दिव्यांग लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस पर पोप का संदेश। 

संत पिता फ्राँसिस ने दिव्यांग लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस हेतु अपने संदेश को प्रकाशित किया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित दिव्यांग लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस 3 दिसम्बर को मनाया जाता है। दिव्यांग लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस की विषयवस्तु है, "तुम मेरे मित्र हो।" (यो. 15:14)
संत पिता फ्राँसिस ने संदेश में उन्हें संबोधित कर कहा, "मैं आप सभी को बतलाना चाहता हूँ कि कलीसिया आपको प्यार करती है तथा सुसमाचार की सेवा में अपने मिशन को पूरा करने के लिए, उसे आप प्रत्येक जन की जरूरत है।" उन्होंने कहा कि कलीसिया अपूर्ण और पापी लोगों का समुदाय है जिन्हें ईश्वर की क्षमाशीलता की आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में दिव्यांग लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस की घोषणा की है ताकि समाज के हर आयाम में दिव्यांग लोगों के अधिकार एवं कल्याण को बढ़ावा दिया जा सके।
संत पिता फ्राँसिस के संदेश की विषयवस्तु है, "तुम मेरे मित्र हो।" उन्होंने कहा है कि "हम येसु के मित्र होने के लिए बुलाये गये हैं।" यह एक आध्यात्मिक कुंजी के समान है ताकि हम स्वीकार कर सकें कि हम सब में कमजोरियाँ हैं और इसके द्वारा दूसरों के साथ शांति से रह सकें। यह हमारे हृदय और जीवन को आनन्द प्रदान करेगा।  
संत पिता फ्राँसिस ने दिव्यांग लोगों को आश्वासन देते हुए कहा, "कलीसिया सचमुच आपका घर है, हम सभी एक साथ हैं, कलीसिया हैं क्योंकि ख्रीस्त ने हमारा मित्र होना स्वीकार किया है...हरेक को अपनी भूमिका अदा करना है, कोई भी बेकार नहीं है। अतः आप प्रत्येक जन भी सिनॉडल यात्रा में सहयोग देने के लिए बुलाये गये हैं...।"  
संत पिता फ्राँसिस ने कहा कि दुर्भाग्य से आज भी बहुत सारे लोग हैं जो दिव्यांग हैं जिन्हें समाज में परदेशी की तरह वर्ताव किया जाता है। उन्होंने कहा, "आप महसूस कर सकते हैं कि आप न तो शामिल हैं और न भाग ले सकते हैं। उससे भी बढ़कर आपको मताधिकार से वंचित होना पड़ता है।" भेदभाव अब भी समाज के विभिन्न स्तरों में जारी है यह पूर्वाग्रह, अवहेलना और हरेक व्यक्ति के मूल्य की सराहना नहीं कर पानेवाले समाज से पोषित होती है।"    
संत पिता फ्राँसिस ने खेद प्रकट किया कि "विकलांगता को एक प्रकार की बीमारी के रूप में मानने की निरंतर प्रवृत्ति, जीवन को अलग रखने और उन्हें कलंकित करने में योगदान देती है।"
संत पिता फ्राँसिस ने कहा कि कलीसिया में भेदभाव आध्यात्मिक देखभाल में कमी के रूप में की जाती है। यह कई बार दिव्यांग लोगों को संस्कारों को प्राप्त करने से वंचित कर देता है।
संत पिता फ्राँसिस आगे कहते हैं कि येसु की मित्रता संकट के क्षणों में हमारी रक्षा करती है, जैसा कि कोविड-19 महामारी के दौरान, जिसका कई विकलांग व्यक्तियों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। उनमें से कई को लंबे समय तक घर पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा; कई विकलांग छात्रों को दूरस्थ शिक्षा के लिए सहायता प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा; सामाजिक देखभाल सेवाओं की लंबी रुकावट; और अन्य कठिनाइयाँ झेलनी पड़ी।
जो लोग आवासीय सुविधाओं तक ही सीमित थे, वे विशेष रूप से वायरस की चपेट में आ गए थे, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी। संत पापा ने कहा कि "आपको मालूम हो कि प्यार और स्नेह के साथ पोप और कलीसिया विशेष रूप से आपके करीब हैं!"
संत पिता फ्राँसिस ने विकलांग व्यक्तियों को आश्वासन दिया कि "कलीसिया उन लोगों के साथ खड़ी है जो अभी भी कोरोनावायरस से जूझ रहे हैं।"
उन्होंने जोर दिया कि प्रत्येक व्यक्ति को इलाज की सुविधा मिलनी चाहिए तथा दिव्यांग लोगों को भी उत्तम देखभाल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
संत पिता फ्राँसिस ने येसु के साथ मित्रता का जिक्र करते हुए कहा कि वे हमें खुश देखना चाहते हैं। "वे चाहते हैं कि हम संत बनें और एक नीरस एवं सामान्य अस्तित्व के लिए समझौता न करें।" पवित्रता के लिए सार्वभौमिक आह्वान के बारे में बोलते हुए, द्वितीय वाटिकन परिषद सिखाती है कि "मसीह के सभी विश्वासी चाहे किसी भी पद या स्थिति के क्यों न हों, ख्रीस्तीय जीवन की पूर्णता और उदारता की पूर्णता के लिए बुलाए जाते हैं।" "उन्हें खुद को ईश्वर की महिमा और अपने पड़ोसी की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए"।
प्रत्येक विकलांग व्यक्ति को संबोधित करते हुए, संत पापा फ्राँसिस ने उनसे प्रार्थना करने का आग्रह किया, उन्हें आश्वासन दिया कि प्रभु उन लोगों की प्रार्थनाओं को ध्यान से सुनते हैं जो उस पर भरोसा करते हैं। "प्रार्थना एक मिशन है, एक ऐसा मिशन जो हर किसी के लिए सुलभ है, और मैं उस मिशन को एक विशेष तरीके से आपको सौंपना चाहता हूँ। कोई इतना कमजोर नहीं है कि वह प्रार्थना नहीं कर सकता, ईश्वर की पूजा नहीं कर सकता, उनके पवित्र नाम की महिमा नहीं कर सकता, और दुनिया की मुक्ति से लिए मध्यस्थ प्रार्थना नहीं कर सकता है।"
अंत में, संत पिता फ्राँसिस ने सभी को याद दिलाया कि महामारी ने हमें स्पष्ट रूप से दिखाया है कि हम सभी कमजोर और दुर्बल हैं; हम सभी एक ही नाव में हैं, नाजुक और अस्त-व्यस्त, लेकिन महत्वपूर्ण और आवश्यक भी हैं; हम सभी को एक साथ पंक्तिबद्ध होने के लिए बुलाया गया है और "ऐसा करने का प्राथमिक तरीका है प्रार्थना करना"।

Add new comment

10 + 6 =