह रोमी सम्रराज्य की गुलामी से येरुसालेम को महिमामय मुक्ति और शांति दिलायेगा। वहीं शायद दूसरे लोग येसु को अपने सपनों के अनुरूप एक आदर्श राजा स्वरुप देखते जो सामाजिक शांति स्थापित करेंगे, जो लोगों के लिए खाने की व्यवस्था करेंगे जैसे कि उन्होंने पहले ही किया, वे महान चमत्कार दिखलायेंगे, और इस भांति दुनिया में अधिक न्याय की स्थापना करेंगे। 
लेकिन येसु ख्रीस्त इन बातों की चर्चा नहीं करते हैं। उनके लिए एक दूसरा पास्का इतंजार कर रहा होता है। अपने येरूसालेम प्रवेश में वे केवल उस बात की चिंता करते हैं कि वे उस गधे पर सवार हो कर येरुसालेम में प्रवेश करेंगे जिसकी सवारी किसी ने नहीं की है। (30)। येसु ख्रीस्त अपनी नम्रता और दीनता में इस तरह से विश्व में शांति स्थापित करते हैं, जिसकी झलक हमें लदू जानवर के रुप में मिलती है जिसकी सवारी पहले किसी ने नहीं की थी। ऐसा इसलिए क्योंकि ईश्वर के कार्य दुनिया की रीत से एकदम भिन्न हैं। वास्तव में, पास्का के ठीक पहले, येसु अपने शिष्यों से कहते हैं,“मैं तुम्हारे लिए शांति छोड़ जाता हूँ, अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ, जिस शांति को मैं तुम्हें देता हूँ वह दुनिया की शांति जैसी नहीं है” (यो.14.27)
पास्का में जिस शांति को येसु हमें देते हैं वह दुनिया की शांति जैसी नहीं है जो शक्ति प्रयोग करते हुए, दूसरों पर विजय प्राप्ति द्वारा होती है। ऐसी शांति में हम केवल युद्ध की अनुपस्थिति को पाते हैं। ईश्वर की शांति क्रूस और नम्रता का अनुसरण करती है, यह दूसरों के प्रति अपने में उत्तरदायी है। वास्तव में, येसु ख्रीस्त ने हमारी बुराइयों को, पाप और मृत्य को अपने ऊपर ले लिया। इस भांति वे हमें मुक्ति प्रदान करते हैं। उनकी शांति में हम कोई तोल-मोल नहीं पाते हैं लेकिन यह आत्म बलिदान से उत्पन्न होती है। यह दीन और साहसिक शांति का स्वागत करना यद्यपि अपने में कठिन है। वास्तव में, यह वही भीड़ है जिसने येसु का जयजकार किया और कुछ दिन बाद उसे “क्रूस दो” कहकर चिल्लाती है, लेकिन अपने में भयभीत और निराश वे किसी की ओर एक उंगली भी नहीं उठाते हैं।
इस संदर्भ में, दोस्तोवेस्की की एक कहानी लीजेंड ऑफ द ग्रैंड इनक्विसिटर अपने में प्रसिद्ध है। यह येसु के बारे में कहती है जो बहुत सालों के बाद पुनः धरती पर आते हैं। वे भीड़ के द्वारा अतिशीघ्र स्वागत किये जाते हैं जो उन्हें पहचानती और चिल्लाती है। लेकिन वह परीक्षक के द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है, जो उनके सामने दुनियावी तर्क प्रस्तुत करता है। वह येसु के बारे में सावल जवाव करता और उनकी कड़ी भर्त्सना करता है। उन्हें गाली देने का मुख्य कारण था कि वह कैसर का स्थान ले सकता था लेकिन उन्होंने उसे कभी स्वीकार नहीं किया, दुनिया का शक्तिशाली राजा मानव को गुलाम बना कर उनकी समस्यों को बलपूर्वक खत्म कर सकता था, लेकिन वह मनुष्य को स्वतंत्र छोड़ दिया। वह मनुष्य के पराधीन हृदय को अपनी ओर झुकाते हुए दुनिया में शांति स्थापित कर सकता था लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। परीक्षक येसु से कहता है, “तुम दुनिया को अपने में लेते हुए और राजा के मखमली वस्त्र धारण करते हुए वैश्विक साम्राज्य और शांति की स्थापना कर सकते थे” और वह उन्हें सजा सुनाते हुए कहता है, “अगर कोई इसका सबसे ज्यादा दोषीदार है तो वह तुम हो” (348)। यह धोखा है जो हमारे लिए इतिहास में दुहराया जाता है, यह शांति का झूठा प्रलोभन है, जो शक्ति में निहित है, जो ईश्वर के साथ धोखा और घृणा करने हेतु हमें अग्रसित करता है।
अंत में परीक्षक इस बात की चाह रखता है कि येसु कुछ कहें, जो अपने में कटु और भयावह हों। लेकिन येसु ख्रीस्त इसके प्रत्युत्तर में एक अच्छा ठोस चिन्ह व्यक्त करते हैं। वे चुपचाप उस बुजुर्ग व्यक्ति के निकट आते और उसके रक्तहीन शुष्क ओठों का धीरे से चुम्बन करते हैं। (352) येसु ख्रीस्त की शांति किसी पर दबाव नहीं डालती है यह हथियार की शांति नहीं है। सुसमाचार के हथियार प्रार्थना, कोमलता, क्षमा और पड़ोसी प्रेम है, हर पड़ोसी को शर्तहीन प्रेम करना है। ईश्वर की शांति इसी रुप में दुनिया में आती है। यही कारण है इन दिनों सशस्त्र आक्रमण पास्का के पुनर्जीवित ईश्वर के प्रति ईशनिंदनीय विश्वासघात है जो ईश्वर के कोमल चेहरे की अपेक्षा दुनियावी ईश्वर की चाह रखती है, जो ईश्वर के विरुध आक्रोश को व्यक्त करता है।

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