पोप फ्राँसिस: शिक्षक बनना एक मिशन को जीना है

पोप फ्राँसिस माएस्त्रे पिये फिलिपिनी धर्मसमाज की धर्मबहनों और विटर्बो और सिविटावेचिया-टारक्विनिया के इतालवी धर्मप्रांतों के तीर्थयात्रियों का अभिवादन किया, जिनमें पहला परमप्रसाद ग्रहण किये हुए बच्चे भी शामिल हैं।
पोप ने शनिवार 14 मई को वाटिकन के संत पापा पॉल षष्टम सभागार में माएस्त्रे पिये फिलिपिनी धर्मसमाज और वितेर्बो और चिवितावेकिया-तारक्विनिया धर्मप्रांतों से आये करीब ४ हजार तीर्थयात्रियों से मुलाकात की।
पोप ने माएस्त्रे पिये फिलिपिनी धर्मसमाज की मदर जनरल एवं धर्मबहनों और वितेर्बो और चिवितावेकिया-तारक्विनिया धर्मप्रांतों से आये धर्माध्यक्षों, पुरोहितों सभी विशवासियों के साथ वहां मौजूद महापौरों और अन्य अधिकारियों का स्वागत किया। पोप ने वहाँ उपस्थित प्रथम परमप्रसाद ग्रहण किये बच्चों को विशेष हार्दिक बधाई दी।
पोप ने कहा कि वे संत लूसिया फिलिपिनी के जन्म की 350वीं वर्षगांठ के अवसर पर उनकी खुशी में शरीक हो रहे हैं। यह जयंती वर्ष एक बहुमूल्य समय है: यह भविष्य के लिए नई ऊर्जाओं को आकर्षित करने के लिए स्रोतों पर वापस जाने जैसा है। यह प्रभु को धन्यवाद देने और प्रभु के अनुग्रह का माध्यम बनने का भी एक अवसर है जिसका संत लूसिया ने स्वागत किया था और इतने सारे लोगों के बाच उदारतापूर्वक वितरित किया था।
पोप ने माएस्त्रे पिये फिलिपिनी संस्थान और  संत लूसिया के बारे में अपना विचार प्रकट किया।
पोप ने कहा कि माएस्त्रे पिये याने धर्मी शिक्षिकाओं की मिशन शिक्षा देना है
शिक्षिका वह है जो सिखाती है। हालाँकि, एक कहावत है कि हम वह नहीं सिखाते जो हम जानते हैं, बल्कि वह सिखाते है, जो हम हैं। हमारे अंदर जो है उसे दूसरों को देते हैं। अपने दिमाग को विचारों से भरना पर्याप्त नहीं है, यह शिक्षित करना नहीं है, शिक्षित करना जीवन का संचार करना है और शिक्षक बनना एक मिशन को जीना है। दूसरी ओर, यदि हम अच्छा भाषण देते हैं, लेकिन जीवन दूसरी दिशा में जाता है, तो हम केवल एक भूमिका निभाने वाले अभिनेता होने का जोखिम उठाते हैं। उनकी संस्थापिका का उदाहरण उनहें अपने मिशन को जीने में मदद करे।
पोप ने कहा कि संत लूसिया को आमतौर पर उसके हाथ में क्रूस के साथ या क्रूस को इंगित करते हुए दर्शाया जाता है। वे जानती थी कि कई लोगों को कैसे पढ़ाना है। इसका कारण यह हा कि वह खुद गुरु येसु की शिष्या बनी रही।  वह अपनी कुर्सी, के सामने क्रूस को रखती थी। और उसी से प्रेरित होकर अपने दिल में जो अनुभव किया उसे दूसरों से साझा किया। इस तरह उसका संदेश मात्र उपदेश या सिद्धांत नहीं था, बल्कि जीवन की शिक्षा थी। उनका शैक्षिक मिशन उनके रहस्यमय अनुभव के अलावा कुछ नहीं था।
पोप ने कहा कि वे येसु के बारे "सिखाने" मात्र से संतुष्ट न हों उनहें येसु को अपने जीवन द्वारा गवाही देना है। इस तरह विश्वास का संचार होता है, जब वे हमारे जीवन में रहते हैं, हमारे जीवन को अपने स्नेह को भरते है और हमारे विचारों को एकजुट कर हमारे कार्यों को प्रेरित करते हैं। दूसरों के लिए हमारा खुलापन: जो कोई भी प्रभु को जानता है वह स्वयं को प्रार्थना में बंद नहीं करता, लेकिन सेवा करने के लिए आगे रहता है, इस बात की परवाह किए बिना कि उसे कहां या क्या करने के लिए कहा गया है। क्योंकि सेवा करना गुरु येसु की महान शिक्षा है, वे सेवा कराने के लिएनहीं लेकिन सेवा करने के लिए इस दुनिया में आये थे।
अंत में, पोप फ्राँसिस ने खुलासा किया कि संत लूसिया फिलिपिनी के पास एक रहस्य था: "वे ईश्वर में अटूट विश्वास के साथ रहती थी, क्योंकि उसने कहा, ' वे मेरे पिता होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकते'।"
पोप ने कहा कि अक्सर, जीवन में, हम चिंता करते हैं क्योंकि हमें बहुत सी चीजें पीछे छोड़नी पड़ती हैं: कुछ सुरक्षा, युवावस्था के वर्ष, स्वास्थ्य का एक पहलू, शायद प्रियजन भी।  "अगर जीवन में ऐसे लोग और चीजें हैं जिन्हें देर-सबेर हमें पीछे छोड़ना है, तो एक ऐसी उपस्थिति है जो हमें कभी नहीं छोड़ेगी, एक बुनियादी निश्चितता जो हमेशा हमारा साथ देगी और कुछ भी नहीं और कोई भी कभी भी मिटा नहीं पाएगा: ' वे मेरे पिता होने के अलावा और कुछ नहीं हो सकते'।" सब कुछ हमें विफल कर सकता है, लेकिन भगवान की कोमलता नहीं।"
पोप फ्राँसिस ने कहा, "आइए, हम इसे हमेशा याद रखें, विशेषकर अंधेरे समय में ईश्वर हमें कभी नहीं छोड़ते, क्योंकि वे हमारे पिता होने के अलावा, और कुछ नहीं हो सकते।"

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