पोप ˸ ख्रीस्तीय कलीसियाएँ युद्ध की क्रूरता के खिलाफ एक हों

पोप फ्राँसिस ने ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति की आमसभा के प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए यूक्रेन एवं विश्व के विभिन्न हिस्सों में जारी युद्धों की याद की और कहा कि वे प्रत्येक ख्रीस्तीय एवं सभी कलीसियाओं के अंतःकरण को चुनौती दे रहा है।
पोप फ्राँसिस ने शुक्रवार, 6 मई को ख्रीस्तीय एकता को प्रोत्साहन देने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति की आमसभा में भाग लेनेवाले प्रतिभागियों से मुलाकात की।  
पोप ने प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए याद किया कि महामारी के कारण लम्बे समय से सभा आयोजित नहीं की जा सकी थी, लेकिन उन्होंने यह भी गौर किया कि महामारी ने एक ख्रीस्तीय परिवार में होने की चेतना को पुनः जागृत किया है। इस चेतना ने हम सभी के एक समान दुर्बल होने का एहसास दिलाया है एवं ईश्वर की सहायता पर भरोसा करने के लिए प्रेरित किया है। विडंबना यह है कि महामारी जो हमें एक-दूसरे से दूरी रखने के लिए मजबूर करती है, यह समझने में मदद दी है कि हम एक-दूसरे से कितनी नजदीकी से जुड़े हैं। "इस चेतना को बनाये रखना और भाईचारा के मनोभाव में बढ़ना जरूरी है।"  
पोप ने कहा कि इस एकता को भूलना आसान है और यदि ऐसा होता है तो ख्रीस्तीय समुदाय में आत्मनिर्भरता का खतरा बढ़ता है जो ख्रीस्तीय एकता के लिए एक बड़ी बाधा है।
पोप ने ख्रीस्तीय एकता पर यूक्रेन में युद्ध के प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वास्थ्य संकट समाप्त होने के पहले ही पूरा विश्व यूक्रेन में जारी युद्ध के कारण एक नये संकट से जूझ रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से छोटे-छोटे युद्ध लगातार जारी हैं जिन्हें पोप ने टुकड़ों में तृतीया विश्व युद्ध कहा है, जो विश्व के कई क्षेत्रों में फैला हुआ है। दूसरे युद्धों की तरह क्रूर एवं मूर्खतापूर्ण युद्ध ने वृहद स्तर पर पूरे विश्व को प्रभावित किया है और यह हरेक ख्रीस्तीय के अंतःकरण एवं सभी कलीसियाओं को चुनौती दे रहा है। हमें अपने आप से पूछना है, कि कलीसिया ने विश्व समुदाय के विकास, भाईचारा के निर्माण के लिए क्या किया है और क्या कर सकता है?
पिछली शताब्दी में चेतना ने ख्रीस्तीयों के बीच विभाजन के कारण दुःख और अन्याय का एहसास दिलाया था एवं विश्वासी समुदायों को पवित्र आत्मा द्वारा एकजुट होने के लिए प्रेरित किया था जिसके लिए प्रभु ने प्रार्थना की है एवं अपना जीवन अर्पित किया है।
"आज युद्ध की क्रूरता के सामने इस एकता की चाह को फिर से जागृत करना है। ख्रीस्तीयों के बीच विभाजन को दरकिनार करने का अर्थ है हृदय की कठोरता को सहन करना जो संघर्ष की भूमि को उपजाऊ बनाता है। शांति के सुसमाचार की घोषणा, वह सुसमाचार प्रचार है जो सेनाओं के सामने भी दिलों को निष्क्रिय कर देता, यह केवल तभी अधिक विश्वसनीय होगा जब ख्रीस्तीयों द्वारा घोषित शांति के राजकुमार येसु के साथ मेल-मिलाप हो; ख्रीस्तीय उनके सार्वभौमिक प्रेम और भाईचारे के संदेश से अनुप्राणित हों, जो उनके अपने समुदाय और राष्ट्र की सीमाओं से परे जाता है।
अंत में, पोप फ्राँसिस ने निकिया की पहली विश्वव्यापी परिषद (325 ई.) की, 1700वीं वर्षगांठ पर केंद्रित आगामी आमसभा की विषयवस्तु के बारे बात की, जो 2025 के जयंती वर्ष के साथ मेल खाएगा। उन्होंने याद किया कि लम्बी तैयारी एवं कई बाधाओं के बावजूद विश्वास की अभिव्यक्ति हेतु पहली ख्रीस्तीय एकता सभा कलीसिया के लिए एक मेल-मिलाप का अवसर था। पोप ने आशा व्यक्त की कि निकिया की सभा का निर्णय वर्तमान में ख्रीस्तीय एकता के रास्ते को आलोकित करेगा और नये कदमों को ख्रीस्तीय एकता की पूर्णता के लक्ष्य की ओर ले चलेगा।
अंत में, पोप ने परमधर्मपीठीय समिति एवं सिनॉड के धर्माध्यक्षों के सचिवालय के राष्ट्रीय धर्माध्यक्षीय सम्मेलन की, सिनॉडल प्रक्रिया के तहत, आज के विश्व में विश्वास एवं सेवा हेतु दूसरी कलीसियाओं के भाई-बहनों की आवाजों को सुनने के निमंत्रण देने की सराहना की।

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