करुणा के मिशनरियों से पोप ˸ ईश्वर के करूणामय चेहरे को दिखायें

पोप फ्राँसिस ने विश्वभर के करुणा के मिशनरियों का स्वागत किया तथा उन्हें उन लोगों का सहर्ष स्वागत करने का प्रोत्साहन दिया जो ईश्वर की दया की खोज कर रहे हैं। भारत से करुणा के मिशनरी फादर विजय कंडुलना ने बतलाया कि संत पापा ने उन्हें स्टॉल भेंट कर करुणा के मिशन के लिए प्रोत्साहित किया।
पोप  ने करूणा के मिशनरियों को दुखियों एवं एकाकी में जी रहे लोगों को सांत्वना देने की सलाह दी तथा उनके मिशन के लिए पवित्र बाईबिल से रूथ का उदाहरण दिया।  
सोमवार को वाटिकन के संत पौल षष्ठम सभागार में विश्वभर के करूणा के मिशनियों का स्वागत करते हुए संत पापा ने बतलाया कि वे किस तरह उन्हें रोम वापस लाना चाहते थे ताकि ईश्वर की करुणा के माध्यम के रूप में इस मिशन को नवीकृत किया जा सके।
पोप के लिए करुणा के मिशनरियों का कार्य उनके हृदय के सबसे करीब है। उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि रोमन कूरिया में नये प्रेरितिक संविधान "प्रेदिकाते एवंजेलियुम" के लिए भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। 
पोप ने कहा कि वे अब कलीसिया की संरचना के हिस्से हैं और उनके बढ़ने की उम्मीद है यदि धर्माध्यक्ष पुरोहितों को नियुक्त करेंगे जो "पवित्र, करुणामय और क्षमा करने के लिए तत्पर हैं ताकि वे करुणा के पूर्ण मिशनरी बन सकें।"
पोप फ्राँसिस ने छः वर्षों पहले 2016 में करूणा की जयन्ती के दौरान रोम में उनसे मुलाकात की थी तथा करुणा के मिशनरियों की भूमिका की शुरूआत की थी और आदेश दिया था कि वे ईश्वर के सामीप्य, उनके प्रेम, करूणा और क्षमा का साक्ष्य दुनिया को दें।   
करुणा के मिशनरियों को एक विशेष प्रेरिताई सौंपी गई है कि वे पापस्वीकार सुनें और सुसमाचार प्रचार हेतु नये रास्तों की खोज करें तथा सभी लोगों के लिए ईश्वर की दया प्रकट करें। उन्हें ऐसे गंभीर पापों को क्षमा करने के लिए भी विशेष शक्ति प्रदान की गई है जिनके लिए स्थानीय धर्माध्यक्षों या परमधर्मपीठ से सलाह और अनुमति मांगने की जरूरत होती है।
करुणा के मिशनरियों के साथ पहले की मुलाकात की याद करते हुए पोप ने उन्हें प्रोत्साहन दिया कि वे ईश्वर के करूणा को लायें और उनकी सांत्वना के चिन्ह बनें ताकि लोग यह महसूस कर सकें कि ईश्वर हमें कभी नहीं भूलते और नहीं त्यागते हैं।
इस अवसर पर पोप ने बाईबिल के रूथ पर प्रकाश डाला जो उन्हें प्रेरिताई हेतु प्रेरित कर सकती है। पुराने व्यवस्थान में रूथ का ग्रंथ हमें इस्राएली लोगों के प्रति मोवाबाईट महिला के समर्पण की कहानी बतलाता है जिसने अपनी सास नोएमी को वचन दिया था। वे दोनों विधवा थीं और अत्यन्त गरीबी में जी रही थीं।
पोप ने कहा कि अपने जीवन के अत्यन्त कठिन समय में रूप एक गरीब विधवा एवं परदेशी के रूप में थी लेकिन इन सब के बावजूद उसने अपनी सास नोएमी एवं अन्यों के साथ बड़े प्रेम, विनम्रता, उदारता एवं करुणा का वर्ताव किया। वह बेतलेहेम के बोवाज के साथ शादी के द्वारा दौऊद की परदादी बनी।
पोप ने गौर किया कि रूथ के ग्रंथ में ईश्वर ने कभी सीधे नहीं बोला बल्कि रूथ के माध्यम से नोएमी के प्रति दया प्रकट की।  
जब जीवन के रास्ते कठिन और दुखद हो जाते हैं, तब ईश्वर अपने प्रेम को प्रकट करने के लिए रास्ता तैयार करते हैं। संत पापा ने कहा कि हम भी लोगों के जीवन में ईश्वर की उपस्थिति को प्रकट करने के लिए बुलाये गये हैं।
उन्होंने करुणा के मिशनरियों से कहा कि यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी प्रेरिताई द्वारा ईश्वर की आवाज बनें और उनकी करुणा के चेहरे को प्रकट करें। ईश्वर लोगों के दैनिक जीवन में अक्सर चुपचाप, विवेकपूर्ण और सरल तरीकों से कार्य करते है जो उनके द्वारा प्रकट होते हैं जो ईश्वर की उपस्थिति का एक संस्कार बन जाता है।
पोप ने करुणा के मिशनरियों से अपील की कि वे उन लोगों का न्याय न करें जो उनके पास आते हैं तथा व्यक्ति को आधा नहीं बल्कि पूरा समझने का प्रयास करें।  
उन्होंने कहा कि हम सभी पापी हैं और क्षमा मांगने के लिए सभी घुटनी टेकते हैं। अतः केवल नियम तक सीमित न रहें बल्कि क्षमा मांगने वाले व्यक्ति को देखें और करुणा के मिशनरी के रूप में उन्हें क्षमा देने के लिए उदार बनें।
अपने संबोधन के अंत में पोप ने करुणा के मिशनरियों को सलाह दी कि वे ईश्वर की करुणा प्रकट करने के लिए सदा तैयार करें।
उन्होंने उनसे कहा कि वे रूथ के समान उदार बनें, उदास एवं एकाकी लोगों को सांत्वना दें, इस तरह प्रभु उन्हें अपने विश्वासी सेवक स्वीकार करेंगे।
पोप ने मिशनरियों से कहा कि वे क्षमा देने से कभी न थकें "क्योंकि ईश्वर क्षमा करने से कभी नहीं थकते।"

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