देवदूत प्रार्थना में पोप : 'विश्वास की ज्वाला प्रज्वलित करें'

रविवार को देवदूत प्रार्थना के पूर्व पोप फ्राँसिस ने कहा कि सुसमाचार बदलाव लाता तथा हमें मन-परिवर्तन हेतु निमंत्रण देता है, यह एक आग की तरह हमें ईश्वर के प्रेम की ऊष्मा प्रदान करता, हमारे स्वार्थ को जला डालता एवं उनके प्रेम को दूसरों के लिए बांटने हेतु प्रेरित करता है।
वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 14 को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया जिसके पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।
पोप ने धर्मविधि के सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हुए कहा कि येसु का कथन हमें हमेशा प्रभावित करता एवं सवाल करता है। "जब वे अपने शिष्यों के साथ रास्ते पर थे तो उन्होंने कहा, "मैं पृथ्वी पर आग लेकर आया हूँ और मैं कितना चाहता हूँ कि यह धधक उठे।" (लूक.12,49) संत पापा ने कहा कि वे किस आग की बात कर रहे हैं? और इन शब्दों का आज हमारे लिए क्या अर्थ है?"
जैसा कि हम जानते हैं येसु इस दुनिया में सुसमाचार लेकर आये, जो हम प्रत्येक के लिए ईश्वर के प्रेम का सुसमाचार है। इसलिए वे बतला रहे हैं कि सुसमाचार एक आग की तरह है, क्योंकि यह एक संदेश है जो इतिहास में फैलता है तो जीवन के पुराने संतुलन को जला डालती है, हमें व्यक्तिवाद से बाहर निकलने, स्वार्थ से ऊपर उठने, पाप और मृत्यु की दासता से पार होकर पुनर्जीवित ख्रीस्त में नया जीवन पाने की चुनौती देती है। यही सुसमाचार है जो चीजों को वैसे ही नहीं छोड़ती बल्कि उनमें परिवर्तन लाती एवं बदलाव का निमंत्रण देती है। यह झूठी आंतरिक शांति नहीं देती बल्कि एक बेचैनी उत्पन्न करती है जो हमें रास्ते पर ले चलता है, हमें अपने आपको ईश्वर और अपने भाई-बहनों के लिए खोलने हेतु प्रेरित करता है। यह ठीक आग के समान है जब यह ईश्वर के प्रेम से हमें ऊष्मा प्रदान करता, यह हमारे स्वार्थ को जला देता, हमारे जीवन के अंधकार को प्रकाशित करता और हमें गुलाम बनानावाली झूठी मूर्ति को जला डालता है।
पोप ने पवित्र बाईबिल में निहित नबियों का उदाहरण देते हुए कहा, "हम उदाहरण के लिए एलियाह और येरेमियाह की याद करें। येसु ईश्वर के प्रेम रूपी अग्नि से प्रज्वलित थे और उसी आग को दुनिया में सुलगाया। वे खुद इसमें जले, अंत तक, हाँ क्रूस की मृत्यु तक प्रेम किया। (फिली.2,8) वे पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे। जिसकी तुलना आग से की जाती है। उनके प्रकाश एवं शक्ति से उन्होंने ईश्वर के करुणावान चेहरे को प्रकट किया एवं उन लोगों को आशा प्रदान की जो खोये हुए थे, टूट चुके थे, हाशिये पर जीवन व्यतीत कर रहे थे। शरीर एवं आत्मा के घावों को चंगा किया तथा केवल बाह्य रीति रिवाजों तक सीमित धार्मिकता को नवीनीकृत किया।
तो फिर हमारे लिए येसु के शब्दों का क्या अर्थ है? वे हमें निमंत्रण देते हैं कि हम विश्वास की लौ को पुनः प्रज्वलित करें। ताकि यह हमारे लिए कम महत्वपूर्ण न हो, अथवा व्यक्तिगत लाभ की चीज न बने, जो हमें जीवन की चुनौतियों और कलीसिया एवं समाज में अपनी प्रतिबद्धता से भागने के लिए प्रेरित करता है। जैसा कि फादर दी लुबेक कहते हैं – ईश्वर में विश्वास हमें आश्वासन देता है – लेकिन हमारे स्तर पर या एक लकवाग्रस्त भ्रम, या आत्मसंतुष्ट पैदा करने के लिए नहीं है, लेकिन हमें कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए है।" संक्षेप में, विश्वास कोई लोरी नहीं है जो हमें सोने में मदद दे, एक जीवित आज है जो हमें रात में भी जागरूक और सक्रिय रखता है।
पोप ने चिंतन करने हेतु प्रेरित करते हुए कहा, "क्या मैं सुसमाचार के लिए उत्साही हूँ? क्या मैं इसे अक्सर पढ़ता हूँ? क्या मैं इसे अपने पास रखता हूँ? क्या विश्वास जिसकी मैं घोषणा करता और मनाता, क्या मुझमें आत्मसंतुष्ट शांति उत्पन्न करता या यह साक्षी की ज्वाला प्रज्वलित करता है? हम अपने आप से इन सवालों को भी पूछ सकते हैं - कलीसिया : हमारे समुदाय में, क्या प्रार्थना एवं परोपकार और विश्वास के आनन्द के साथ पवित्र आत्मा की अग्नि जलती है? अथवा क्या हम शिथिलता और आदतन, मुरझाये हुए चेहरे तथा ओठों में शिकायत के साथ इनमें शामिल होते हैं?"
पोप ने विश्वासियों से कहा, "भाइयो एवं बहनो, आइये हम इसपर अपने आपकी जाँच करें, ताकि हम भी कह सकेंगे : येसु के समान हम भी ईश्वर के प्रेम की अग्नि से प्रज्वलित हैं और इसे दुनिया में फैलाना चाहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाना चाहते हैं ताकि हरेक व्यक्ति ईश्वर के कोमल प्रेम को महसूस कर सके एवं येसु के आनन्द का अनुभव कर सके जो हृदय को बड़ा करता एवं जीवन को खूबसूरत बनाता।"
उन्होंने इसके लिए माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, "आइये, हम इसके लिए कुँवारी मरियम से प्रार्थना करें, जिन्होंने पवित्र आत्मा की अग्नि का स्वागत किया, हमारे लिए प्रार्थना करे।"

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