कनाडा में पोप फ्राँसिस ˸ आँसू का वरदान

पोप फ्राँसिस की प्रायश्चित तीर्थयात्रा में आदिवासी लोगों की कई तस्वीरें सामने आयीं और एक खिड़की प्रदान की, जिसने चंगाई एवं मेल-मिलाप के रास्ते पर ध्यान केंद्रित किया, जहाँ लोगों ने बहुत अधिक दुःख सहा है और आज कलीसिया के एक नये चेहरे को देख रहे हैं।
आज के समाज में, कुछ तस्वीरें एक क्षण में दुनिया घूम जाती हैं जो शोषण मीडिया का कमाल है। हजारों, लाखों, और हो सकता है अरबों लोग अक्सर अनजाने में उसी तस्वीर को देखते हैं। 
ऐसी रेखाएँ, रंग और आकार भी हैं जो साझा करने के चक्कर में गायब हो जाते हैं, अन्य चीजें हमेशा के लिए स्मृति में अंकित हो जाते, और कुछ को विशेष रूप से हृदय में रखा जाता है।
पोप फ्राँसिस की कनाडा यात्रा (24-30 जुलाई) में कई तस्वीरें हैं जो घटना से बढ़कर बोलती हैं˸ वे स्थान खोलती, मौन, दर्द और पीड़ा को दिखलातीं, किन्तु सामीप्य, स्वीकृति, प्रोत्साहन एवं उम्मीद को भी दर्शाती हैं।
पोप जिन्होंने स्वयं कहा था कि वे प्रायश्चित की तीर्थयात्रा जा रहे हैं, उस भूमि में जिसने आदिवासी लोगों की शहादत देखी है जिनके बच्चे मिलाने और मुक्त करने की प्रणाली द्वारा उनसे छीन लिये गये। ख्रीस्त एवं कलीसिया का प्रकाश लेकर गये संत पापा जो सच्चाई और क्षमा मांगने से नहीं डरते, जो आलिंगन करते, सुनते एवं प्यार करते है। कलीसिया जो हर जरूरतमंद व्यक्ति के करीब है, बिना हिचकिचाहट, बिना संदेह, बिना बाधा के मदद करते हैं।
छह दिनों में पोप ने पूरे कनाडा की यात्रा की, जिसमें वे केंद्र से लेकर उपनगरों के साथ-साथ भौगोलिक क्षेत्रों को छूनेवाले आर्कटिक परिधि के किनारे तक पहुंचे जहाँ ग्रह का सबसे बड़ा इनुइट समुदाय उपस्थित है। इकालुइट में संत पापा ने चार प्राथमिक आवासीय स्कूलों में से एक में पूर्व छात्रों से मुलाकात की – जो आदिवासी बच्चों को शिक्षित करने के लिए बनाई गई भयानक संस्थाएँ हैं जिन्होंने परिवारों से बच्चों को अलग किया और उन्हें अत्याचारों और हिंसा का सामना करना पड़ा।  
पोप ने इस संरचना के एक कमरे में प्रवेश किया, जो एक बड़े सफेद बॉक्स जैसा दिखता है। वे मौन होकर वहाँ घुसे, जहाँ दर्जनों लोग उनका इंतजार कर रहे थे जो कई कमरों में गोलाई में बैठे हुए थे। उनमें से अधिकांश बूढ़े थे, साधारण परिधान धारण किये हुए थे, और कुछ लोग परम्परिक परिधानों में थे। वर्षों से बढ़े हाथ उनके चेहरे पर गए। पोप पर नजग गड़ाये उनके गतिहीन, भावशून्य चेहरों पर धीरे से आँसू बह गये। उस तस्वीर में – यात्रा के समय कई बार दुहराये गये – एक एकल जीवन से कई गुणा अधिक था। कुछ लोगों ने अपने आँसूओं को रोका। पुरूषों और स्त्रियों जिन्होंने काथलिक स्कूलों के कारण अत्याचारों का सामना किया, इस मुलाकात में पहचान, स्पर्श, आलिंगन और स्नेह का अनुभव किया। आँसू ने दरार, पीड़ा और आशा व्यक्त किया जिसके सामने व्यक्ति केवल मौन रह सकता है, बाहें खोल सकता है एवं स्वागत कर सकता है।      
प्रेरितिक यात्रा के दौरान पोप ने मेल-मिलाप एवं चंगाई के रास्ते की ओर इंगित किया, जिसको उन्होंने कुछ महीनों पहले वाटिकन में फर्स्ट नेशन, इनुइट और मेतिस आदिवासी लोगों का स्वागत करते हुए किया था। उन्होंने एक प्रक्रिया शुरू की थी, एक क्षितिज, जहाँ तक पहुँचा जाना था, उनका निर्माण किया जाना एवं पोषित करना था।
प्रमुख विलटन लिटलचाईल्ड ने कहा, "पोप की उपस्थिति एक आशीर्वाद एवं उपहार था, काम अब शुरू होता है।" लिटिलचाइल्ड आवासीय विद्यालयों से बचे आदिवासियों के प्रमुख हैं, जो अब 78 वर्ष के हैं, जिन्होंने मास्कवासिस के भालू पार्क पॉव-वाउ ग्राउंड्स की सभा में पोप को एक आदिवासी टोपी भेंट किया।
यह एक असाधारण तस्वीर थी जिसमें पोप बाज के पंखों की टोपी के साथ देखाई दिये किन्तु हृदयविदारक तस्वीर उससे पहले आयी – जब साझा करने के इस भाव को सम्भव बनाया गया। इसे समझने के लिए पूरे दृश्य को पुनः देखना होगा। यह उपहार पहचान की ओर अग्रसर करता है, जिसमें प्रमुख लिटिलचाइल्ड को काफी शारीरिक मेहनत करनी पड़ी, जो बैसाखी या व्हीलचेयर की मदद से चलते हैं, वे कुछ मीटर खुद चले, सीढियाँ चढ़ीं ताकि वहाँ पहुँच सकें जहाँ संत पापा मंच पर थे – क्योंकि आदिवासियों ने अपना हृदय पुनः खोला और सुसमाचार को सुना और जीवित कलीसिया की वास्तविकता को देखा जो उन्हें अपमानित करने और कूचलनेवाली कलीसिया से भिन्न थी।   
पोप को एक लंबा लाल बैनर दिखाया गया, जिस पर आवासीय विद्यालयों के पीड़ितों के नाम लिखे थे, उस समय ढफली की आवाज शरीर में प्रवेश करते हुए प्रत्येक के दिल की धड़कन बन गई। रोने, भावुक होने एवं सी पिहको के गुस्से के दृश्य को भी भूलाया नहीं जा सकता, पोप के सामने खड़े होकर जब सबकी नजर उसपर टिकी थी, अनिर्धारित तरीके से, एक गाना गाया गया, जिसकी राग में कनाडा के गीत की याद की जा सकती है।
तब पोप व्हीलचेर में बैठकर आदिवासियों के प्रिय स्थल लेक स्टे ऐन के पास मौन रहे, जहाँ हर साल हजारों तीर्थयात्री आते हैं। और वहीँ, पोप फ्राँसिस ने कहा कि दादा-दादी के हाथों ने एक-दूसरे का समर्थन करने के लिए छोटे बच्चों के हाथों को पकड़ लिया है।
इस तरह पीड़ा, गर्व, उत्साह, पहचान, नृत्य, मौन, प्रार्थना और आँसूओं की तस्वीरे प्रायश्चित की तीर्थयात्रा में साथ रहीं, जिससे संस्थाओं एवं व्यक्तियों के लिए एक नया दृष्टिकोण, एक नया कार्य और उद्देश्य शुरू हुआ। बल्कि यह पूरी मानवता के लिए, हम सभी के लिए, बांटने एवं भाईचार के रास्ते पर आगे बढ़ने, सुनने और हमारी नजरों को मानवता एवं सृष्टि की ओर डालने हेतु एक अवसर है यह महसूस करने का कि हम सभी एक ईश्वर की संतान हैं।

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