पोप ˸ एक सच्चा शिक्षक साथ देता, सुनता एवं वार्ता करता है

बुधवार को आमदर्शन समारोह के पूर्व पोप फ्राँसिस ने "वैश्विक शोधकर्ता काथलिक शिक्षा परियोजना," के एक प्रतिनिधि मंडल से मुलाकात की। उन्होंने उनसे आग्रह किया कि वे गतिशील शिक्षा के महत्व पर जोर दें।
पोप ने कहा, "शिक्षा देने का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति के मन को विचारों से भर दिया जाए क्योंकि "स्वयं गतिशील वस्तु" खुद बनते हैं लेकिन लोगों के साथ चलना, जोखिम एवं सुरक्षा के बीच का तनाव है।"  
"वैश्विक शोधकर्ता काथलिक शिक्षा परियोजना," एक अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना है जिसका उद्देश्य है पहचान एवं वार्ता के संबंध में काथलिक शिक्षा के मूल्य को बढ़ावा देना।
पोप ने प्राथमिक, उच्च विद्यालय एवं कॉलेज के शिक्षकों को शिक्षण यात्रा में विद्यार्थियों का समर्थन करने की सलाह दी। उन्होंने कहा, "आप जिन्हें शिक्षा दे रहे हैं उनके साथ चले बिना उन्हें शिक्षित नहीं कर सकते। यह कितना खूबसूरत होता है जब शिक्षक लड़के और लड़कियों के साथ चलते हैं।" उन्होंने कहा कि शिक्षा देने का अर्थ पूरी तरह अलंकारपूर्ण चीजों को बतलाना नहीं है बल्कि इसका अर्थ है हकीकत से उनहें रूबरू कराना। लड़के–लड़कियों को गलतियाँ करने का अधिकार है किन्तु शिक्षकों को उनके साथ चलना है ताकि गलतियों में उन्हें सही रास्ता दिखा सकें जिससे कि वे खतरों में न पड़ें। एक सच्चा शिक्षक गलतियों से नहीं घबराता बल्कि वह साथ देता है, उनका हाथ पकड़कर चलाता है, उन्हें सुनता और उनसे बातें करता है। वह डरता नहीं बल्कि प्रतीक्षा करता है। मानव शिक्षा है: शिक्षित करने के लिए 'क्या यह आगे ला रहा है और विकास को बढ़ावा दे रहा है, बढ़ने में मदद कर रहा है'" उन बातों पर ध्यान देना।
प्रतिनिधि मंडल ने पोप को परियोजना के बारे बतलाया कि उनके शिक्षा देने का मतलब न केवल ज्ञान देना बल्कि आध्यात्मिक एवं प्रेरितिक आयाम, साथ ही साथ बुजूर्गों द्वारा युवाओं को हस्तांतरित किये जानेवाली बातों के लिए जगह देना।
पोप ने इस बात पर भी जोर दिया कि युवाओं एवं बुजूर्गों के बीच बातचीत महत्वपूर्ण है, क्योंकि बढ़ने के लिए वृक्ष को अपने मूल के साथ संपर्क बनाये रखना आवश्यक है। उन्होंने एक कवि की कविता की याद करते हुए कहा कि "'पेड़ में जो कुछ भी खिलता है, वह जमीन के नीचे से आता है।' बिना जल के हम आगे नहीं चल सकते। केवल मूल के साथ हम व्यक्ति बन सकते हैं।" अतः उन्होंने ठंढ़े और कठोर परम्परा को नहीं कहा तथा सच्ची परम्परा पर जोर दिया जो अतीत से आगे बढ़ती है। परम्परा स्थिर नहीं होती, यह गतिशील है, आगे बढ़ने की प्रवृत होती है।  

 

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