रोम के पुरोहितों से पोप : येसु द्वारा प्रदत्त जीवन को बढ़ावा दें

रोम के पुरोहितों को सम्बोधित करते संत पापा प्राँसिस
रोम के पुरोहितों को सम्बोधित करते संत पापा प्राँसिस

रोम धर्मप्रांत के पुरोहितों को लिखे पत्र में संत पापा फ्राँसिस ने कोरोना वायरस महामारी के कारण आनेवाली परिस्थिति का सामना करने का प्रोत्साहन देते हुए उन्हें इस नये चरण में ईश्वर से प्रज्ञा, दुरदर्शिता और समर्पण की कृपा की याचना करने हेतु प्रेरित किया है ताकि सभी प्रकार के प्रयास एवं त्याग-तपस्या व्यर्थ न हों।
संत पापा ने पत्र में लिखा है कि वे पुरोहितों के करीब रहना चाहते हैं। वे क्रिज्मा मिस्सा के दौरान उनसे मिलना चाहते थे किन्तु कोरोना वायरस महामारी के कारण यह संभव नहीं हो पाया।
संत पापा ने पुरोहितों के सहयोग के लिए धन्यवाद दिया जिन्होंने महामारी के समय ईमेल अथवा टेलेफोन के द्वारा अप्रत्याशित अनुभवों को साझा किया जिसके कारण वे बाहर गये बिना ही परिस्थिति से अवगत हो गये। संत पापा ने कहा कि "इस आदान- प्रदान ने मेरी प्रार्थना को पोषित किया।" उन्होंने इस बात के लिए खुशी व्यक्त की कि सामाजिक दूरी बनाये रखने की आवश्यकता ने भी अपनेपन, एकता एवं मिशन की भावना को मजबूत बनाये रखने से नहीं रोका, बल्कि यह सुनिश्चित करने में मदद दिया कि परोपकार के कार्यों को क्वारेनटाइन में नहीं रखा गया है, खासकर, वंचित लोगों के लिए। दूरी बनाने का अर्थ अपने आप में बंद होना नहीं था जो अचेत, निंद्रा की स्थिति लाता और मिशन को बंद कर देता है। उन्होंने सभी पुरोहितों को प्रभु के प्रेम एवं सेवा के लिए कार्य करते रहने का प्रोत्साहन देते हुए उन्हें अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

संत पापा ने कहा, "मैं आपको लिख रहा हूँ क्योंकि मैं आपके करीब रहकर आपका साथ देना चाहता हूँ, आपकी यात्रा में साथ चलना और बल प्रदान करना चाहता हूँ। आशा हम पर निर्भर करती है और मांग करती है कि हम अपने आपको सजीव और सक्रिय बनाये रखें। यह आशा दूसरों के साथ मुलाकात करने के द्वारा प्राप्त होती है जिसको हमें उपहार एवं कर्तव्य के रूप में दिया गया है कि हम नया सामान्य जीवन स्थापित करें।"

संत पापा ने कहा कि मैं आपको पहले प्रेरितिक समुदाय के रूप में देख रहा हूँ, जिनको भी कारावास, एकाकी, भय और अनिश्चितता के क्षणों का अनुभव हुआ था। गतिहीनता, बंद और इस घोषणा के साथ 50 दिन बीत गये थे कि यह उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। जहाँ वे भयभीत बंद द्वार के अंदर थे शिष्य येसु से विस्मित हो गये थे जो उनके बीच आकर खड़े हो गये थे और कहा था, "तुम्हें शांति मिले"। यह कहते हुए उन्होंने अपने हाथ एवं बगल दिखायी थी। शिष्य उन्हें देखकर आनन्द से भर गये थे। फिर येसु ने कहा था जिस तरह पिता ने मुझे भेजा था उसी तरह मैं तुम्हें भेजता हूँ। इतना कहने के बाद उन्होंने फूँककर कहा था पवित्र आत्मा को ग्रहण करो। संत पापा ने कहा कि हम भी अपने आपको विस्मित होने दें।

उस समय की तरह आज हम भी वर्तमान समय के लोगों के आनन्द और आशा, दुःख और चिंता को महसूस करते हैं, खासकर, गरीब एवं पीड़ित लोग। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो इन सारी चीजों से अछूता हो। हमने अपने हाथों से हमारे लोगों के दुःखों का स्पर्श किया है। पुरोहित के रूप में हम सच्चाइयों से अनभिज्ञ नहीं है और न ही हम इसे खिड़की से देखने का प्रयास कर रहे हैं। भीषण तूफान के बीच आपने अपने समुदायों के साथ रहने और उनका साथ देने का प्रयास किया है।

कोरोना वायरस किसी व्यक्ति, परिवार, समाज, दल अथवा देश को अलग नहीं करता। सभी कोई इससे प्रभावित हैं। कई प्रकार के सवालों ने हमारी चिंताओं को चुनौती दी है और हमारा ध्यान खींचा है। इन सवालों का उत्तर बंद को खोलने और पहले की स्थिति में वापस जाने मात्र से नहीं दिया जा सकता बल्कि हम नये जीवन को प्रोत्साहन देने के लिए बुलाये गये हैं जिसको पुनर्जीवित प्रभु हमें देना चाहते हैं। प्रलोभन पर हम आशा को प्रोत्साहन दें जो "हमारी रचनात्मकता, हमारी सरलता और प्रतिक्रिया करने की क्षमता को उत्तेजित करेगा"।  

एक नया दिन
संत पापा ने कहा, "येसु आदर्श स्थिति में अपने शिष्यों के जीवन में आने का चुनाव नहीं किये। वे शिष्यों के बीच उस समय प्रकट हुए जब वे कमरे में बंद थे उन्होंने हर प्रकार के तर्क को बदला और इतिहास एवं घटना को नया अर्थ प्रदान किया।"

संत पापा ने लिखा है कि येसु की उपस्थिति ने नये दिन की घोषणा की। उन्होंने पुरोहितों को प्रोत्साहन दिया कि वे जटिल परिस्थिति से न घबरायें, जब हम महामारी का सामना करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि ख्रीस्तीय आनन्द उस निश्चितता से आता है कि येसु हमारे बीच हैं। जो लोग येसु के समान जीवन को उसकी सच्ची परिस्थिति में स्वागत एवं आलिंगन कर सकते हैं, जो शोकित लोगों के साथ शोक मना सकते हैं वे ही जीवन की गहराई तक पहुँच सकते हैं और सचमुच खुश हो सकते हैं।

चीजें बदल सकती हैं  
यह एक पुरोहित का कर्तव्य है कि वह भविष्य की घोषणा करे। पुनरूत्थान केवल अतीत की ऐतिहासिक घटना नहीं है बल्कि नये समय के लिए भी मुक्ति की घोषणा है जिसको आज भी घोषित किये जाने की आवश्यकता है।

विश्वास हमें सुसमाचारी रचनात्मकता के साथ नया समय स्थापित करने देता है। संत पापा ने कहा, "यदि एक अमूर्त उपस्थिति ने विश्व की प्राथमिकताओं और अटूट लगने वाली चीजों को अव्यवस्थित और उलट-पुलट कर दिया है, हम न डरें, पुनर्जीवित प्रभु हमें रास्ता दिखलायेंगे, क्षितिज खोल देंगे और इस ऐतिहासिक एवं अनोखे समय में जीने का साहस प्रदान करेंगे।"

संत पापा ने पुरोहितों का आह्वान किया है कि वे पुनः एक बार पुनर्जीवित प्रभु से विस्मित हों। प्रभु का पुनरूत्थान एक घोषणा है कि चीजें बदल सकती हैं। उन्होंने पुरोहितों को याद दिलाया है कि यह हम पर निर्भर करता है कि हम भविष्य के लिए जिम्मेदारी लें और इसे भाई बहनों को दिखलायें।  

अधिक प्रेम और सेवा
अपने पत्र के अंत में संत पापा ने कहा है कि वे महामारी के समय अपने विचारों और अनुभवों को अपने पुरोहित भाइयों से साझा करना चाहते थे जिससे कि वे उन्हें प्रभु की महिमा और भाई बहनों की सेवा करने के रास्ते पर उनकी सहायता करें।
उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद करता हूँ कि हम सभी उन अनुभवों को सेवा और प्रेम करने में प्रयोग करेंगे।

Add new comment

4 + 2 =