आप्रवासी दिवस पर पोप ˸ आप्रवासियों के साथ बेहतर भविष्य का निर्माण

पोप फ्राँसिस ने 108वें विश्व आप्रवासी एवं शरणार्थी दिवस हेतु अपना संदेश प्रकाशित किया, जिसको 25 सितम्बर को मनाया जाता है। उन्होंने संदेश में कहा है कि मानवता को हमारे भविष्य का निर्माण उन लोगों की मदद से करना चाहिए जिन्होंने बेहतर जीवन की तलाश में अपना घर छोड़ दिया है।
"आप्रवासियों एवं शरणार्थियों के साथ भविष्य का निर्माण करने का अर्थ है, यह पहचानना और मूल्यांकन करना कि वे निर्माण की प्रक्रिया में कितना योगदान दे सकते हैं।"
पोप फ्रांसिस ने बृहस्पतिवार को 108वें विश्व अप्रावासी एवं शरणार्थी दिवस के लिए अपना संदेश प्रकाशित किया जिसको कलीसिया में हर साल 25 सितम्बर को मनाया जाता है।  
पोप ने संदेश में हमारे वास्तविक स्वर्गीय घर की खोज में मानवीय यात्रा के अर्थ पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "ईश्वर का राज उन लोगों में है जिन्होंने येसु ख्रीस्त की मुक्ति को स्वीकार किया है।"
जब हम ईश्वर के राज की पूर्णता की ओर यात्रा कर रहे हैं, तब प्रत्येक व्यक्ति को एक व्यक्तिगत परिवर्तन करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि हमारी दुनिया को बदला जा सके और इसे "ईश्वरीय योजना के अनुरूप पूरी तरह से बदलने" में मदद मिल सके।
पोप फ्राँसिस ने मानव इतिहास में हो रहे त्रासदियों के लिए खेद प्रकट किया जो याद दिलाता है कि हमें अभी भी "मानवता के साथ ईश्वर के निवास स्थान" के मार्ग पर चलना है।"
"इन दिनों की परेशानियों के आलोक में हम एक ऐसे भविष्य के निर्माण के लिए हमारी प्रतिबद्धता को नवीकृत करने हेतु बुलाये गये हैं जो पूरी तरह से ईश्वर की एक ऐसी दुनिया की योजना के अनुरूप है जिसमें हर कोई शांति और गरिमा के साथ रह सके।"
पोप ने कहा कि इसके साथ हम स्वर्ग राज की धार्मिकता की खोज की यात्रा के साथ आगे बढ़ सकते हैं और ख्रीस्त की मुक्ति में सुसमाचार के प्यार को स्वीकार कर सकते हैं।
पोप ने कहा कि समाज से हर प्रकार की असमानता एवं भेदभाव को ठोस रूप से दूर किया जाना चाहिए और किसी को बहिष्कृत नहीं किया जाना चाहिए।  
"ईश्वर की योजना निश्चित रूप से समावेशी है और अस्तित्व की परिधि पर रहनेवालों को प्राथमिकता देती है। उनमें से कई आप्रवासी और शरणार्थी तथा विस्थापन और मानव तस्करी के शिकार हैं।"
उन्होंने कहा कि ख्रीस्तीयों को अपने घरों से विस्थापित लोगों के साथ ईश्वर के राज का निर्माण करना चाहिए। "सबसे कमजोर लोगों को शामिल करना ईश्वर के राज्य में पूर्ण नागरिकता की आवश्यक शर्त है।"
पोप ने आगे कहा कि आप्रवासियों और शरणार्थियों के साथ भविष्य के निर्माण में उनके निवास के नए देशों में उनके मूल्य और क्षमता को पहचाना जाना जरूरी है।
जैसा कि नबी इसायस ने भविष्यवाणी की थी कि विदेशियों को "आक्रमणकारियों या विध्वंसक" के रूप में नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि बेहतर समाज के लिए "इच्छुक मजदूर" के रूप में माना जाना चाहिए।
पोप फ्राँसिस ने इतिहास का उदाहरण यह दिखाने के लिए प्रस्तुत किया कि आप्रवासी और शरणार्थी अपने स्वागत करनेवाले राष्ट्रों को सामाजिक और आर्थिक विकास का एक मूल्यवान स्रोत प्रदान करते हैं।
"उनका काम, उनकी जवानी, उनका उत्साह और बलिदान करने की उनकी इच्छा उन समुदायों को समृद्ध कर सकती है जो उनका स्वागत करते हैं। बल्कि यह योगदान अधिक से अधिक हो सकता है यदि इसे सावधानीपूर्वक विकसित कार्यक्रमों और पहलों द्वारा अनुकूलित और समर्थित किया जाए। यदि अवसर दिया जाए तो उनमें अपार संभावनाएँ हैं जिनका उपयोग किया जा सकता है।"
एक बड़ी चुनौती पेश करते हुए, संत पापा ने कहा कि आप्रवासी, समाज को और दुनिया को बेहतर ढंग से समझने और आध्यात्मिक विकास में योगदान देने में भी मदद कर सकते हैं।
काथलिक आप्रवासी समुदाय के कलीसियाई जीवन को समृद्ध कर सकते हैं जहाँ उनका स्वागत किया जाता है।  

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